शिक्षापत्र २० : सत्संग की उपयोगिता एवं दुस्संग की निवृत्ति
वक्ता ने २०वें शिक्षापत्र के अंतर्गत श्रीहरिरायजी द्वारा सत्संग की उपयोगिता और दुस्संग की निवृत्ति पर दी गई आज्ञा की पुनरावृत्ति की। उन्होंने बताया कि वैष्णवों को उत्तम भगवदीयों के संग से ही भक्ति सिद्ध होती है, जबकि क्षणिक दुस्संग भी भक्ति का बाधक हो सकता है। प्रतिभागी के प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया गया कि लौकिक व्यस्तता वाले भक्त एकसमय सेवा करके भी अपनी व्यावृति कर सकते हैं, पर उपलब्ध अवकाश का लौकिक प्रवृत्तियों में दुरुपयोग दोषपूर्ण है। मार्ग में आकर भी निंदा आदि दुस्प्रवृत्तियों में रत रहने वाले आसुरी प्रकृति के जीवों पर भी विचार किया गया।
कारिका ७ : अष्टाक्षर मंत्र की विशिष्टता
छठी कारिका के अनुसार भगवान नामसंकीर्तन को सर्वाधिकारक साधन और सर्वोत्तम धर्म बताया गया। वक्ता ने सातवीं कारिका 'तदप श्रीमदाचार्य वदना भुज निशतम...' का पाठ कर उसकी व्याख्या की। स्पष्ट किया गया कि यद्यपि सभी भगवन्नाम उत्तम हैं, पुष्टिमार्ग में 'श्रीकृष्ण शरणं मम' यह अष्टाक्षर मंत्र श्रीमहाप्रभुजी के मुखारविंद से निकला है, जो पुष्टि मार्ग में स्थिति कराता है और सर्व सिद्धि प्रदान करता है। श्रीगुसाईंजी के वचन 'यदुक्तम तात चरण ही श्रीकृष्ण शरणम ममः...' का उल्लेख कर अष्टाक्षर मंत्र के जप से लोक-परलोक संबंधी निश्चिंतता की प्राप्ति समझाई गई। आत्मनिवेदन मंत्र के विपरीत, अष्टाक्षर मंत्र का जप किसी भी अवस्था में किया जा सकता है।
कारिका ८ : ब्रह्मसम्बन्ध एवं भगवत्सेवा का परमार्थ
इस खंड में प्रतिभागी के प्रश्न का उत्तर देते हुए ब्रह्मसम्बन्ध मंत्र के जप की विधि बताई गई, जिसमें करमाला का प्रयोग पंचाक्षर मंत्र के साथ होता है। वक्ता ने आठवीं कारिका 'ततोप ब्रह्म संबंध सर्व दोष निवर्तक...' का पाठ और टीका सहित विस्तृत विवेचन किया। यह समझाया गया कि ब्रह्मसम्बन्ध से जीव के देह और जीव के सभी दोष निवृत्त होते हैं, जैसा कि श्रीमहाप्रभुजी ने सिद्धांत रहस्य में पंचविध दोषों की निवृत्ति का निर्देश दिया है। भगवत्सेवा को निर्दोष आनंद रूप और दोष प्रतिबंधों का नाश करने वाली बताया गया। ब्रह्मसम्बन्ध के बाद भी भगवत्लीला प्राप्ति में बाधक अहंता-ममता के दोषों की निवृत्ति के लिए सेवा का महत्व समझाया गया। प्रभु सन्मुख जप के नियम और ग्रहण काल के अपवाद पर भी चर्चा हुई।
प्रश्नोत्तर : ब्रह्मसम्बन्ध के पश्चात् के दोषों का समाधान
इस खंड में ग्रहण काल में जप की विधि (बैठकर दर्शन करते हुए) पर स्पष्टीकरण दिया गया। प्रतिभागी ने ब्रह्मसम्बन्ध के पश्चात् भी होने वाले दोषों और पूर्व जन्म के संस्कारों के प्रभाव पर प्रश्न किया। वक्ता ने बताया कि ऐसे दोषों के लिए प्रायश्चित विधान करने चाहिए और भगवत् शरणागति सर्वोत्तम प्रायश्चित है। प्रायश्चित को साधन बुद्धि से नहीं, बल्कि भगवत् आज्ञा पालन के रूप में अपनी गलती सुधारने का प्रयास मानना चाहिए। ब्रह्मसम्बन्ध द्वारा भक्ति की योग्यता मिलने के बाद भी, निरोध की योग्यता सेवा से ही आती है। सिद्धांत रहस्य में दोषों की निवृत्ति के दो आचार्य मत (नज़रअंदाज़ करना या सर्वथा निवृत्त मानना) समझाए गए, जिसमें भक्त की सावधानी और भक्ति से दोषों का संतुलन बताया गया।