शिक्षापत्र २३ — पूर्व प्रसंग का स्मरण एवं विषय प्रवेश
इस खंड में, वक्ता ने श्रीहरिरायजी द्वारा विरचित शिक्षापत्र के २३वें पत्र के पूर्व के प्रसंगों का स्मरण कराया। विशेष रूप से २२वें पत्र के समापन के बाद, २३वें पत्र में भक्ति वृद्धि के साधनों और उन साधनों का अनुसरण करने की योग्यता कैसे प्राप्त होती है, इस पर निरूपण प्रारंभ किया गया। श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञा के अनुसार, भगवान के स्वामी रूप में प्राप्त होने पर भक्त को निश्चिंत हो जाना चाहिए, क्योंकि भगवान सर्वसामर्थ्यवान हैं और शरणागत की लौकिक गति नहीं करते हैं। वक्ता ने पुष्टिमार्गीय धर्म और ज्ञानमार्गीय धर्मों के बीच के भेद को संक्षेप में बताया, यह भी स्मरण कराया कि श्रीगोसाईंजी और श्रीमहाप्रभुजी के आज्ञानुसार हमें सभी चिंताओं को छोड़कर भगवान में अपने चित्त को लगाना चाहिए। यह पृष्ठभूमि आगे की कारिकाओं के गहन अध्ययन के लिए आधारशिला स्थापित करती है।
कारिका ५ — पुष्टिभक्तों को लौकिक चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए
श्रीहरिरायजी पाँचवीं कारिका `अतः तदिया किम भ्रांता चिंताम विदते जना...` के माध्यम से यह प्रश्न उपस्थित करते हैं कि श्रीआचार्यजी की शरण में आए भगवदीय जन व्यर्थ ही भ्रांत क्यों होते हैं और चिंता में क्यों पड़े रहते हैं। टीका में श्रीगोपेश्वरजी महाराज इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि पुष्टिमार्गीय वैष्णवों को अपने मन में चिंता या उद्वेग होना ही क्यों चाहिए, जबकि भगवान सर्व सामर्थ्य युक्त हैं। यहाँ ज्ञानमार्गी जीवों से तुलना की गई है, जो लौकिक दुखों को मन में नहीं धरते, तो पुष्टिभक्तों को तो बिल्कुल नहीं धरने चाहिए। वक्ता ने समझाया कि भक्त यदि भगवत् रस का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं, तो इसका मुख्य कारण चित्त के अंदर संसार और सांसारिक चिंताओं का भरा होना है। जब चित्त सांसारिक वृत्ति से भरा होता है, तब वह भगवत्संबंध का अनुभव करने योग्य नहीं रहता, जिससे अज्ञानवश भक्त दुखी होते हैं और उन्हें प्राप्त भगवत् रस का अनुभव नहीं हो पाता।
कारिका ६ — लौकिक संबंधों से बहिर्मुखता का त्याग
छठी कारिका `पित्रादयस्तु सर्वेपि संबंधा दुख हेतवः...` में श्रीहरिरायजी यह आज्ञा करते हैं कि पिता, स्त्री, पुत्र आदि सभी लौकिक संबंध बहिर्मुख जनों के लिए दुख के कारण रूप हैं। इसलिए ऐसी बहिर्मुखता का त्याग करना चाहिए। टीका में श्रीगोपेश्वरजी ने स्पष्ट किया कि लोक में हमें पिता, पत्नी, पुत्र आदि प्रिय लगते हैं क्योंकि उनके द्वारा हमारी लौकिक इच्छाएं और कामनाएं पूरी होती हैं। परंतु पुष्टि मार्ग में, जब श्रीमहाप्रभुजी के द्वारा श्रीकृष्ण से साक्षात् संबंध प्राप्त हो गया है, तब भी अज्ञानवश हम पुत्र आदि लौकिक संबंधों से स्नेह कर बहिर्मुखता धारण करते हैं। वक्ता ने इस बात पर बल दिया कि भगवान हमें सब कुछ प्रदान करते हैं, और उनके साथ हमारा साक्षात् संबंध हुआ है। हमें इस संबंध का अनुभव करना चाहिए। जब हम सांसारिक बहिर्मुखता को त्याग पाते हैं और यह जान लेते हैं कि भगवान के साथ हमारे लौकिक पदार्थों का भी संबंध हुआ है, तभी हम भगवान के प्रति सम्मुख हो पाते हैं।
प्रश्नोत्तर — लौकिक संबंधों से बहिर्मुखता एवं भगवत्संबंध
एक सहभागी ने प्रश्न उठाया कि यदि लौकिक संबंधों का त्याग किया जाए, तो व्यक्ति पूरी तरह से आइसोलेटेड हो जाएगा, जबकि श्रीमहाप्रभुजी ने तो साधन प्रकरण में सहायक लोगों के साथ रहने का निर्देश दिया है। इस पर वक्ता ने स्पष्ट किया कि यहाँ दूसरों को त्यागने की बात नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक बहिर्मुखता को त्यागने पर जोर दिया जा रहा है। दूसरों का क्या होगा, यह भगवान की इच्छा पर निर्भर है, पर उनकी चिंता करते हुए अपने चित्त को भगवान से बहिर्मुख नहीं करना चाहिए। वक्ता ने अहंता और ममता के संदर्भ में ज्ञानमार्गी और पुष्टिमार्गी जीवों की अहंता के स्वरूप में भेद को समझाया। ज्ञानमार्गी में अहंता केवल ध्याता-ध्येय संबंध तक सीमित होती है, जबकि पुष्टिमार्गी में अहंता सेवार्थ होती है। वक्ता ने यह भी कहा कि जितनी ममत्व हमें घर परिवार के लोगों के लिए होता है, उतना अपने ठाकुरजी के लिए नहीं होता, जो चिंता का विषय है। श्रीमहाप्रभुजी का आश्वासन 'सर्वेषाम् प्रभु सम्बन्धो न प्रत्येकम स्थिति' भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है।
कारिका ७ — बहिर्मुख संग के दैहिक एवं मानस दोष
सातवीं कारिका `बहिर्मुखस वादते दोषदहिक मानसा...` में श्रीहरिरायजी यह आज्ञा करते हैं कि बहिर्मुख को दैहिक (शरीर संबंधी) और मानस (मन संबंधी) दोष वैसे ही पीड़ा देते हैं, जैसे क्षीण धातु वाले रोगी को वात और पित्त के रोग बाधा करते हैं। टीका में श्रीगोपेश्वरजी ने वैष्णवों को बहिर्मुखों के संग से दूर रहने की आवश्यकता पर बल दिया है, विशेषकर उन लोगों को जिनकी भक्ति अभी अपरिपक्व अवस्था में है या जिनमें अदृढ़ बीज भाव है। वक्ता ने उदाहरण देकर समझाया कि जैसे रोगी की धातु क्षीण होती है और उसका शरीर कमजोर होता है, तो उसे वायु और पित्त के रोग तुरंत घेर लेते हैं, उसी प्रकार जब हमारी भक्ति दृढ़ नहीं होती और हम अदृढ़ बीज भाव वाले होते हैं, तब संसार के सभी दोष हमें शीघ्र लगते हैं और उनका संसर्ग जल्दी हो जाता है। अतः, हमें ऐसे संग से सावधान होकर रहना चाहिए ताकि बहिर्मुखता के दोष हमें न घेर लें।