श्लोक १६-१७ : भगवत्शरणागति की अनन्यता और काल की निवर्तकता
इस खंड में श्रीहरिरायजी ने २४वें शिक्षापत्र में कल भगवत्शरणागति की अनन्यता का निरूपण जारी रखा। चातक पक्षी के उदाहरण से समझाया कि भक्त को भगवान के प्रति पूर्णतः आश्रित रहना चाहिए। ऐसी शरणागति पुष्टिमार्ग में सर्वोपरि धर्म है क्योंकि भगवान सर्वसामर्थ्यवान हैं। वक्ता ने संगदोष से बचने और उत्तम भक्तों का सत्संग करने पर जोर दिया, चाहे वह प्रकट रूप में हो या शास्त्रों के अनुसरण से। काल को भगवान की इच्छाशक्ति की विभूति बताते हुए, यह समझाया गया कि भगवदीय भक्तों पर उसका कोई सामर्थ्य नहीं है।
प्रश्नोत्तर : काल के स्वरूप और भक्तों पर उसके प्रभाव की चर्चा
इस खंड में काल के स्वरूप और उसके प्रभाव पर गहन प्रश्नोत्तर किए गए। एक प्रतिभागी ने ‘महामलीन सृष्टि’ पद के अर्थ पर प्रश्न किया, जिस पर वक्ता ने स्पष्ट किया कि काल का आदि भौतिक स्वरूप ही कलिकाल है, जो मलिन है। भगवत विभूति रूप काल स्वरूपतः मलिन नहीं होता, बल्कि उसका व्यष्टि स्वरूप मलिनता लाता है, जिससे सृष्टि प्रभावित होती है। वक्ता ने समझाया कि काल हर जीव को ग्रसित करता है, परन्तु जो भक्त भगवान के प्रमेयबल से बच जाते हैं, वे अपवाद हैं। चर्चा में यह भी स्पष्ट किया गया कि काल की समष्टि में उत्पत्ति और स्थिति दोनों होती हैं, जबकि व्यष्टि स्वरूप ग्रसित करता है।