मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के लिए समर्पित है।
शिक्षापत्र २६: भगवत भाव को गुप्त रखने का महत्व
श्रीहरिरायजी २६वें शिक्षापत्र का आरंभ करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार पुष्टिमार्गीय भक्त को अपने भगवत भाव को गुप्त रखना चाहिए। वे माता के उदाहरण से समझाते हैं कि जैसे माता अपने बालक की रक्षा के लिए डाकिनी आदि से डरती है, वैसे ही भक्त को भी दुसंग से भयभीत होना चाहिए। व्यभिचारिणी स्त्री के दृष्टांत द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि अपने संबंधी के सामने भी भगवत भाव को गुप्त रखना आवश्यक है। भगवतीयों के संग से भगवत भाव की वृद्धि होती है, जबकि दुसंग से इसकी हानि होती है।
भगवान की कृपा का स्वरूप और लौकिक-अलौकिक सिद्धि
वक्ता इस बात पर विचार करते हैं कि यदि श्री कृष्ण कृपा नहीं करते तो जीव क्या करे। गोपेशवरजी के श्लोक 'त्वकी नाम अहिकम...' का संदर्भ देते हुए समझाया गया कि श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कार्य सिद्ध करते हैं। लौकिक सिद्धि का अर्थ यह नहीं कि सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हो, बल्कि यह है कि भगवान ऐसी अनुकूलता प्रदान करते हैं जिससे भगवत सेवा में कोई विरोध न हो। अलौकिक सिद्धि से तात्पर्य अलौकिक लीला के अनुभव और स्वरूपानंद के दान से है, जिससे भक्त के विप्रयोग रूपी दुख का निवारण होता है।
जीव के अज्ञान पर भगवान की क्षमा और हित-साधन
श्लोक 'अविरुद्ध प्रकृते विरुद्ध वार यत्यपि दासु कृष्णो भालेषु पिते कुरते हितम।' के माध्यम से बताया गया कि भगवान पुष्टिमार्ग में अविरुद्ध भगवत सेवा आदि कार्यों को करवाते हैं और पुष्टि मार्ग के विरुद्ध साधनों से निवृत्त करते हैं। श्रीमहाप्रभुजी के सन्यास निर्णय के वचन 'हरि रात्रण शक्तोती...' का उल्लेख करते हुए समझाया गया कि भगवान माता-पिता से भी बढ़कर कृपालु हैं, जो बालक के अज्ञानवश किए गए दोषों को न देखते हुए भी हित ही करते हैं। भगवान स्वयं अपने दास के भक्ति वृद्धि के मार्ग में कभी बाधा नहीं बनते, बल्कि सहायक होते हैं। यह सब भगवान की कृपा से ही संभव होता है, न कि जीव के पुरुषार्थ से।
जीव का दोष और भगवत्संबंध में आचार्यजी की भूमिका
श्लोक 'न जाना निजाना तत्कृत सकत कृत कदोष रा जीवोय कहर गुणवार' के माध्यम से वक्ता बताते हैं कि जीव अपने अज्ञानवश कृतघ्न होता है और भगवान की कृपा को नहीं जानता। जीव दोषों की निधि है और भगवान गुणों के सागर हैं, जैसे अंधकार और तेज का परस्पर संबंध नहीं हो सकता, वैसे ही जीव और भगवान का संबंध अत्यंत विपरीत है। श्रीहरिरायजी ने श्रीमहाप्रभुजी की पवित्रा एकादशी की मध्यरात्रि की चिंता का स्मरण करते हुए बताया कि जीव अपने सर्वस्व का निवेदन भगवान के प्रति आचार्यजी द्वारा करता है, तभी उसके दोषों का नाश होता है और वह भगवान की सेवा के योग्य बनता है। इसलिए श्री आचार्यजी के चरणारविंद को हृदय में धारण करना ही पुष्टिमार्गीय वैष्णव का परम धर्म है।
शिक्षापत्र २६ (श्लोक १): दुसंग रूपी डाकिनी से भाव की रक्षा
शिक्षापत्र २६ का प्रथम श्लोक 'यथा बालक रक्षाय डाकिनी... भाव रक्षकैहि' पर चर्चा करते हुए श्रीहरिरायजी समझाते हैं कि जिस प्रकार माता अपने बालक की रक्षा के लिए डाकिनी (भूत-प्रेत) से भयभीत होकर उसे छिपाए रखती है, उसी प्रकार पुष्टिमार्गीय भक्त को भी अपने भगवत भाव रूपी बालक की रक्षा के लिए दुसंग रूपी डाकिनी से भयभीत होना चाहिए और उसका त्याग करना चाहिए। दुसंग से भगवत भाव नष्ट हो जाता है, जिससे दुर्गति होती है। यशोदाजी का दृष्टांत दिया गया, जिसमें वे महादेवजी को देखकर श्रीठाकुरजी के डरने की आशंका से दूर रखती हैं। यह स्नेहातिशय ही भाव की रक्षा का मूल है।
शिक्षापत्र २६ (श्लोक २): भगवत भाव का गोपन
शिक्षापत्र २६ के द्वितीय श्लोक 'समस्तेभ्यो निज स्नेहम गोपा... प्रियताम' में श्रीहरिरायजी भगवत भाव के गोपन (छिपाने) की महत्ता बताते हैं। जैसे एक व्यभिचारिणी स्त्री अपने प्रेम को सबसे गुप्त रखती है, वैसे ही भगवदीय जन को भी अपने हृदय के भगवत स्नेह भाव को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए। वक्ता बताते हैं कि कलयुग का काल अतिशय कठिन है, जहाँ दुसंग और भगवत भाव के विरोधी लोग अधिक हैं। ऐसे समय में भाव को प्रकट करने से वह नष्ट हो जाता है, जबकि उसे गुप्त रखने से हृदय में भगवान के प्रति स्नेह बना रहता है और उसकी रक्षा होती है।
प्रश्नोत्तर
एक सहभागी द्वारा प्रश्न किया गया कि यदि श्री कृष्ण कृपा न करें तो जीव क्या करे। वक्ता ने स्पष्ट किया कि श्रीहरिरायजी ने इस विषय का समाधान देते हुए बताया है कि भगवान दैवी जीवों पर कृपा करते हैं। जीव की त्रुटि यह है कि कृपा होने के बाद भी वह उस कृपा के योग्य नहीं बनता या उसे रियलाइज नहीं करता। भगवान की कृपा में न्यूनता नहीं होती, वह तो आनंद वर्षा करते हैं, परंतु जीव को भी अपनी ओर से उपयुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार, यह जीव की तरफ से भी दोष है, न कि केवल भगवान की कृपा का अभाव।
समापन
सत्र का समापन किया गया।