मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है।
शिक्षापत्र २४, श्लोक १९ : काल की चिंता नहीं
इस खण्ड में २४वें शिक्षापत्र के १९वें श्लोक पर चर्चा की गई है, जहाँ बताया गया है कि काल भक्त को बाधा रूप नहीं हो सकता। काल भगवान की शक्ति होने के कारण उनके अधीन है, इसलिए भगवत्भक्तों पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता यदि भक्त भगवान के प्रति पूर्णतः आश्रित हो। श्री महाप्रभुजी ने नवरत्न ग्रंथ में 'तथ तस लीलेति मत्वा चिंताम धतम तजेत' वचन द्वारा चिंता त्यागने की आज्ञा की है। 'हरि सर्वम निच्छात करिशति विवेक' के अनुसार, प्रत्येक कार्य को भगवत्लीला जानकर चिंतित नहीं होना चाहिए। इस विवेक को चित्त में बनाए रखते हुए हर परिस्थिति का स्वीकार करना चाहिए, यही भक्त का धर्म है।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २० : हरि इच्छा ही विवेक
शिक्षापत्र के २०वें श्लोक में समझाया गया है कि सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण आदि सभी सृष्टि संबंधी कार्य भगवान के नियामक हैं। इस ब्रह्मांड में भगवान की इच्छा के अतिरिक्त कुछ भी कभी हो नहीं सकता है। इसी विवेक को अपने चित्त में बनाए रखते हुए हमें सब कुछ करना चाहिए और हर परिस्थिति का स्वीकार करना चाहिए। श्री आचार्यजी महाप्रभुजी ने विवेकधैर्याश्रय में 'विवेकस्तु हरि सर्व निज इच्छात करिशति' कहा है। यहाँ 'निज' पद के दो अर्थ बताए गए हैं: भगवान की अपनी इच्छा और भगवान के निकटवर्ती निज भक्तों की इच्छा। दोनों ही अर्थों को ध्यान में रखकर परिस्थिति का स्वीकार करना चाहिए।
प्रश्नोत्तर : विवेक और धैर्य की आवश्यकता
इस खण्ड में एक प्रतिभागी ने वृत्रासुर का उदाहरण देकर पूछा कि यदि सामान्य साधना अवस्था में आपातकाल आ जाए, तो क्या उसे अपने कर्मों का फल समझना चाहिए या भगवान की लीला? वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'हरि सर्वम निच्छात करिशति' का विवेक समय के साथ आता है, यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। धैर्य धारण करने का मुख्य प्रयोजन यह है कि हमारी भक्ति में बाधा न आए। हमें स्वयं को मानसिक रूप से मजबूत बनाने या धीर-गंभीर बनने के लिए यह सब नहीं करना है, बल्कि भगवत्सेवा में विक्षेप न हो, इस हेतु से चित्त को स्वस्थ रखना है। ठाकुरजी के सन्मुख सेवा करते समय हमें रोते हुए या अप्रसन्न नहीं जाना चाहिए।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २१ : प्रभु के चरणारविंद में आसक्ति
यहाँ शिक्षापत्र के २१वें श्लोक का निरूपण किया गया है। श्री हरिरायजी अपने छोटे भाई श्रीगोपेश्वरजी को आज्ञा दे रहे हैं कि उन्हें चिंतातुर नहीं होना चाहिए। वे भगवत्संबंधी हैं, भगवत्भाव और भगवद्वार्ता सुनते हैं, तथा बहुत सत्संग करते हैं। उनकी प्रभु श्रीकृष्ण और श्री आचार्यजी महाप्रभुजी के पदकमलों में प्रीति है। ऐसे भक्त को किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उनकी आसक्ति केवल प्रभु के चरणारविंद में ही है।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २२ : धर्म की रक्षा
शिक्षापत्र के २२वें श्लोक में बताया गया है कि भगवान धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं और उसकी रक्षा करते हैं। जो कोई भी वेद धर्म का अतिक्रमण कर मनमानी क्रिया करता है, भगवान उसे स्वीकार नहीं करते। ऐसी कृति भगवान को प्रसन्नता देने के अनुरूप नहीं होती। एक कीर्तन का उद्धरण देते हुए समझाया गया कि भगवान ने विभिन्न युगों में धर्मस्थापन और भक्तों के उद्धार के लिए अवतार लिए, जैसे कलियुग में श्रीवल्लभ महाप्रभुजी प्रकट होकर मायावाद का निवारण किया।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २३ : भगवान् की दयालुता और अपने दोष का विचार
इस खण्ड में २३वें श्लोक पर प्रकाश डाला गया है, जहाँ श्रीकृष्ण को ब्रह्मण्य, धेनु और विप्रों का ईश, तथा वेद धर्म का मुख्य पालक बताया गया है। भगवान इन सभी की रक्षा का व्रत धारण करते हैं। वे बहिर्मुख जीवों द्वारा किए गए विपरीत कृत्यों को सहन नहीं कर सकते और ऐसे आचरण से प्रसन्न नहीं होते। वक्ता ने कहा कि भगवान परम आनंद रूप और परम दयालु हैं, जो किसी भी जीव के दुख को सहन नहीं कर पाते। यदि लौकिक या वैदिक कार्यों में सिद्धि न मिले या किसी वस्तु की हानि हो, तो भगवदीय को अपना ही दोष समझना चाहिए, क्योंकि हमारी अस्वस्थता भगवान को प्रसन्नता नहीं देती।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २४ : भगवत्सुख का विचार और अप्रसन्नता से बचना
यह खण्ड शिक्षापत्र के २४वें श्लोक पर केंद्रित है। श्रीकृष्ण परम आनंद के समूह और निरंतर अत्यंत दयालु हैं, इसलिए वे मनुष्य में दया के अभाव को कैसे सहेंगे। अतः जो कुछ भी घटित होता है, वह अपने दोष के कारण ही होता है। भगवदीय का लक्षण है कि अपनी अस्वस्थता को दबाकर भी प्रभु की प्रसन्नता हेतु अपने चित्त को स्वस्थ करें। गोविंदास भल्ला की वार्ता का उदाहरण देते हुए बताया गया कि प्रभु को अप्रसन्नता होती है यदि हम दुखी चेहरे से उनके पास जाएँ। पुष्टिमार्ग में ठाकुरजी के सामने प्रार्थना न करना या अपनी समस्याएँ न बताना एक अनुशासन है, जिसका एक प्रयोजन भगवत्सुख का विचार है। हम प्रभु को अपने दुख में सहभागी नहीं बनाना चाहते, ताकि उन्हें उद्वेग या अप्रसन्नता न हो। ठाकुरजी के सामने रोना, ऊंची आवाज में बोलना, या बुरे चेहरे से जाना पुष्टिमार्गीय अपराध माने गए हैं, जिनके लिए प्रायश्चित विधान भी बताया गया है।