॥ शिक्षापत्र २४_श्लोक १६-१७ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 28 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र शिक्षापत्र २४ पर आधारित है, जिसमें श्रीहरिरायजी महाराज ने काल की निवर्तकता का निरूपण किया है। सत्र की शुरुआत में विगत सत्र के विषय, भगवत् शरणागति की अनन्यता और संग दोष के महत्व पर प्रकाश डाला गया। तत्पश्चात, शिक्षापत्र के श्लोक १६ और १७ के माध्यम से काल के स्वरूप, उसके भेदों तथा भगवदीय भक्तों पर उसके अप्रभाव का विस्तृत विवेचन किया गया। काल को सर्प की उपमा देते हुए, अमृतपान के दृष्टांत से पुष्टिभक्ति अमृत रस का पान करने वाले जीवों की सुरक्षा को स्पष्ट किया गया।

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मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है। इसमें गुरुवंदना, श्रीवल्लभाचार्यजी और अन्य आचार्यों को नमन किया जाता है। मंगलाचरण का उद्देश्य सत्र को निर्विघ्न सम्पन्न करने और श्रोताओं के हृदय में भगवत् स्मरण स्थापित करना है। इस भाग में किसी श्लोक या विषयवस्तु का विवरण नहीं दिया गया है।
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विगत सत्र का सार — भगवत् शरणागति और संग दोष का विवेचन
००:०९ – ०३:४४ — विगत सत्र का सार — भगवत् शरणागति और संग दोष का विवेचन
विगत सत्र का सार — भगवत् शरणागति और संग दोष का विवेचन
श्रीहरिरायजी ने शिक्षापत्र २४ में भगवत् शरणागति की अनन्यता का निरूपण चातक पक्षी के उदाहरण से किया था। भक्त को भगवान के प्रति पूर्णतः आश्रित रहना चाहिए, क्योंकि भगवान सर्व सामर्थ्यवान हैं और साधन की अपेक्षा नहीं रखते। अन्य देवताओं की तरह भगवान विधि बल से बंधे हुए नहीं हैं। इसके उपरांत संग दोष का वर्णन करते हुए बताया गया कि भगवान पर अविश्वास आसुरी जीवों के संग से होता है। उत्तम भक्तों का सत्संग प्रत्यक्ष व्यक्तियों या शास्त्रों (जैसे भागवत) के अनुसरण से करना चाहिए, जिससे भगवत् शरणागति में दृढ़ता आती है। भक्तों के भावों के भावन से भगवान प्रसन्न होते हैं और काल भी उनकी हानि नहीं कर सकता।
३
शिक्षापत्र १६ — काल की भगवत्-विभूति रूपता और भक्तों पर उसका अप्रभाव
०३:४५ – ०९:०४ — शिक्षापत्र १६ — काल की भगवत्-विभूति रूपता और भक्तों पर उसका अप्रभाव
शिक्षापत्र १६ — काल की भगवत्-विभूति रूपता और भक्तों पर उसका अप्रभाव
शिक्षापत्र की १६वीं कारिका में श्रीहरिरायजी काल की निवर्तकता का निरूपण कर रहे हैं। काल भगवान की ही इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति का स्वरूप है, जिसे गीताजी में भगवान की विभूति कहा गया है। काल के तीन भेद बताए गए — आदिदैविक (भगवान की चेष्टा रूप), आध्यात्मिक (अक्षर ब्रह्म के कार्य वेद रूप), और आदि भौतिक (गणना रूप जैसे कलयुग)। काल का आदि भौतिक स्वरूप कलिकाल होने के कारण मलिन है। परंतु, भगवान के जो भक्त पूर्णतः आश्रित हैं, उनके ऊपर इस मलिन काल का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और उन्हें काल से भयभीत नहीं होना चाहिए। भगवान के भक्त काल के प्रभाव से सुरक्षित रहते हैं।
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शिक्षापत्र १७ — काल का सर्प के समान स्वरूप और अमृतपान के दृष्टांत से भक्तों की सुरक्षा
०९:०५ – २०:२७ — शिक्षापत्र १७ — काल का सर्प के समान स्वरूप और अमृतपान के दृष्टांत से भक्तों की सुरक्षा
शिक्षापत्र १७ — काल का सर्प के समान स्वरूप और अमृतपान के दृष्टांत से भक्तों की सुरक्षा
शिक्षापत्र की १७वीं कारिका में काल को सर्प की उपमा दी गई है, जैसे सर्प सबको निगलता है, वैसे ही काल सभी का नाश करता है। परंतु, जिस प्रकार अमृतपान किए हुए व्यक्ति पर सर्प के दंश का प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार भगवान के चरणामृत और अधारामृत (जो भक्ति द्वारा प्राप्त होते हैं) का पान करने वाले भक्त को काल से कोई भय नहीं होता। श्रीगोसाईंजी ने सप्तश्लोकी में महाप्रभुजी की स्तुति करते हुए कहा है कि उनके कृपा कटाक्ष रूपी चंद्र के उदित होने से पाप रूपी अंधकार, काल रूपी सर्प और विषय रूपी समुद्र से जीव को एक क्षण में अमरता प्राप्त होती है। पुष्टिमार्गीय भगवतीय, जो श्रीमहाप्रभुजी का आश्रय लेकर भक्ति रूप अमृत रस का पान करते हैं, उन्हें कलिकाल के दोषों से डरने की आवश्यकता नहीं।
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प्रश्नोत्तर — काल और सृष्टि की मलिनता का स्वरूप
२०:२८ – २८:२० — प्रश्नोत्तर — काल और सृष्टि की मलिनता का स्वरूप
प्रश्नोत्तर — काल और सृष्टि की मलिनता का स्वरूप
चर्चा में यह प्रश्न उठा कि क्या काल स्वयं महामलीन है या सृष्टि। वक्ता ने स्पष्ट किया कि काल स्वरूपतः मलिन नहीं होता, क्योंकि वह भगवान की विभूति है। काल का जो आदि भौतिक स्वरूप है, जिसे हम कलयुग कहते हैं, वह मलिन होता है। इस व्यष्टि काल के प्रभाव के कारण ही सृष्टिगत पदार्थों में मलिनता आती है और काल उन्हें धीरे-धीरे ग्रसित करता है, जिससे हम नाश की ओर अग्रसर होते हैं।
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प्रश्नोत्तर — व्यष्टि काल और जीव पर उसका प्रभाव
२८:२१ – ३२:१५ — प्रश्नोत्तर — व्यष्टि काल और जीव पर उसका प्रभाव
प्रश्नोत्तर — व्यष्टि काल और जीव पर उसका प्रभाव
प्रतिभागी ने यह प्रश्न किया कि क्या काल का जीव पर व्यक्तिगत प्रभाव होता है, या वह कर्म और प्रारब्ध के हिसाब से होता है। वक्ता ने समझाया कि काल सामान्यतः सभी को ग्रसित करता है, विशेषकर शरीर को, जीव को नहीं। जो जीव इस प्रभाव से बच जाते हैं, वे अपवाद हैं, और यह भगवान के प्रमेय बल के कारण होता है। काल हर जीव के लिए अपने-अपने गति से कार्य करता है; यदि ऐसा न होता तो दैवी जीव को आसुरावेश क्यों होता।
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प्रश्नोत्तर — कलि, काल और सृष्टि की मलिनता का पुनः स्पष्टीकरण
३२:१६ – ३७:०९ — प्रश्नोत्तर — कलि, काल और सृष्टि की मलिनता का पुनः स्पष्टीकरण
प्रश्नोत्तर — कलि, काल और सृष्टि की मलिनता का पुनः स्पष्टीकरण
एक प्रतिभागी ने कलि (कलयुग) और काल के मलिन स्वरूप को लेकर और स्पष्टता मांगी। वक्ता ने पुनः दोहराया कि काल का समष्टि स्वरूप (आदिदैविक) भगवान की क्रियाशक्ति है, जो सृष्टि की उत्पत्ति और स्थिति का कारण है। ग्रसित करने का कार्य काल के व्यष्टि स्वरूप (कलयुग) का धर्म है। भक्तों पर कलयुग का प्रभाव नहीं पड़ता, यह अपवाद है, क्योंकि सामान्यतः तो हम सभी नाश की ओर बढ़ रहे हैं और हमारी शक्तियाँ भी कम हो रही हैं।
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प्रश्नोत्तर — पाश्चात्य संस्कृति में काल और नर्क की अवधारणा
३७:१० – ४०:४० — प्रश्नोत्तर — पाश्चात्य संस्कृति में काल और नर्क की अवधारणा
प्रश्नोत्तर — पाश्चात्य संस्कृति में काल और नर्क की अवधारणा
एक प्रतिभागी ने ईसाई धर्म में जन्मदिन पर केक काटने की परंपरा का संदर्भ दिया। वक्ता ने बताया कि पाश्चात्य सिद्धांत के अनुसार, मनुष्य पाप की संतान है (आदम के पाप के फल स्वरूप)। जन्मदिन पर केक काटने का अर्थ है कि व्यक्ति ने अपने 'नर्क निवास' का एक साल काट दिया है। यह अवधारणा भी कहीं न कहीं काल द्वारा जीवन को ग्रसित करने और समय के साथ उसके नाश होने से जुड़ी है, जिसे वे अंधन तमस के रूप में देखते हैं।
📖 सार
📌 सार
• शिक्षापत्र २४ में श्रीहरिरायजी ने भगवत् शरणागति की अनन्यता और संग दोष की निवृत्ति पर जोर दिया।
• काल भगवान की ही इच्छाशक्ति और विभूति है, जो आदिदैविक, आध्यात्मिक और आदि भौतिक स्वरूपों में प्रकट होती है।
• कलयुग में काल का आदि भौतिक स्वरूप महामलीन होता है, जिससे सृष्टि के पदार्थों में मलिनता आती है।
• भगवदीय भक्तों को काल से भयभीत नहीं होना चाहिए, क्योंकि भगवान स्वयं उसकी संचालकता करते हैं।
• काल को सर्प के समान उपमित किया गया है, परंतु पुष्टिभक्ति रूप अमृतपान करने वाले जीवों पर उसका प्रभाव नहीं होता।
• श्रीमहाप्रभुजी के कृपा कटाक्ष से जीव को पाप, काल और विषय रूपी अंधकार से मुक्ति मिलती है।
• काल का व्यक्तिगत प्रभाव शरीर पर पड़ता है; भक्तों का काल के प्रभाव से बचना भगवान के प्रमेय बल का परिणाम है।