॥ शिक्षापत्र २३_श्लोक ५-७ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 07 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

इस सत्र में श्री हरिरायजी द्वारा विरचित शिक्षापत्र का अध्ययन किया जा रहा है। वक्ता ने बताया कि २२वाँ पत्र संपन्न होने के उपरांत २३वें पत्र का निरूपण प्रारंभ हुआ है। इस पत्र में भक्ति वृद्धि के साधनों का वर्णन करते हुए विशेष रूप से पुष्टि मार्गीय धर्म और ज्ञान मार्गीय धर्मों के बीच भेद निरूपण किया गया है। आज के सत्र में २३वें शिक्षापत्र की कारिका ५ से ७ पर विस्तार से चर्चा की गई।

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शिक्षापत्र २३ — भक्ति वृद्धि के साधन एवं पुष्टिमार्गीय धर्म
००:०० – ०३:२९ — शिक्षापत्र २३ — भक्ति वृद्धि के साधन एवं पुष्टिमार्गीय धर्म
शिक्षापत्र २३ — भक्ति वृद्धि के साधन एवं पुष्टिमार्गीय धर्म
वक्ता ने बताया कि श्री हरिरायजी विरचित शिक्षापत्र के २३वें पत्र का अध्ययन किया जा रहा है। २२वें पत्र के उपरांत २३वें पत्र से भक्ति वृद्धि के साधनों का निरूपण प्रारंभ हुआ। इसमें यह बताया गया कि भगवान स्वामी के रूप में प्राप्त होने पर भक्त को निश्चिंत हो जाना चाहिए, क्योंकि भगवान सर्व सामर्थ्यवान हैं। श्री महाप्रभुजी ने आज्ञा की है कि भगवान की शरणागति लेने वाले जीव की लौकिक गति नहीं होती। यहाँ पुष्टि मार्गीय धर्म और ज्ञान मार्गीय धर्मों के बीच भेद निरूपण की चर्चा की गई।
२
कारिका ५ — भक्तों को लौकिक चिंता क्यों होती है?
०३:३० – १४:१८ — कारिका ५ — भक्तों को लौकिक चिंता क्यों होती है?
कारिका ५ — भक्तों को लौकिक चिंता क्यों होती है?
कारिका ५ का पाठ किया गया: 'अतः तदिया किम भ्रांता चिंताम विदते जना ज्ञानोपन दुखम चित दति लौकिकम सेवा रसादी रहता चित्रम् भक्ताह कथम् तथा यहि स्वरूपस सेवायाम् दर्शन स्पर्शनादकम अनुभूतम सदा तेशाम चित्तम दुख युतम कथम परमानंद संबंध दुखम तिष्ठति नहीं वही'। श्री हरिरायजी प्रश्न कर रहे हैं कि भक्तों को चिंता क्यों होती है। श्री गोपेश्वरजी ने टीका में समझाया कि पुष्टि मार्गी वैष्णवों को अपने मन में चिंता क्यों होनी चाहिए, जबकि ज्ञान मार्गी भी लौकिक दुखों से विरक्त होते हैं। पुष्टि मार्ग में श्रीमहाप्रभुजी द्वारा भगवान से संबंध होने के बावजूद अज्ञानवश चिंता से चित्त उद्विग्न क्यों होता है, जबकि भगवान सर्व सामर्थ्ययुक्त हैं। भगवत्सेवा का अनुभव करने के बाद भी चित्त में संसार भरा होने के कारण भगवत् रस का अनुभव नहीं हो पाता है।
३
कारिका ६ — बहिर्मुखता का त्याग
१४:१९ – १९:०६ — कारिका ६ — बहिर्मुखता का त्याग
कारिका ६ — बहिर्मुखता का त्याग
कारिका ६ का पाठ किया गया: 'पित्रादयस्तु सर्वेपि संबंधा दुख हेतवः संबंधाय स्नेह हेतवः दोनों पाठ अवेलेबल हैं। इसलिए वैकल्पिक रूप से बहिर्मुख जनसव बाहिर मुख्यम ततस त्यजेत'। श्री हरिरायजी यहाँ आज्ञा करते हैं कि लोक में पिता, पत्नी, पुत्र आदि प्रिय लगते हैं क्योंकि उनसे कामनाएँ पूरी होती हैं। परंतु भगवान तो सब कुछ प्रदान करते हैं और पुष्टि मार्ग में उनके साथ साक्षात् संबंध हुआ है। इसके बावजूद हम सांसारिक संबंधों के सुख का अनुभव करते हैं और भगवान के संबंध को भूल जाते हैं। लौकिक स्नेह के कारण जब संसार के प्रति आकर्षित होते हैं तो बहिर्मुखता आती है और भगवान के संबंध को रियलाइज़ नहीं कर पाते हैं। सांसारिक बहिर्मुखता का त्याग करने पर ही भगवान के प्रति सम्मुख हो पाते हैं।
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प्रश्नोत्तर — लौकिक संबंधों का त्याग और ज्ञान मार्गी जीव
१९:०७ – ३५:३९ — प्रश्नोत्तर — लौकिक संबंधों का त्याग और ज्ञान मार्गी जीव
प्रश्नोत्तर — लौकिक संबंधों का त्याग और ज्ञान मार्गी जीव
एक प्रतिभागी ने प्रश्न किया कि यदि पिता, स्त्री, पुत्र आदि का त्याग कर देंगे तो व्यक्ति पूर्णतः आइसोलेटेड हो जाएगा। इस पर वक्ता ने स्पष्ट किया कि यहाँ 'त्याग' का अर्थ उनके भविष्य की चिंता में मर जाना या बहिर्मुखता इनवाइट करना नहीं है, बल्कि अपनी चिंता करना है कि उनके संसर्ग के कारण हमारा क्या होगा। हमें अपने चित्त को स्वस्थ करके भगवान में लगाना चाहिए। दूसरे प्रतिभागी ने ज्ञान मार्गी जीव के लौकिक दुख से निवृत्त होने के बारे में पूछा। वक्ता ने समझाया कि ज्ञान मार्गी जीव ब्रह्म का ध्यान करके संसार से विरक्त हो जाते हैं, जिससे उन्हें कोई लौकिक चिंता नहीं होती। उनकी अहंता केवल 'मैं ध्याता हूँ और भगवान मेरे धेय हैं' इतनी रहती है, जिससे वे लौकिक अहंता-ममता से परे रहते हैं।
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कारिका ७ — बहिर्मुख संग के दोष
३५:४० – ३८:५८ — कारिका ७ — बहिर्मुख संग के दोष
कारिका ७ — बहिर्मुख संग के दोष
कारिका ७ का पाठ किया गया: 'बहिर्मुखस वादते दोषदहिक मानसा क्षीण धातु रिवा रिवार तस्य रोगा वातिक पतिका'। श्री हरिरायजी बता रहे हैं कि बहिर्मुख का संग वैष्णव के लिए बाधक है, इससे दैहिक और मानस दोष लगते हैं। इसका दृष्टांत देते हुए कहा कि जैसे धातु क्षीण रोगी को वायु-पित्त के रोग तुरंत घेर लेते हैं, उसी प्रकार पुष्टि मार्ग में अदृढ़ बीज भाव वाले (भक्ति की अपरिपक्व अवस्था वाले) भक्तों को बहिर्मुखों का संग होने पर लौकिक दोष शीघ्र लग जाते हैं। इसलिए बहिर्मुखों से दूर रहकर सावधान रहना चाहिए क्योंकि संग के कारण ही ये दोष आते हैं। हमारा शरीर और मन दोनों ही चंचल और अदृढ़ हैं, इसलिए इन दोषों का संसर्ग जल्दी हो जाता है।
📖 सार
📌 सार
• श्री हरिरायजी के २३वें शिक्षापत्र का अध्ययन करते हुए भक्ति वृद्धि के साधनों पर चर्चा हुई।
• कारिका ५ में यह प्रश्न उठाया गया कि पुष्टि मार्गी भक्तों को चिंता क्यों होती है, जबकि वे भगवान से संबंधित हैं।
• लौकिक चिंताएँ और संसार से भरा चित्त ही भगवत् रस के अनुभव में बाधक हैं।
• कारिका ६ में बहिर्मुखता के त्याग की आज्ञा दी गई, क्योंकि लौकिक संबंध दुख और बहिर्मुखता के कारण बनते हैं।
• प्रश्नोत्तर में स्पष्ट किया गया कि लौकिक संबंधों का त्याग का अर्थ उनकी चिंता न करके अपनी बहिर्मुखता को रोकना है।
• ज्ञान मार्गी जीव वैराग्य के कारण लौकिक चिंताओं से मुक्त होते हैं, उनकी अहंता केवल ध्यान के लिए होती है।
• कारिका ७ में बहिर्मुख संग के दोषों का वर्णन किया गया, जिसमें अपरिपक्व भक्तों को लौकिक दोषों से बचने की चेतावनी दी गई।