शिक्षापत्र २५ : गत सत्र का स्मरण एवं पुष्टिभक्ति की महिमा
श्री हरिरायजी ने गत सत्र में आज्ञा दी कि श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगोसाईंजी के प्रति आश्रित रहने पर ही भगवत् अनुग्रह होता है, और यही भक्ति मार्ग में सर्वोपरि सिद्धि का साधन है। श्रीमहाप्रभुजी के चरणारविंद के प्रताप से ही भक्ति मार्गीय सभी बाधक निवृत्त होते हैं तथा पुष्टि जीव को शास्त्रोक्त किसी फल की आकांक्षा नहीं रहती। निरुपादिक भाव की प्राप्ति भी साधनों से नहीं, अपितु केवल श्रीमहाप्रभुजी की कृपा बल से भगवान की प्रसन्नता होने पर ही होती है। मर्यादा मार्गीय भक्ति के सायुज्य फल की आकांक्षा पुष्टि जीव को नहीं होती, क्योंकि एकत्व की प्राप्ति सेवा भाव को खत्म करने वाली होती है। पुष्टि मार्ग सर्वोपरि है और ज्ञान तथा मर्यादा मार्ग की भक्ति के ऊपर विराजित है।
शिक्षापत्र २५ : आसुरी वृत्ति और हरि कृपा की अनिवार्यता
वक्ता ने स्पष्ट किया कि पुष्टि मार्ग के सिद्धांतों के प्रति संशय रखना आसुरी वृत्ति को दिखाता है। यदि अन्य मार्गों या साधनों को देखकर चित्त में संशय आता है कि अपना मार्ग उत्तम है या नहीं, तो यह आसुरी वृत्ति का कारण है। श्रीमहाप्रभुजी ने विवेकधैर्य आश्रय ग्रंथ में कहा है कि 'अविश्वासो न कर्तव्य सर्वथा बाधकस्तु सह', क्योंकि अविश्वास महाबाधक है। यह आश्चर्य है कि पृथ्वी पर श्रीहरि स्वयं (श्रीमहाप्रभुजी रूप में) प्रकट हुए हैं, श्रीभागवत, सुबोधिनीजी, सत्पुरुष और सभी ग्रंथ विद्यमान हैं, फिर भी जीव भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं होते। इसका कारण केवल श्रीहरि की कृपा है; उनकी कृपा के बिना जीव भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं हो सकता।