शिक्षापत्र २१ — कारिका १ : भक्तिमार्ग-तिरोभूत एवं भाव-शैथिल्य
वक्ता बताते हैं कि २०वें शिक्षापत्र के पश्चात् आज से २१वें शिक्षापत्र का अवगाहन प्रारम्भ हो रहा है।
इस शिक्षापत्र में लौकिक व्यावृत्ति को छोड़कर भगवत्सेवा करने का निरूपण है, किन्तु वह दृढ़ बुद्धि से ही सम्भव है।
कारिका १ में कहा गया है — भक्तिमार्ग इस महाकठिन काल में तिरोभूत हो गया है और पुष्टिमार्गीय भगवतियों का संग भी तिरोभूत हो गया है।
इसके कारण पुष्टिमार्ग का भाव शिथिल हो गया है; और चूँकि पुष्टिमार्ग भावात्मक मार्ग है, भाव के बिना सब कुछ व्यर्थ है।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पुष्टिमार्ग में जितनी भी क्रियाएँ दिखती हैं वे सब भावात्मक हैं, और भाव केवल पुष्टिमार्गीय भगवतियों के संग से और प्रभु के सान्निध्य से ही जाना जाता है।
कारिका २ : भावरहित सेवा कर्ममार्गवत् क्रियामात्र
वक्ता कारिका २ का विशद विवेचन करते हैं — जब भक्तिमार्गीयता का भाव नहीं रहता तब सेवा कर्म की भाँति केवल क्रियामात्र रह जाती है।
पुष्टिमार्ग की रीति यह है कि अष्टप्रहर भाव में रहते हुए सेवा की जाए — संयोग के समय सुख और विप्रयोग के समय उसकी वेदना भी अनुभव हो।
जब भाव नहीं रहता तो कर्ममार्गी की तरह केवल शरीर से क्रिया होती है, और कर्म में भी मन नहीं लगता; तो भगवत्सेवा में तो मन और भी एकाग्र नहीं रहता — बहुत प्रकार के विक्षेप और लौकिक विचार आते रहते हैं।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ऐसी भावहीन क्रिया से पुष्टिभक्तिमार्ग में कुछ भी सिद्ध नहीं होता — यह प्रोग्रेसिव अप्रोच नहीं है, भक्तिमार्ग में उत्कर्ष नहीं होता।
एक प्रतिभागी के प्रश्न के उत्तर में वक्ता यह भी बताते हैं कि शुरुआत क्रिया से होती है और धीरे-धीरे भाव पनपता है, किन्तु इसमें संतुष्टि का भाव कि 'पर्याप्त हो रहा है' आपत्तिजनक है।