॥ शिक्षापत्र २५ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 11 August 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्री हरिरायजी कृत शिक्षापत्र २५ पर आधारित है। इसमें श्री हरिरायजी आज्ञा करते हैं कि श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगोसाईंजी के प्रति आश्रित रहने पर ही भगवत् अनुग्रह प्राप्त होता है, और यही भक्ति मार्ग में सर्वोपरि सिद्धि का साधन है। पुष्टि जीव को निरुपादिक भाव की प्राप्ति तथा भगवत्सेवा की आकांक्षा केवल श्रीमहाप्रभुजी की कृपा से ही होती है। मर्यादा भक्ति से प्राप्त एकत्व की आकांक्षा पुष्टि जीव को नहीं होती, क्योंकि वह भगवत्सेवा के भाव को समाप्त करती है।

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शिक्षापत्र २५ — गत सत्र का स्मरण एवं पुष्टिभक्ति की महिमा
००:०० – २२:०० — शिक्षापत्र २५ — गत सत्र का स्मरण एवं पुष्टिभक्ति की महिमा
शिक्षापत्र २५ : गत सत्र का स्मरण एवं पुष्टिभक्ति की महिमा
श्री हरिरायजी ने गत सत्र में आज्ञा दी कि श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगोसाईंजी के प्रति आश्रित रहने पर ही भगवत् अनुग्रह होता है, और यही भक्ति मार्ग में सर्वोपरि सिद्धि का साधन है। श्रीमहाप्रभुजी के चरणारविंद के प्रताप से ही भक्ति मार्गीय सभी बाधक निवृत्त होते हैं तथा पुष्टि जीव को शास्त्रोक्त किसी फल की आकांक्षा नहीं रहती। निरुपादिक भाव की प्राप्ति भी साधनों से नहीं, अपितु केवल श्रीमहाप्रभुजी की कृपा बल से भगवान की प्रसन्नता होने पर ही होती है। मर्यादा मार्गीय भक्ति के सायुज्य फल की आकांक्षा पुष्टि जीव को नहीं होती, क्योंकि एकत्व की प्राप्ति सेवा भाव को खत्म करने वाली होती है। पुष्टि मार्ग सर्वोपरि है और ज्ञान तथा मर्यादा मार्ग की भक्ति के ऊपर विराजित है।
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शिक्षापत्र २५ — आसुरी वृत्ति और हरि कृपा की अनिवार्यता
२२:०० – ४०:५१ — शिक्षापत्र २५ — आसुरी वृत्ति और हरि कृपा की अनिवार्यता
शिक्षापत्र २५ : आसुरी वृत्ति और हरि कृपा की अनिवार्यता
वक्ता ने स्पष्ट किया कि पुष्टि मार्ग के सिद्धांतों के प्रति संशय रखना आसुरी वृत्ति को दिखाता है। यदि अन्य मार्गों या साधनों को देखकर चित्त में संशय आता है कि अपना मार्ग उत्तम है या नहीं, तो यह आसुरी वृत्ति का कारण है। श्रीमहाप्रभुजी ने विवेकधैर्य आश्रय ग्रंथ में कहा है कि 'अविश्वासो न कर्तव्य सर्वथा बाधकस्तु सह', क्योंकि अविश्वास महाबाधक है। यह आश्चर्य है कि पृथ्वी पर श्रीहरि स्वयं (श्रीमहाप्रभुजी रूप में) प्रकट हुए हैं, श्रीभागवत, सुबोधिनीजी, सत्पुरुष और सभी ग्रंथ विद्यमान हैं, फिर भी जीव भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं होते। इसका कारण केवल श्रीहरि की कृपा है; उनकी कृपा के बिना जीव भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं हो सकता।
📖 सार
📌 सार
* श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगोसाईंजी के प्रति आश्रित रहने पर ही भगवत् अनुग्रह प्राप्त होता है, और यही भक्ति मार्ग में सर्वोपरि सिद्धि का साधन है।
* पुष्टि जीव को शास्त्रों में बताए किसी फल की आकांक्षा नहीं होती, अपितु केवल भगवत्सेवा की आकांक्षा होती है, जो निरुपादिक भाव से श्रीमहाप्रभुजी की कृपा से ही प्राप्त होती है।
* मर्यादा मार्ग की भक्ति तब तक ही फलात्मक है जब तक पुष्टिभक्ति उत्पन्न न हो; ज्ञान और मर्यादा भक्ति के ऊपर पुष्टिभक्ति विराजित है।
* पुष्टिभक्ति साक्षात् श्रीहरि का रास तत्व प्रभाव है, जो श्रीमहाप्रभुजी के रूप में प्रकट हुआ है, अतः उनके चरण कमल के दृढ़ आश्रित रहने से ही फलसिद्धि होती है।
* पुष्टि मार्ग के सिद्धांतों के प्रति संशय रखना आसुरी वृत्ति का सूचक है और भगवत्कृपा के बिना जीव भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं हो सकता।
* जिस प्रकार प्राण के बिना इंद्रियाँ कार्य करने में सक्षम नहीं, उसी प्रकार श्रीहरि की कृपा के बिना सभी साधन निष्फल हैं।