शिक्षापत्र २३, कारिका १५ — बहिर्मुखता निवृत्ति और भगवत्सेवा का महत्व
इस खंड में, वक्ता ने श्रीहरिरायजी की आज्ञा के अनुसार समझाया कि २३वें शिक्षापत्र में बताए गए भगवद्धर्मों के पालन से बहिर्मुखता निवृत्त होती है और चित्त भगवान् में प्रवण होता है। इन धर्मों का अनुसरण करने वाले वैष्णवों के सभी दुख दूर होते हैं और वे सुख का अनुभव करते हैं। वक्ता ने बताया कि पुष्टिमार्ग साधन परायण नहीं है, बल्कि भगवान् की विशेष कृपा से वे जीव को साधन में प्रवृत्त करते हैं जिन्हें वे शीघ्र फलदान करना चाहते हैं। यह साधन हमारे भावों को बढ़ाने वाले होते हैं और भगवान् की प्रेरणा से ही संपन्न हो पाते हैं।
शिक्षापत्र २३, कारिका १६ — दुर्लभ काल में लौकिक चिंता त्याग और भगवत्सेवा
यहाँ वक्ता ने श्रीहरिरायजी की आज्ञा का निरूपण करते हुए कहा कि कलिकाल में भगवद्धर्म में निष्ठ हो पाना अत्यंत दुर्लभ है। मनुष्य देह का प्राप्त होना जो श्रीभगवान् की सेवा के अनुकूल हो, यह भी परम दुर्लभ है, अतः लौकिक चिंताएँ करते हुए इस उत्तम समय को व्यर्थ नहीं खोना चाहिए। वक्ता ने इस बात पर विशेष बल दिया कि पुष्टि मार्गीय सेवा केवल इसी देह से संभव है, जो ब्रह्मादिकों को भी दुर्लभ है। श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी द्वारा ब्रह्मसम्बन्ध की प्राप्ति अन्य युगों में कहाँ संभव है? शुद्ध भक्ति का मार्ग हर काल में प्रकट नहीं होता, इसलिए इस दुर्लभ संयोग में भगवत्सेवा अवश्य कर्तव्य है।
प्रश्नोत्तर — आचार्य के आश्रय और नवरत्न के चिंतन का प्रयोजन
एक प्रतिभागी ने श्रीआचार्यजी के आश्रय और नवरत्न ग्रंथ में वर्णित चिंता निवृत्ति के संदर्भ में लौकिक चिंताओं को भगवान् की लीला समझने की कठिनाई पर प्रश्न उठाया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'आचार्य जी के आश्रय' का तात्पर्य श्रीमहाप्रभुजी के अनुयायी भगवदीय वैष्णवों के उत्तम संघ से है, जो भक्ति वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि नवरत्न ग्रंथ का चिंतन हमें वह विवेक बुद्धि और मानस देता है जिससे हम अपनी लौकिक चिंताओं को त्यागकर भक्ति को जीवन का प्राथमिक लक्ष्य बना पाते हैं, क्योंकि सब कुछ भगवान् की इच्छा से ही होता है।