कारिका १० : बहिर्मुखता की निवृत्ति के साधन
कारिका १० में श्रीहरिरायजी कहते हैं कि बहिर्मुखता की निवृत्ति सत्पुरुषों के संग, उनकी सेवा, श्रीभागवत के पाठ और उसके अर्थ के श्रवण से होती है। जैसे रोगी औषधि खाकर रोग दूर करता है, उसी प्रकार तादर्शीय भगवतीय वैष्णवों का संग करने से दैहिक और मानसिक सभी दोष दूर होते हैं। श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञा है कि भक्ति संगसाध्य होती है — बिना भगवतीयों के संग के भक्ति सिद्ध नहीं हो सकती। कलयुग में ऐसे उत्तम भक्तों का संग दुर्लभ है, इसलिए अनुकल्प के रूप में भागवत को ही भगवतसंग जानना चाहिए। पुराने काल में ग्रन्थ की अनुपलब्धि या भाषा-ज्ञान के अभाव में उत्तम भगवतीय के मुख से भागवत-श्रवण का विधान किया गया है।
कारिका ११ से १४ : क्रमशः अनुकल्पों का निरूपण
कारिका ११ से १४ में श्रीहरिरायजी क्रमशः अनुकल्प बताते हैं। यदि भागवत श्रवण का संयोग न बने तो आत्मनिवेदन के धर्म का स्मरण करना चाहिए कि मैं भगवान के प्रति आत्मनिवेदी हूं। यदि यह भी न बन पाए तो सदा श्रीकृष्ण के नाम का ग्रहण करना चाहिए। गोसाईंजी विज्ञप्ति में कहते हैं कि भगवान के नाम के उच्चारण की योग्यता जीव में नहीं है क्योंकि वह नाम महा अलौकिक है और जीव की वाणी लौकिक है। यदि नामस्मरण भी न बन पाए तो शरण की भावना करनी चाहिए। श्रीमहाप्रभुजी नवरत्न में और विवेक-धैर्य-आश्रय में इसी शरणागति के भावन की आज्ञा करते हैं। अन्तिम अनुकल्प के रूप में पूर्ण निस्ताधनता का भावन ही सर्वसाधन रूप है।
प्रश्नोत्तर : शरणागति और सेवकत्व एक ही भाव के दो नाम
प्रतिभागियों के प्रश्न पर विस्तृत चर्चा हुई कि सेवकत्व अधिक दिखता है परन्तु शरणागति का भाव नहीं आता। इस पर स्पष्ट किया गया कि सेवकत्व को केवल क्रियावाची अर्थ में समझना भूल है। भगवत्-अधीनता की भावना ही वस्तुतः सेवकत्व है और वही शरणागति भी है। दीक्षाक्रम की व्यवस्था में आत्मनिवेदी और शरणागत को अलग परिभाषित किया जाता है, परन्तु भावनात्मक रूप से शरणागति, सेवकत्व और आत्मनिवेदन — तीनों एक दूसरे के विशेषण-विशेष्य हैं, इन्हें विभक्त नहीं किया जा सकता। हम अपने जीवन को दो हिस्सों में जीते हैं — सेवाकालीन और लौकिक — इसीलिए शरणागति की प्रतीति केवल दिन के कुछ घंटों में होती है। नवरत्न में महाप्रभुजी की 'वत् सततम' की आज्ञा इसी अनुसन्धान के लिए है।