शिक्षापत्र २४, श्लोक २६ : भगवान की निर्दोषता और अपना दोष विचार
वक्ता इस श्लोक के माध्यम से यह आज्ञा करते हैं कि भगवान में कभी भी कोई प्रकार का दोष नहीं होता, वे सदा निर्दोष और पूर्ण गुणवान हैं। हमारे जीवन में घटित होने वाली किसी भी अप्रिय घटना के लिए प्रभु को दोष नहीं देना चाहिए। प्रभु तो सदा हमारे लिए उत्तम ही करते हैं, अतः क्लेश होने पर अपने ही दोष और कर्मों का विचार करना चाहिए। भगवान सभी दुखों के हरणकर्ता और सर्व सामर्थ्यवान हैं, इसलिए उनके ऊपर किसी भी प्रकार के दोषारोपण से बचना चाहिए। यह चित्त में दृढ़ता से रखना चाहिए कि भगवान भक्त का अहित कभी नहीं करते।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २७ : प्रभु की इच्छा और उद्धवजी का दृष्टान्त
इस श्लोक में श्री हरिरायजी यह आज्ञा करते हैं कि भगवान की इच्छा को समझ पाना हमारे सामर्थ्य की बात नहीं है। उद्धवजी का उदाहरण देते हुए वक्ता समझाते हैं कि उद्धवजी जैसी अत्यधिक भगवद्भक्ति के बावजूद भगवान ने उन्हें अपने अंतर्धान के समय पृथ्वी पर रहने की आज्ञा दी। उद्धवजी को विप्रयोग का अत्यधिक अनुभव हुआ था, परंतु विदुरजी के उद्धार के लिए भगवान की ऐसी ही इच्छा थी। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान की इच्छा को जान पाना कठिन है और हम जैसे तुच्छ जीवों के साथ तो ऐसा कुछ भी संभव है।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २८ : कुंतीजी का भाग्य और विप्रयोग का अनुभव
वक्ता कुंतीजी के उदाहरण से विप्रयोग के अनुभव को समझाते हैं। कुंतीजी ने युधिष्ठिरजी के राज्य संभालने के बाद धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ वन में निवास किया। जब उन्हें भगवान की असुरमोह लीला का समाचार प्राप्त हुआ, तो उन्होंने तुरंत अग्नि दाह के द्वारा अपने देह का त्याग कर दिया। श्री हरिरायजी कुंतीजी की प्रशंसा करते हुए आज्ञा करते हैं कि ऐसा भाग्य सभी का नहीं होता कि उन्हें भगवान के बिना रहना ही न पड़े। उद्धवजी को भगवान की आज्ञा से विप्रयोग सहन करना पड़ा, जबकि कुंतीजी को नहीं।
शिक्षापत्र २४, श्लोक २९ : पुष्टिमार्गीय भक्तों को विप्रयोग का अभाव
इस श्लोक में श्री हरिरायजी पुष्टिमार्गीय भक्तों के लिए विप्रयोग की संभावना को निराधार बताते हैं। वे आज्ञा करते हैं कि हमारे प्रभु तो अखंडित रूप से नित्य प्रत्यक्ष विराजमान हैं। श्री आचार्यजी द्वारा ब्रह्मसम्बन्ध प्राप्त हुए भक्तों के घर में प्रभु सदा विराजमान रहते हैं। वक्ता कहते हैं कि अवतार काल यद्यपि उत्तम लगता है, परंतु भगवान अवतार काल में भी सबको उतने सुलभता से प्राप्त नहीं होते जितने सेवाकर्ता को। अतः पुष्टिमार्गीय भक्त को विप्रयोग का विचार कर दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि भगवान सदा हमारे घर में ही विराजमान होते हैं।
शिक्षापत्र २४, श्लोक ३० : शिक्षापत्रों के अनुसंधान से संशय निवारण
श्री हरिरायजी इस श्लोक में यह आज्ञा करते हैं कि इन शिक्षापत्रों का अनुसंधान अन्य भगवदीय पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के साथ बैठकर करना चाहिए। ऐसा करने से चित्त में जो भी उद्वेग या संशय है, वह निवृत्त होगा और उत्तम बुद्धि अर्थात भगवत् भाव की पोषिका बुद्धि सिद्ध होगी। वक्ता समझाते हैं कि यह शिक्षापत्र व्यक्तिगत नहीं, बल्कि भक्ति मार्गीय सिद्धांतों के विचार से लिखे गए हैं, और सामूहिक विचार-विमर्श से ही इनके मर्म को समझा जा सकता है। इससे मन की चिंता और सभी संदेह दूर हो जाते हैं।
शिक्षापत्र २४, श्लोक ३१ : श्री कृष्ण शरणम मम ही साधन और साध्य
श्री हरिरायजी इस अंतिम श्लोक में उपसंहार करते हुए आज्ञा करते हैं कि पुष्टिमार्गीय भक्तों के लिए साधन और फल दोनों ही अष्टाक्षर मंत्र 'श्री कृष्ण शरणम मम' में निरूपित भगवत् शरणागति ही है। महाप्रभुजी ने यह मंत्र प्रदान किया है, जिससे भगवान की शरणागति की सिद्धि होती है। भगवान का ही आश्रय हृदय में दृढ़ होता है, और मन, वचन, कर्म से भगवान का ही शरण सिद्ध होता है। यह शरणागति ही साधन रूप भी है और फल रूप भी है। संपत्ति और आपत्ति, दोनों ही स्थितियों में केवल भगवत् शरण की भावना रखनी चाहिए, जैसा महाप्रभुजी ने विवेक दैराश्रय में भी आज्ञा की है। यह मंत्र ही यह लोक और परलोक संबंधी सभी निश्चिंतता प्रदान करता है। वक्ता श्री गोसाईंजी की विज्ञप्ति का संदर्भ देते हैं, जिसमें इस मंत्र को महाप्रभुजी द्वारा प्रदत्त बताया गया है।
शिक्षापत्र २५, श्लोक १ : आचार्यचरण का आश्रय और फल का संशय
पंचविंश शिक्षापत्र का प्रारंभ आचार्यचरणों के आश्रय के महत्व से होता है। वक्ता आज्ञा करते हैं कि हमारे मार्ग में श्री महाप्रभुजी और श्री गोसाईंजी का ही आश्रय करना चाहिए, उन्हें ही हृदय में धारण करना चाहिए। ऐसा करने पर भक्ति मार्गीय फल की सिद्धि में कोई संशय नहीं रहता। यदि किसी व्यक्ति को भक्ति मार्ग या उसके साधनों में संशय होता है, तो उसे आसुरी जीव जानना चाहिए। वक्ता बताते हैं कि सुबोधिनी आदि ग्रंथ उपलब्ध होने के बावजूद यदि कोई भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं होता, तो यह भगवान की कृपा के अभाव का सूचक है। जिस प्रकार प्राण के बिना इंद्रियों की वृत्ति नहीं होती, उसी प्रकार प्रभु की कृपा बिना साधन का उपयोग नहीं होता। करोड़ों साधन करने और सभी धर्मों का पालन करने पर भी यदि श्री आचार्यजी के चरण कमल का आश्रय सिद्ध न हो, तो कुछ भी सिद्ध नहीं होता।
शिक्षापत्र २५, श्लोक २ : श्री वल्लभाचार्यजी के चरण कमल भजन का महत्व
यह श्लोक श्रीवल्लभाचार्यजी के चरण कमल के भजन की महिमा का निरूपण करता है। वक्ता आज्ञा करते हैं कि जो वैष्णव श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणारविंद का आदर पूर्वक भजन करते हैं और उनमें अनन्य भाव रखते हैं, उन पर दयालु श्रीहरि कभी उनका त्याग नहीं करते। सूरदासजी के पद 'भरोसो दृढ़ इन चरणन केरो। श्री वल्लभ नखचंद्र छटा बिन सब जग माहि अंधेरो।' का दृष्टान्त देते हुए वक्ता समझाते हैं कि श्री आचार्यजी महाप्रभु के चरण कमल की सेवा में आदर करने वाले वैष्णवों पर श्रीकृष्ण सदा दया करते हैं, प्रसन्न होकर कृपा करते हैं और अपने स्वरूपानंद का दान करते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि महाप्रभु के प्रति शरणागति ही भक्ति मार्ग में प्राथमिक साधना और हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है, क्योंकि हमें भगवान की प्राप्ति महाप्रभु के कारण ही होती है। जो व्यक्ति महाप्रभु के प्रति अनन्याश्रित न होकर भगवत् शरणागति का दिखावा करता है, वह पाखंड मात्र है, क्योंकि 'निष्ठा च साधन रेव न मनोरथ वार्तया' अर्थात् हमारी कर्तव्यपरायणता और निष्ठा ही महाप्रभु की आज्ञा के प्रति हमारी दृढ़ता को सिद्ध करती है, केवल बातों से नहीं।