मंगलाचरण
[मंगलाचरण का कोई विवरण यहाँ नहीं दिया गया है।]
शिक्षापत्र २५ का परिचय एवं श्लोक १-५ का विवेचन
श्रीहरिरायजी ने २४वें शिक्षापत्र के विषय का स्मरण कराते हुए २५वें पत्र का प्रारंभ किया, जहाँ भक्त भगवान की शरणागति में ही अभय का अनुभव करता है। महाप्रभुजी और श्रीगुसाईंजी के प्रति दृढ़ शरणागति हो तो भगवत्प्राप्ति रूपी फल में कोई संशय नहीं होना चाहिए; संशय करने वाले जीव आसुरी होते हैं। श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणकमलों के भजन में आदर करने वाले भक्तों पर श्रीहरि सदा दया करते हैं। श्रीआचार्यजी के कृपाकटाक्ष से श्रीठाकुरजी भक्तों के लाखों अपराध क्षमा कर देते हैं, जैसा कि पद्मनाभदास की वार्ता से स्पष्ट होता है। जिनके हृदय में श्रीआचार्यचरणद्वय विराजते हैं, उनके शताधिक अपराधों का नाश कर प्रतिबंध दूरी होती है। रामानंद पंडित के चरित्र का उदाहरण दिया गया, जहाँ महाप्रभुजी के त्यागने पर भी ठाकुरजी ने अपना वचन निभाते हुए उनका त्याग नहीं किया। महाप्रभुजी के चरणारविंद के नखचंद्र की शीतलता से भक्तों के त्रिविध ताप दूर होते हैं और श्रीकृष्ण से मिलन में सभी पाप रूप प्रतिबंध नष्ट होते हैं। लोक और वेद में कहे गए सभी फल पुष्टिमार्गीय जीव के लिए तुच्छ हैं, क्योंकि श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणामृत ही परम फल रूप हैं, जिनसे श्रीकृष्णाधरामृत की सिद्धि होती है। मधुसूदन सरस्वती के भक्ति भगवद्भक्ति रसायनम् के मंगलाचरण का भी उल्लेख हुआ।
श्लोक ५: श्रीआचार्यचरणद्वय ही परम फल एवं श्लोक ६-७ का विवेचन
श्रीहरिरायजी ने लोक और वेद में वर्णित समस्त फलों को पुष्टिमार्ग के परम फल की तुलना में तुच्छ बताया। पुष्टिमार्गीय जीव को मोक्ष चतुष्टय की भी आकांक्षा नहीं होती, क्योंकि पुष्टिमार्ग का परम फल श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणकमलों का आश्रय है। यहीं पर स्व-रूपाफलाकांक्षा राहित्यम् पुष्टि भक्ति का लक्षण बताया गया। वेदविहित कर्म निश्चय फल को उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि उनका चित्त भगवान से भिन्न श्रवण में बहिर्मुख होता है। पुष्टिमार्गीय फल केवल श्रीमहाप्रभुजी की कृपा से साध्य है, साधन से सिद्धि नहीं। निसाधन फलात्मकाय कृष्ण प्रादुर्भव का सिद्धांत समझाते हुए बताया कि बहिर्मुख जीवों को भगवत्कथा अमृत और भगवद्धर्म सुनना पसंद नहीं आता। ज्ञान मर्यादा भक्ति को उत्पन्न कर सकता है, परंतु वह फल रूप नहीं है, क्योंकि मर्यादा भक्ति जीव के दासत्व के कारण रूप भेद को मिटाती है। पुष्टिमार्ग में जीव और प्रभु का स्वामी-सेवक भाव मुख्य है, और ज्ञान एवं मुक्ति इस भाव के विरोधी हैं। इसलिए पुष्टिमार्गीय भक्त भगवान में एकत्व या सायुज्य फल नहीं चाहते। गीता में भगवान द्वारा ज्ञानी भक्त को प्रिय बताने का संदर्भ मर्यादा मार्ग से संबंधित है।