मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के लिए आरक्षित है, जिसमें सत्र की पारंपरिक शुरुआत की जाती है।
शिक्षापत्र २३, कारिका १० : बहिर्मुखता निवृत्ति के साधन
श्री हरिरायजी द्वारा कारिका १० के निरूपण में वक्ता बताते हैं कि बहिर्मुखता की निवृत्ति के लिए सत्पुरुषों का संग और सेवा आवश्यक है। श्री भागवत के पाठ और उसके अर्थ श्रवण को भी प्रमुख साधन बताया गया है। कलयुग में उत्तम भगवतीयों के दुर्लभ होने पर श्री भागवत को ही भगवत संग जानना चाहिए। श्रीमन्महाप्रभुजी की आज्ञा है कि भागवत का व्यवसाय कभी नहीं करना चाहिए, अपितु स्वयं पठन-मनन-चिंतन करना चाहिए।
शिक्षापत्र २३, श्लोक १४ : निसाधनता और शरणागति का भावन
वक्ता श्लोक १४ का निरूपण करते हुए कहते हैं कि यदि भागवत श्रवण का संयोग न बने तो आत्मनिवेदन का स्मरण करना चाहिए। यदि भगवन्नामस्मरण भी दुर्लभ हो जाए, जैसा कि श्रीगोसाईंजी ने अपनी विज्ञप्ति में कहा है, तो श्रीमहाप्रभुजी के विवेकधैर्याश्रय के वचनों के अनुसार `सर्वथा शरणम हरि` इस भावना को हृदय में धारण करना चाहिए। यह पूर्णतः निसाधनता के भावन की स्थिति है, जहाँ साधक स्वयं को असामर्थ्यवान स्वीकार करता है।
प्रश्नोत्तर : शरण की भावना का स्वरूप
एक सहभागी द्वारा `शरण की भावना` के स्वरूप पर प्रश्न पूछने पर वक्ता स्पष्ट करती हैं कि इसका अर्थ है 'अब हमसे कुछ होता नहीं है, हमने आपको अपने स्वामी के रूप में स्वीकार लिया है और हम आपके प्रति पूर्णतः शरणागत हैं' ऐसा अपने चित्त में चिंतन करना। वक्ता यह भी समझाती हैं कि आत्मनिवेदन और शरणागति वस्तुतः अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि साधना अवस्था में इनके बीच एक काल्पनिक रेखा खींच दी जाती है। यह असामर्थ्य, निसाधनता और अंश भाव का चिंतन है।
प्रश्नोत्तर : सेवकत्व और शरणागति में भेद
एक सहभागी के प्रश्न पर कि क्या हम सेवक अधिक और शरणागत कम हैं, वक्ता स्पष्ट करती हैं कि हम सेवकत्व को क्रियावाची मानते हैं, जबकि सेवकत्व वस्तुतः भगवदधीनत्व की भावना है। यही शरणागति भी है। दीक्षा क्रम में आत्मनिवेदी और शरणागत में भेद किया जाता है, परंतु भावनात्मक रूप से ये भिन्न नहीं हैं। वक्ता बताती हैं कि हमारा अधीनत्व केवल भगवत्सेवा के समय प्रकट होता है, लौकिक जीवन में हम स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में व्यवहार करते हैं, जो वस्तुतः सेवकत्व या शरणागति नहीं है।
प्रश्नोत्तर : जीवन के सभी पक्षों में भगवदधीनता
वक्ता इस बात पर बल देती हैं कि शरणागति, सेवक होना और आत्मनिवेदी होना, ये तीनों ही भक्ति हैं और परस्पर जुड़े हुए हैं। समस्या हमारे `ड्यूअल पर्सनालिटी` में है, जहाँ हम सेवा संबंधी और लौकिक जीवन को अलग-अलग मानते हैं। प्रत्येक प्रवृत्ति से पहले `मैं कृष्ण का दास हूं` और 'एक दास होने के नाते मुझे यह करना चाहिए या नहीं' यह विचार आना ही शरणागति, सेवकत्व और आत्मनिवेदन की पूर्णता है। नवरत्न में श्रीमन्महाप्रभुजी की `वद सततम` की आज्ञा इसी अनुसंधान के लिए है।