॥ शिक्षापत्र ११ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 13 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

श्री हरिराय जी द्वारा विरचित शिक्षापत्र के क्रम में कारिका ११ से कारिका १५ तक का निरूपण किया गया। इस सत्र में भक्ति मार्गी साधनों के रूप में आत्मनिवेदन धर्म के स्मरण, अष्टाक्षर एवं पंचाक्षर महामंत्रों के अनुसंधान का महत्त्व बताया गया। वैराग्य, संतोष, लौकिक क्लेश से उदासीनता और नवरत्न पाठ द्वारा सभी लौकिक-अलौकिक चिंताओं की निवृत्ति के विषय में चर्चा की गई।

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१
प्रारंभिक परिचय एवं भक्ति मार्गी साधनों का पुनरावलोकन
००:०० – ०१:११ — प्रारंभिक परिचय एवं भक्ति मार्गी साधनों का पुनरावलोकन
प्रारंभिक परिचय एवं भक्ति मार्गी साधनों का पुनरावलोकन
श्री हरिराय जी द्वारा विरचित शिक्षापत्र के क्रम में भक्ति मार्गी साधनों का निरूपण देखा गया। इसमें सत्संग को प्रमुख साधन के रूप में बताया गया। सत्संग की उपलब्धि न होने पर भागवत पारायण होकर रहने की आज्ञा दी गई है। यह स्मरण कराया गया कि भक्ति मार्गी साधनों के रूप में सत्संग और भागवत पारायण का स्वरूप पहले ही निरूपित हो चुका है।
२
कारिका ११ — आत्मनिवेदन धर्म का नित्य स्मरण
०१:११ – ०१:४१ — कारिका ११ — आत्मनिवेदन धर्म का नित्य स्मरण
कारिका ११ : आत्मनिवेदन धर्म का नित्य स्मरण
कारिका ११ में यह आज्ञा दी गई कि भागवत अनुसंधान करने हेतु भी संघ की आवश्यकता होती है। परंतु उसकी प्राप्ति यदि हमें न हो पाए तो उस स्थिति में निरंतर हमें आत्मनिवेदन धर्म का स्मरण करना चाहिए। आत्मनिवेदन धर्म का स्मरण हमें नित्य करना चाहिए।
३
कारिका १२ — अष्टाक्षर और पंचाक्षर मंत्र का अनुसंधान
०१:४१ – ०५:०० — कारिका १२ — अष्टाक्षर और पंचाक्षर मंत्र का अनुसंधान
कारिका १२ : अष्टाक्षर और पंचाक्षर मंत्र का अनुसंधान
कारिका १२ में अष्टाक्षर महामंत्र के कीर्तन और पंचाक्षर मंत्र के अनुसंधान की आज्ञा दी गई। श्रीमहाप्रभुजी नवरत्न में अष्टाक्षर मंत्र का नित्य अनुसंधान करने की आज्ञा देते हैं। श्रीसुखदेवजी द्वादशस्कन्ध में कहते हैं कि कलयुग दोषों से भरा हुआ है, परंतु इसका एक महान् गुण है कि जो व्यक्ति भगवान् नाम कीर्तन करता है, वह इस काल बंधन से निवृत्त होकर भक्ति को प्राप्त करता है। पंचाक्षर मंत्र का उच्चारण सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता, परंतु अति निकट के भगवदीय जनों के साथ बिना मंत्रोउच्चार किए केवल उसके अर्थ का अनुसंधान या निवेदन के धर्म का अनुसंधान करना चाहिए। श्रीआचार्यजी महाप्रभु नवरत्न में कहते हैं कि भगवदीय जनों के संग बिना पंचाक्षर भाव प्रकट नहीं होता, अतः निवेदन के स्मरण में भगवतीय की अपेक्षा है। आत्मनिवेदन के धर्म के बोध के लिए भगवदीय जनों के संग की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए उनके संग में आत्मनिवेदन धर्म का विचार या चिंतन करना चाहिए।
४
कारिका १३ — वैराग्य, संतोष एवं लौकिक क्लेश में उदासीनता
०५:०० – १४:३१ — कारिका १३ — वैराग्य, संतोष एवं लौकिक क्लेश में उदासीनता
कारिका १३ : वैराग्य, संतोष एवं लौकिक क्लेश में उदासीनता
कारिका १३ में वैराग्य और संतोष द्वारा श्रीकृष्णभगवत्स्वरूप के सन्निधान में स्थिति का निरूपण किया गया। संसार संबंधी पदार्थों के प्रति चित्त से वैराग्य रखना चाहिए, क्योंकि संसार में वैराग्य होने पर लौकिक दुख-सुख चित्त को बाधा नहीं करते हैं। विरक्त मन को रखते हुए जो कुछ भी प्राप्त हो जाए, उससे संतुष्ट होकर रहना चाहिए। सहज में जो प्राप्त हो, उसमें संतुष्ट रहना चाहिए। यह आज्ञा की गई कि ममता रहित होकर, बिना ज्यादा उद्वेग के जो कुछ भी सरलता से प्राप्त हो, उसी का सेवन करना चाहिए। संतुष्टि और वैराग्य का अनुसरण करने से चित्त में विक्षेप नहीं होता है। श्रीआचार्यजी महाप्रभु भक्तिवर्धिनी में कहते हैं कि समीप में अथवा दूरी में जैसे चित्त दोषयुक्त न हो, वैसे रहना चाहिए। लौकिक क्लेश से अपना मन उदास रखना चाहिए और देह संबंधी पुत्र, स्त्री, बंधु किसी में भी अनुराग नहीं रखना चाहिए। वैराग्य और संतोष भक्तिमार्ग के सहायक धर्म हैं।
५
कारिका १४ — ग्रह, धन में अनासक्ति और नवरत्न पाठ से चिंता निवृत्ति
१४:३१ – १६:४२ — कारिका १४ — ग्रह, धन में अनासक्ति और नवरत्न पाठ से चिंता निवृत्ति
कारिका १४ : ग्रह, धन में अनासक्ति और नवरत्न पाठ से चिंता निवृत्ति
कारिका १४ में ग्रह और धन आदि में अनासक्ति करके तदीय वैष्णव जनों में अति स्नेह रखने और नवरत्न ग्रंथ के पाठ से सभी चिंताओं की निवृत्ति का उपदेश दिया गया। ग्रह, धन इत्यादि में आसक्ति न रखें, क्योंकि ये सभी चिंता के मूल हैं। पुष्टिमार्गीय भगवदीय जनों में अनुराग रखना चाहिए तथा नित्य नियम से नवरत्न ग्रंथ का पाठ करना चाहिए, जिससे मन से सभी चिंताएं निवृत्त हों। चिंता नाश के अर्थ गोविंद दुबे और वैष्णवन के लिए श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी ने नवरत्न ग्रंथ प्रकट किए हैं। नवरत्न में श्रीमहाप्रभुजी ने जो समर्पण धर्म का उपदेश दिया है, उसका अनुसंधान करने से लौकिक चिंताएं और आत्मनिवेदन संबंधी विचार स्पष्ट होते हैं।
६
कारिका १५ — बहिर्मुखता निवृत्ति और भगवद् भाव की वृद्धि
१६:४२ – १९:११ — कारिका १५ — बहिर्मुखता निवृत्ति और भगवद् भाव की वृद्धि
कारिका १५ : बहिर्मुखता निवृत्ति और भगवद् भाव की वृद्धि
कारिका १५ में बताया गया कि ऊपर कहे गए भगवत धर्मों के अनुसरण से जिनकी बहिर्मुखता निवृत्त हो गई है, ऐसे वैष्णव जनों को दुख बाधा नहीं करता है। बहिर्मुखता की निवृत्ति मात्र में यत्न करना चाहिए। इन यत्नों से भाव की वृद्धि होती है। सभी साधनों का अनुसरण अंततः भगवद् भाव की वृद्धि के लिए करना चाहिए। भगवद् भाव के अंदर ही लौकिक चिंताएं उद्वेग रूप और प्रतिबंध रूप होती हैं। विवेकधैर्य में श्रीमहाप्रभुजी भौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकार के दुखों को सहन करने की आज्ञा इसी प्रयोजन से देते हैं, ताकि वे दुख हमें भगवत्सेवा में बाधा रूप न बनें और चित्त ठाकुरजी से विचलित न हो। इन दुखों को सहन करने का प्रयोजन भगवद् भाव की स्थिति और वृद्धि है।
७
प्रश्नोत्तर — लौकिक क्लेश में उदासीनता और कलयुग में भगवन्नाम महिमा
१९:११ – २२:५४ — प्रश्नोत्तर — लौकिक क्लेश में उदासीनता और कलयुग में भगवन्नाम महिमा
प्रश्नोत्तर : लौकिक क्लेश में उदासीनता और कलयुग में भगवन्नाम महिमा
एक प्रतिभागी ने लौकिक क्लेश में मन को उदास रखने के विषय में स्पष्टीकरण माँगा। वक्ता ने बताया कि लौकिक क्लेश से मन को उदास रखने का अर्थ है उसमें रुचि न लेना और उदासीन रहना। भक्ति बाधक वस्तुओं या संबंधों से अनुराग नहीं रखना चाहिए। दूसरे प्रतिभागी ने कलयुग में भगवन्नाम कीर्तन की महिमा और अन्य युगों के मुख्य धर्मों के विषय में प्रश्न किया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक युग के अंदर मुख्य और गौण धर्मों का निरूपण किया गया है। अन्य युगों में सभी धर्म साधक सिद्ध होते हैं, परंतु कलयुग में जीवों में योग्यता न होने के कारण केवल श्रवण, कीर्तन, स्मरण ही महत फलदाई है। अन्य युगों में धर्म स्वतः सिद्ध होते हैं, उन्हें विशेष सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती है।
सत्र समापन
आज का विषय यहाँ संपन्न हुआ। आगे का निरूपण अगले सत्र में किया जाएगा।
📖 सार
📌 सार
श्री हरिराय जी द्वारा विरचित शिक्षापत्र की कारिका ११ से कारिका १५ तक का विवेचन प्रस्तुत किया गया।
आत्मनिवेदन धर्म का नित्य स्मरण और भगवदीय जनों के संग में उसका अनुसंधान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
अष्टाक्षर महामंत्र का कीर्तन और पंचाक्षर मंत्र का गोपनीय अनुसंधान भक्तिमार्ग में सहायक है।
वैराग्य और संतोष लौकिक दुखों से चित्त को बाधा रहित रखते हैं, जिससे भगवत्सेवा में विक्षेप नहीं होता।
नवरत्न ग्रंथ का पाठ सभी लौकिक-अलौकिक चिंताओं की निवृत्ति का श्रेष्ठ साधन है।
बहिर्मुखता की निवृत्ति भगवद् भाव की वृद्धि का मूल प्रयोजन है, जिससे सभी दुख सहन करने की शक्ति मिलती है।
कलयुग में भगवन्नाम कीर्तन जीवों के लिए महत फलदायी और काल बंधन से निवृत्त करने वाला है।