मंगलाचरण
(सत्र का प्रारंभ मंगलाचरण से होता है।)
शिक्षापत्र २४ का परिचय और शरणागति का आधार
श्रीपुरुषोत्तम श्रीहरिजी ने शिक्षापत्र २४ में भक्तिमार्ग में भगवत कृपा की सर्वोपरिता का निरूपण किया है। यह कृपा परंपराया श्रीमहाप्रभुजी के द्वारा प्राप्त होती है। इस बात को सिद्ध करने के लिए अनेक उदाहरण दिए गए, जिनमें ब्रज की लीला के विभिन्न माध्यमों से प्राप्त कृपा का उल्लेख है। श्रीहरिरायजी ने महाप्रभुजी को भगवत कृपा प्राप्त करने का सर्वोपरि माध्यम बताया है और शरणागति की साधनरूपता का वर्णन किया। कृष्णाश्रय के पाठ से शरणागति सिद्ध होने का महाप्रभुजी का वचन ही सर्वोपरि साधन है।
कारिका ९ — चातक पक्षी के समान दृढ़ आश्रय
श्रीहरिरायजी चातक पक्षी के उदाहरण से शरणागति की दृढ़ता को स्पष्ट करते हैं। जिस प्रकार चातक पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र के जल की अपेक्षा रखता है और पृथ्वी पर अन्य जल स्रोतों की उपेक्षा करता है, उसी प्रकार वैष्णवों को केवल श्रीकृष्ण का दृढ़ आश्रय रखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण घनश्याम रूप हैं, और जैसे स्वाति नक्षत्र में वर्षा होती है, वैसे ही भगवान अपने कृपानंद की वर्षा उस भक्त पर करते हैं जिसका आश्रय दृढ़ होता है। पुष्टिभक्ति मार्ग में कृष्ण के अतिरिक्त अन्य अवतारों या देवताओं से फल की अपेक्षा करना निषिद्ध है।
कारिका १० — भगवान की सर्वसामर्थ्यता
श्रीहरिरायजी कहते हैं कि यदि भक्त में ऐसा शुद्ध भावयुक्त विश्वास हो, तो सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। हमारे स्वामी प्रभु करतुम, अकरतुम, अन्यथा करतुम सभी सामर्थ्यों से युक्त हैं। इसलिए, जब भक्त निस्साधनता और शुद्ध भाव से भगवान के प्रति समर्पित होता है, तो भगवान अपनी स्वेच्छा से भक्त के लिए सब कुछ प्रदान करते हैं। भगवान को भक्तों द्वारा किए गए साधनों की अपेक्षा नहीं होती।
कारिका ११ — भगवान को साधनों की अपेक्षा नहीं एवं निस्साधनता
श्रीकृष्ण स्वतः सामर्थ्य युक्त हैं और उन्हें भक्तों के साधनों की अपेक्षा नहीं होती। अन्य देवताओं के लिए साधन के अनुरूप फल देने की व्यवस्था है, परन्तु श्रीकृष्ण में ऐसा नहीं है। वे दुष्टसाधन जीवों पर भी कृपा करते हैं, जैसे अजामिल के प्रसंग में। कलयुग के जीवों की परिच्छिन्न सामर्थ्य को भगवान जानते हैं। रास पंचाध्यायी में ब्रजभक्तों ने जब पूर्ण दैन्य भाव प्रकट किया तब भगवान पुनः प्रकट हुए। दामोदर लीला में यशोदाजी के निस्साधन होने पर ही भगवान बंधे।
प्रश्नोत्तर — निस्साधनता का भाव
प्रतिभागी ने 'निस्साधनत्व संस्त्यात दृढ़ स्यात पदाशय' श्लोक में प्रयुक्त 'स्फूर्ति' शब्द के अर्थ पर प्रश्न पूछा। वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'स्फूर्ति' शब्द यहाँ भगवत भाव और निस्साधनता की भावना के संदर्भ में प्रयुक्त है। यह भगवान के स्वरूप का विचार और निस्साधनता की भावना से संबंधित है, जिसका तात्पर्य गहरा, गूढ़ अर्थ है।
कारिका १२ — आसुरी जीवों का अविश्वास और संगदोष
श्रीहरिरायजी बताते हैं कि भगवान में अविश्वास केवल आसुरी जीवों को होता है। उनके संग के कारण दैवी जीवों में भी आसुरावेश हो सकता है, जिससे भगवान के प्रति संशय या अन्यथा भाव प्रकट हो सकते हैं। अतः ऐसे आसुरी जीवों का संग कभी नहीं करना चाहिए। ऐसे संग से हमारी बुद्धि भ्रमित होती है, मोह उत्पन्न होता है, और अविश्वास जैसे दोष आते हैं। इससे निस्साधनता का भाव नहीं आ पाता और 'मैं ही करता हूँ' ऐसा अहंता दोष बना रहता है।
कारिका १३ — भगवत्कथा श्रवण से दैन्य और साधन नाश
आसुरावेश और अहंता भाव की निवृत्ति के लिए भक्तों के चरित्रों का श्रवण-मनन-चिंतन करना चाहिए। प्रह्लादजी और ब्रजभक्त आदि के चरित्रों का भागवतजी से अनुसंधान करने पर चित्त में भगवत्प्रेरणा आती है और विपरीत भाव निवृत्त होते हैं। श्रीमहाप्रभुजी के शिष्यों और चौरासी वैष्णवों की वार्ता के चरित्रों का अनुसंधान करने से दीनता और स्वाभाविक निस्साधनता का भाव प्रकट होता है। इससे प्राकृत दोष और असुरावेश की निवृत्ति होती है। श्रीआचार्यजी महाप्रभु ने भक्तिवर्धिनी में 'सेवायाम्वा कथायाम्वा वा' कहकर सेवा और भगवत्कथा श्रवण दोनों को कर्तव्य बताया है। भगवत्कथा श्रवण से दैन्य भाव उत्पन्न होता है और अहंता रूप साधन अभिमान का नाश होता है।
कारिका १४ — तदीय भाव का भावन और काल का प्रभाव
श्रीहरिरायजी कहते हैं कि निरंतर तदीय भक्तों के भावों से भावित होने पर सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। हम स्वयं परिपक्व भक्त नहीं हैं, अतः हमें भगवान में दृढ़ और उत्तम भाव सिद्ध करने वाले भक्तों (तदीय) के भावों का अनुसरण करना चाहिए। इससे फलसिद्धि होती है और भगवान हमारे भावों को स्वीकार करते हैं। गोपिका गीत के श्लोक 'तव कथामृतम तप्त जीवनम...' में भगवान की कथा को षट्गुणों (ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य) से युक्त बताया गया है, जो भगवान और उनके चरित्रों में एकत्व का बोध कराता है। काल का कार्य नाश करना है, परन्तु भगवान के प्रति आश्रित भक्तों को काल से कोई भय नहीं होता। भगवान से बहिर्मुख होने पर काल का विपरीत प्रवाह सभी साधनों का नाश कर अधोगति को प्राप्त कराता है।