शिक्षापत्र कारिका ९ : गुणगान का स्वरूप और पुष्टि मार्ग से भेद
इस अध्याय में वक्ता पिछली आठवीं कारिका की चर्चा से शुरुआत करते हैं, जिसमें आत्मनिवेदन को भक्तिमार्ग का प्रथम धर्म बताया गया था। फिर नौवीं कारिका 'गुणगानम तो सर्वेशा दोष नाम विनिवारकम...' का पाठ किया जाता है। यहाँ पुष्टिमार्गीय और मर्यादामार्गीय गुणगान के भेद को स्पष्ट किया गया है। पुष्टिमार्गीय गुणगान ब्रजभक्तों द्वारा संयोग और विप्रयोग दोनों अवस्थाओं में किया जाता है, जो भगवान के सहज धर्म का चिंतन और प्रेम की अभिव्यक्ति है, न कि कोई साधन। यह भगवान के प्रति स्वाभाविक प्रेमवश होता है, फल की आकांक्षा से नहीं।
शिक्षापत्र कारिका १० : ज्ञानमार्ग की न्यूनता और भगवत्सेवा की मुख्यता
दशमी कारिका 'ज्ञानम सकल दोषनाम दाहकम परिकीर्तितम। तथापि न प्रबोह प्रादुर्भाव यत प्रतिबंधकम। तन निवर्तयतम शक्त मतो न्यूयम न्यूनम निरूपितम। तत: स्वचार्य सानिध्यम क्षणा भाव प्रदायकम।' का पाठ किया जाता है, जिसमें ज्ञान को सकल दोषों का भस्म करने वाला कहा गया है, परंतु यह प्रभु के प्रादुर्भाव में प्रतिबंधक होता है, इसलिए इसे न्यून कहा गया है। वक्ता बताते हैं कि ज्ञानमार्ग का गुणगान सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति कराता है, परंतु भगवत् स्वरूपानंद का अनुभव नहीं कराता। भक्तिमार्ग में स्वरूपानंद का अनुभव ही लक्ष्य है, इसलिए ज्ञानमार्ग के साधन अयोग्य और प्रतिबंधक हैं। सन्यास निर्णय और सिद्धांत मुक्तावली के उदाहरणों से ज्ञानमार्ग की न्यूनता और पुष्टिमार्ग की श्रेष्ठता स्थापित की गई है, जहाँ श्रीआचार्यजी के सानिध्य से तुरंत भगवद्भाव की प्राप्ति होती है।
प्रश्नोत्तर : देव सन्मुख बैठने का विवेक एवं ग्रहण काल में जप
एक सहभागी ने ठाकुरजी के सामने बैठने के विवेक संबंधी प्रश्न किया, विशेषकर ऐसे मंदिरों में जहाँ खंडपाठ चौकी नहीं होती। वक्ता ने स्पष्ट किया कि देवता के सम्मुख बैठना कैंकर्यवृत्ति के अभाव को दर्शाता है, क्योंकि सेवक स्वामी के सामने सदैव तत्पर रहता है। यह कैंकर्यवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए है। दूसरे प्रश्न में, ग्रहण काल में गद्य मंत्र या पंचाक्षर मंत्र के पाठ की शुद्धाशुद्धि पर चर्चा हुई। वक्ता ने बताया कि ग्रहण काल पुण्य काल होता है और इसमें किया गया जप सामान्य समय के जप से दुगुना फल देता है, भले ही हम सकाम मार्गी न हों।
शिक्षापत्र कारिका ११ : विरह ताप और भावाग्नि रूप श्रीमहाप्रभुजी
एकादशी कारिका 'तदक्षार्थ ताप नाम क्रमावे संभवत तथा उत्तर भावस्य भावनं रूपतः' का पाठ किया गया। वक्ता ने बताया कि पुष्टिमार्ग में ज्यों-ज्यों मन लगाकर भगवत्सेवा की जाती है, त्यों-त्यों श्रीठाकुरजी के सानुभाव साक्षात्कार दर्शन की इच्छा का ताप क्रमशः बढ़ता जाता है, जिससे दोषों की निवृत्ति और दैन्य की सिद्धि होती है। साधना अवस्था से फलावस्था में पहुँचने पर ब्रजभक्तों के भावों की भावना (मानसी सेवा) सिद्ध होती है, जो सर्वोपरि है। ब्रजभक्तों का भाव अग्नि रूप है, और जब यह भाव हृदय में प्रकट होता है तो श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी का हृदय में पदार्पण माना जाता है। वक्ता ने सर्वोत्तम स्तोत्र की टीका का उदाहरण देते हुए श्रीमहाप्रभुजी के आधिदैविक अग्नि रूपत्व और विप्रयोग की अग्नि के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या की।