शिक्षापत्र २२ : पुष्टि मार्ग में भाव की सर्वोपरिता
२१वा शिक्षा पत्र संपन्न होने के उपरांत, २२वा शिक्षा पत्र प्रारंभ किया जा रहा है। इसमें श्री हरिराय जी ने यह निरूपण किया है कि पुष्टिमार्ग में हमारा भाव ही सर्वोपरि साधन है। यह भावात्मा भगवान ही प्रमेय और फल रूप हैं। इसलिए निधि रूप भाव की रक्षा करनी चाहिए और उससे विरुद्ध जो भी हो, उसका त्याग करना चाहिए। वक्ता बताते हैं कि कलयुग में उत्तम भगवतियों का संग दुर्लभ है, जिससे भक्ति भाव का पोषण कठिन हो गया है। भगवान के प्रति आत्मनिवेदन का भाव ही इस मार्ग में सर्वोपरि साधन है।
पुष्टि मार्ग में साधन और फल का अभेद
वक्ता ने स्पष्ट किया कि पुष्टि मार्ग में श्री कृष्ण की सेवा ही प्रमाण है और वही फल रूप भी है। ज्ञान मार्ग तथा कर्म मार्ग में साधन और फल अलग-अलग होते हैं, जहाँ फल प्राप्ति के बाद साधन की आवश्यकता नहीं रहती। परंतु पुष्टिमार्ग में ऐसा नहीं है; यहाँ साधन भी श्री कृष्ण की सेवा है और फल भी श्री कृष्ण की सेवा है। नवम स्कन्ध में भगवान ने कहा है कि उनके भक्त सालोक्य आदि चतुर्विध मोक्ष की भी कामना नहीं करते, वे अपनी सेवा से ही परिपूर्ण मानते हैं।
भगवदीय संग से भाव की दृढ़ता
हरि-कृष्ण नाम के वैष्णवों में विशेष स्नेह स्थापन करने और गोष्ठी तथा स्नेह सहित वार्ता करने की आज्ञा दी गई है। वक्ता ने बताया कि ऐसे तादृश वैष्णवों के संग से मिलकर पुष्टिमार्ग के भाव और सिद्धांतों का विचार करने से हृदय में भगवत्भाव अचल होता है। ऐसे वैष्णव अंतर्मुखी स्वभाव के होते हैं और उनका चित्त लौकिक विषयों में सर्वथा नहीं लगता। भगवतीय के संग से अंतःकरण में भाव की सिद्धि होती है, जिससे हृदय में स्थित भगवान के दर्शन होते हैं और जीव का चित्त लौकिक में से निवृत्त हो जाता है।
प्रश्नोत्तर : भाव की सर्वोपरिता का स्वरूप
एक प्रतिभागी ने 'प्रतिमान' शब्द का अर्थ पूछा, जिसका उत्तर 'अनुभूत' दिया गया। तत्पश्चात, पुष्टिमार्ग में भाव के सर्वोपरि साधन होने के विषय में प्रश्न उठा कि यह सिद्धान्त मुक्तावली और तनुवित्तजा सेवा के संदर्भ में कैसे मेल खाता है। वक्ता ने समझाया कि तनुवित्तजा सेवा भी यदि भाव रहित हो, तो पुष्टिमार्ग में प्रशंसनीय नहीं है। क्रिया भाव को प्रकट करने का माध्यम मात्र है, परंतु आत्मनिवेदन या प्रेम का भाव शुद्ध और दृढ़ हो, तो भगवान उसे स्वीकारते हैं।
प्रश्नोत्तर : फलात्मक भाव रूप प्रमेय की व्याख्या
पुनः एक प्रतिभागी ने 'श्रीठाकुरजी हूं फलात्मक भाव रूप प्रमेय रूप है' इस वचन पर प्रश्न पूछा। वक्ता ने प्रमेय का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रमेय वह है जिसका ज्ञान प्रमाण द्वारा प्राप्त होता है, और वही चिंतनीय, ध्येय, श्रवणीय और मननीय होते हैं। भक्तिमार्ग में कृष्ण को स्वामी, सेव्य, स्वव्य के रूप में जानना ही उनकी प्रमेय रूपता है। यह व्यक्तिगत भाव के अनुसार बदलता है, इसलिए इसे 'भावात्मक' कहा गया है। वक्ता ने समझाया कि सभी के लिए कृष्ण परब्रह्म हैं, यह निर्विवाद है, लेकिन 'आपके द्वारा भावित' और 'मेरे द्वारा भावित' परब्रह्म का स्वरूप अलग-अलग है। भाव के कारण प्रमेय में भेद हो जाता है, जिससे फलात्मक स्वरूप बदल जाता है।