शिक्षापत्र २६ का परिचय एवं विषय-वस्तु
कल २५वां पत्र संपन्न हुआ था, जहाँ श्री हरिरायजी ने भगवदाश्रय की सिद्धि के लिए श्री महाप्रभुजी के प्रति शरणागत आज्ञा का उपदेश दिया। आज २६वां शिक्षापत्र है, जिसमें माता जैसे बालक की रक्षा के लिए डाकिनी आदि से डरती है, वैसे ही भगवत भाव की रक्षा के लिए दुसंग से डरना चाहिए। व्यभिचारिणी स्त्री जैसे परपुरुष के प्रति अपने स्नेह को समस्त संबंधियों से गुप्त रखती है, वैसे ही भगवत्सेवा में प्रतिबंधक संबंधियों के आगे भाव गुप्त रखना चाहिए। इस पत्र में श्री हरिरायजी भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा इन विषयों का निरूपण कर रहे हैं।
शिक्षापत्र श्लोक १-३: भगवत्कृपा का स्वरूप
शिक्षापत्र श्लोक १ (त्वकी नाम अहिकम यदवा पारलौकिकम अकरोत कुरते करता प्रभुवन संशयः) में बताया गया है कि स्वकीय भक्तों के लौकिक तथा पारलौकिक सभी कार्य प्रभु ने किए हैं, करते हैं और करेंगे, इसमें कोई संशय नहीं। लौकिक सिद्धि का अर्थ है कि भगवान ऐसी अनुकूलता संपादित करते हैं जिससे भगवत्सेवा में कोई विरोध न हो। श्लोक २ (तथापि कुरते जीव प्रयत्नम निज दोषतः अज्ञानात करुणा वर्दी क्षमते तादर्शम स्वतः) में कहा गया है कि जीव अपने अज्ञान और दोषवश अनेक यत्न करता है, पर कृपा के समुद्र प्रभु उसके सभी अपराध क्षमा करते हैं। श्लोक ३ (अविरुद्ध प्रकृते विरुद्ध वार यत्यपि दासु कृष्णो भालेषु पिते कुरते हितम) में कहा गया है कि श्रीकृष्ण अपने दासों के लिए पुष्टिमार्ग में अविरुद्ध भगवत्सेवादिक कराते हैं और विरुद्ध साधनों से निवृत्त करते हैं, जैसे पिता बालक का हित करते हैं।
शिक्षापत्र श्लोक ४-६: श्री आचार्यजी का आश्रय एवं दोषनिवृत्ति
शिक्षापत्र श्लोक ४ (हरि रात्रण शक्तोती करतुम बादाम कुतो परे अन्यथा मात्र बाला नस्तन्य पुष क्वचित) में स्पष्ट किया गया है कि हरि भगवान भक्तों की भक्ति में बाधा डालने में समर्थ नहीं हैं, तो अन्य कोई कैसे समर्थ होगा? जैसे माता अपने बालक का पोषण करती है, वैसे ही प्रभु अपने दास का कल्याण करते हैं। श्लोक ५ (न जाना निजाना तत्कृत सकत कृत कदोष रा जीवोय कहर गुणवार) में कहा गया है कि जीव अपने अज्ञानवश कृतघ्न है, भगवान की कृति को नहीं जानता; जीव दोषों का समूह है और हरि गुणों के समुद्र हैं। श्लोक ६ (कथ अन्योन्य संबंधत तमस्त तेजसो तथापि दोष राशि नाम दाहनेन निवेदनात स्वाचार्य द्वारका तस्यात योग्यता हरि योजने अतः स्वाचार्य चरणो स्थाप्य रति निरंतरम) में बताया गया है कि दोषरूप जीव और गुणनिधि भगवान का अंधकार व तेज जैसा संबंध कैसे हो? इसका समाधान है कि श्री आचार्यजी द्वारा आत्मनिवेदन से जीव के दोषों का नाश होता है और हरि से संबंध में योग्यता आती है। पुष्टिमार्गीय वैष्णव का परम धर्म श्री आचार्यजी के चरणारविंद हृदय में अहर्निश धारण करना है।
शिक्षापत्र श्लोक ७-८: भगवत भाव की गोपनीयता एवं दुसंग से भय
शिक्षापत्र श्लोक ७ (यथा बालक रक्षाय डाकिनी डाकिनी विभेतिह माता तैव भेतव्यम दुसंगात भाव रक्षकैहि) में दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे माता बालक की रक्षा के लिए डाकिनी आदि से डरती है, वैसे ही भगवतीय को दुसंग रूप डाकिनी से डरकर अपने भगवत भाव रूप बालक की रक्षा करनी चाहिए। दुसंग से भाव नष्ट होता है, इसलिए उससे सदा भयभीत रहना चाहिए। श्लोक ८ (समस्तेभ्यो निज स्नेहम गोपा यथासति तथैव भगवत भाव गोपनम प्रियताम) में बताया गया है कि जैसे असती या सती स्त्री अपने प्रेम को गुप्त रखती है, वैसे ही भगवदीय जन अपने भगवत भाव को गुप्त रखें। कलयुग में भाव को प्रकट करने से वह नष्ट होता है और गुप्त रखने से उसकी रक्षा होती है।
प्रश्नोत्तर: भगवत्कृपा और जीव की प्रवृत्ति
एक सहभागी द्वारा श्लोक १ के संदर्भ में प्रश्न किया गया कि यदि श्रीकृष्ण की कृपा न हो, तो जीव क्या करे, क्योंकि वह कृपा के बिना प्रवृत्त नहीं हो सकता। इसके समाधान में वक्ता ने स्पष्ट किया कि हरिरायजी यह आज्ञा करना चाह रहे हैं कि भगवान तो दैवी जीवों पर कृपा करते हैं। कभी-कभी जीव कृपा हो जाने के बाद भी ऐसी कृतियाँ करता है जो उसके लिए उपयुक्त नहीं होतीं। भगवान तो कृपा की आनंद वर्षा करते हैं, परंतु जीव ही उस कृपा को रियलाइज नहीं कर पाता और उसके योग्य नहीं बन पाता, जो जीव की ओर से दोष है।