मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भ में हुए मंगलाचरण को समर्पित है। इसमें श्रीवक्ता ने सत्र से पूर्व परम्परागत मंगलाचरण का पाठ किया।
श्लोक ८ — मर्यादा भक्ति की फलात्मकता
श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि मर्यादा भक्ति तब तक ही फलात्मक है जब तक सकल के मस्तक पर रहने वाली पुष्टिभक्ति उत्पन्न नहीं होती। टीका में समझाया गया कि मर्यादा भक्ति के ज्ञान में 'अहं ब्रह्म' भाव होता है, जिससे ब्रह्म के साथ एकत्व की बुद्धि होती है। इससे प्रभु से सेवक भाव छूट जाता है। इसलिए पुष्टिमार्ग सर्वोपरि शिरोमणि है, जो ज्ञान तथा मर्यादा मार्ग की भक्ति के ऊपर विराजित है।
श्लोक ९ — पुष्टिभक्ति का फलरूप
पुष्टिभक्ति साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण के रास-तत्त्व का प्रभाव है। श्रीमहाप्रभुजी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के मुखारविंद रूप में प्रकट हुए हैं। अतः श्रीआचार्यजी महाप्रभु के चरणकमल का श्रद्धापूर्वक आश्रय करने से ही भगवदीय जीवों को फलसिद्धि होती है। यह पुष्टिभक्ति भगवान् की इच्छा से और उनकी कृपाबल से भक्त को प्राप्त होती है, जिससे भगवान् स्वयं अपनी प्राप्ति करवाते हैं।
श्लोक १० — पुष्टिमार्गीय अनुभव पर तर्क की आवश्यकता नहीं
श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि पुष्टिमार्ग को मूर्धन्य और सर्वोपरि मार्ग जान लेने के बाद अन्य साधनों जैसे ज्ञान, कर्म, वेद या मर्यादा भक्ति के विषय में भटकने या तर्क करने की कोई आवश्यकता नहीं। जैसे लौकिक फल प्राप्त होने पर उसका भोग करना ही कर्तव्य है, वैसे ही पुष्टिमार्ग का अनुभव होने पर उसे ही अधिक जानना चाहिए। वक्ता ने गीताजी के 'त्रैगुण्य विषया वेदां' श्लोक का सन्दर्भ देकर समझाया कि वेद विभिन्न अधिकारियों के लिए विभिन्न मार्गों का निरूपण करते हैं, पर पुष्टिजीव निर्गुण मार्ग का अधिकारी है, जिसके लिए सगुण मार्ग विरुद्ध हैं।
श्लोक ११ — श्रीआचार्यजी के चरणारविंद में दृढ़ रति
पुष्टिमार्गीय भगवद्धर्म सेवाधिकारी को अपने श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी के दोनों चरणकमल को सदा अपने हृदय में धारण करना चाहिए। मन में संशय या अविश्वास नहीं रखना चाहिए। गीताजी में कहा गया है 'संशयात्मा विनश्यति' अर्थात् संशय रूप अंतःकरण वाला नाश को प्राप्त होता है, क्योंकि संशय से फल का नाश होता है। इसलिए पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों, परंपरा और श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञा के ऊपर कभी भी कोई संशय नहीं आना चाहिए। दृढ़ संकल्प ही आवश्यक है।
प्रश्नोत्तर — संशय और अविश्वास
प्रतिभागी ने पूछा कि आत्म-परीक्षण के दौरान स्वयं की योग्यता पर संशय (जैसे, 'मैं पुष्टिजीव हूँ या नहीं') क्या संशय बुद्धि है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि यदि यह आत्म-परीक्षण प्रोग्रेसिव अप्रोच के संदर्भ में है ताकि आगे बढ़ा जा सके, तो यह उतना समस्याग्रस्त नहीं। नवरत्न ग्रंथ में श्रीमहाप्रभुजी ने आज्ञा दी है कि आत्मनिवेदन के बाद दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि भगवान् ने स्वीकार कर लिया है। गुरु प्राप्त होना और श्रेष्ठ मार्ग में आना ही कृपा का परिचायक है। परंतु मार्ग में आने के बाद बार-बार अदृढ़ता उत्पन्न होना अच्छा नहीं माना गया है।
श्लोक १२ — संशययुक्त मन आसुरी वृत्ति का द्योतक
श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि जो संशय को प्राप्त होता है, उसे आसुरी जीव जानना चाहिए। यदि वह पहले दैवी सृष्टि में उत्पन्न हुआ भी हो, तो हरि उसे अपने श्रीहस्त से संसार में डाल देते हैं। टीका में कहा गया है कि श्रीवल्लभाचार्यजी के स्वरूप में या पुष्टि मार्ग में संशय करने वाले को सर्वथा आसुरी ही मानना चाहिए। श्रीठाकुरजी ऐसे जीवों को अंगीकार कभी नहीं करते। विवेकधैर्याश्रय ग्रंथ में श्रीआचार्यजी महाप्रभु ने कहा है: 'अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः', अर्थात् अविश्वास महाबाधक है। अतः भगवान् की कृपा पर दृढ़ संकल्प ही रखना चाहिए।
श्लोक १३ — भक्तिमार्ग में अप्रवृत्ति का आश्चर्य
यह बहुत आश्चर्य की बात है कि पृथ्वी पर भगवान् स्वयं (श्रीमहाप्रभुजी रूप में) प्रकट हुए हैं, श्रीमद्भागवत विद्यमान है, श्रीसुबोधिनीजी, निबन्ध आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं, सत्पुरुष भगवदीय भी उपस्थित हैं, फिर भी मनुष्य भक्तिमार्ग में प्रवृत्त नहीं होते। वक्ता ने इस बात को 'बड़ो आश्चर्य' कहा। श्रीहरिरायजी इसका कारण बताते हैं कि केवल श्रीहरि की कृपा ही मूल कारण है। सारे पदार्थ विद्यमान होने पर भी, जब तक श्रीहरि की कृपा नहीं होती, तब तक जीव भक्तिमार्ग में प्रवृत्त नहीं हो सकता। पुष्टि मार्ग तो केवल प्रमेय मार्ग है, अतः प्रमेयबल (भगवत्कृपा) बिना इसमें कैसे आवे?
श्लोक १४ — श्रीमहाप्रभुजी की कृपा बिना साधन व्यर्थ
श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि मूर्छित इंद्रियों की वृत्ति प्राण बिना उत्पन्न नहीं होती, उसी प्रकार श्रीमहाप्रभुजी की कृपा बिना सभी साधन की उत्पत्ति नहीं होती। टीका में समझाया गया कि जैसे मूर्छित व्यक्ति की इंद्रियाँ प्राण के अभाव में चेष्टा नहीं कर पातीं, उसी प्रकार भक्ति के जितने भी साधन शास्त्रों में बताए गए हैं, वे सभी इंद्रियों के समान हैं। परंतु उन इंद्रियों को प्राण देने वाली तो भगवान् की कृपा है। उस कृपा के बिना हमारे द्वारा किए गए साधन कोई फल उत्पन्न करने में सक्षम नहीं हैं। पुष्टिमार्ग में सेवा और भाव की सिद्धि केवल श्रीकृष्ण की कृपा से ही संभव है।
प्रश्नोत्तर — दैवी जीव और संशय का स्वरूप
प्रतिभागी ने श्लोक १२ में वर्णित 'पहले दैवी सृष्टि में उत्पन्न भय होई सोहु हरि ने अपने श्रीहरसो संसार में डारे हैं' पंक्ति का अर्थ पूछा। वक्ता ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आसुरी जीव दैवी मार्ग में आ गया हो, तो भगवान् उसे संसार में डाल देते हैं, जिसका अर्थ है कि वह वास्तव में दैवी वर्ण का जीव नहीं था। संशय और अविश्वास की बात केवल अपने चित्त में अविश्वास के लिए है, न कि वाद-ग्रंथों में पूर्व-पक्ष के रूप में प्रस्तुत संशयात्मक विचारों के लिए, जो केवल दृढ़ीकरण और समझने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।