शिक्षापत्र २५, श्लोक ८ : पुष्टिमार्ग की सर्वोपरिता
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक ८
• चर्चा: वक्ता ने सत्र के प्रारम्भ में गत सत्र का संक्षिप्त सार प्रस्तुत किया, जिसमें श्रीमहाप्रभुजी और गोसाईंजी के आश्रय की महत्ता तथा भगवदनुग्रह की प्राप्ति पर बल दिया गया। मर्यादा मार्गीय भक्ति से प्राप्त होने वाले सायुज्य फल की आकांक्षा पुष्टि जीव को नहीं होती, क्योंकि वह भगवत्सेवा की ही आकांक्षा रखता है।
• वक्ता: श्लोक ८ के अनुसार, मर्यादा भक्ति तब तक ही फलात्मक है जब तक सकल के मस्तक पर रहने वाली पुष्टि भक्ति उत्पन्न नहीं होती या जानने में नहीं आती। मर्यादा भक्ति में 'अहं ब्रह्म' की धारणा से सेवक भाव छूट जाता है, अतः पुष्टिमार्ग सर्वोपरि है।
शिक्षापत्र २५, श्लोक ९ : पुष्टिभक्ति का स्वरूप
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक ९
• चर्चा: पुष्टि भक्ति भगवान की इच्छा और कृपा बल से भक्त को प्राप्त होती है। श्रीमहाप्रभुजी स्वयं भगवान श्रीकृष्णचंद्र के मुखारविंद स्वरूप प्रकट हुए हैं।
• वक्ता: जिस प्रकार भगवान ने अपने उत्तमाधिकारी निर्गुण भक्तों को रास में आमंत्रित करके स्वरूपानंद का दान किया, उसी प्रकार श्रीमहाप्रभुजी के प्राकट्य के द्वारा भगवान हमें अपनी प्राप्ति करवाने के लिए प्रकट हुए हैं। श्रीमहाप्रभुजी के चरणकमल के प्रति दृढ़ आश्रित होने से ही भक्ति मार्गीय सभी फलों की सिद्धि होती है।
शिक्षापत्र २५, श्लोक १० : पुष्टिमार्ग में दृढ़ निश्चय
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक १०
• चर्चा: पुष्टिमार्ग को मूर्धन्य मार्ग के रूप में सर्वोपरि उत्तमोत्तम जानकर अन्य साधनों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ज्ञान, कर्म, वेद आदि में वर्णित अन्य साधन पुष्टिमार्ग की प्रक्रिया से विपरीत हैं।
• वक्ता: गीताजी में भगवान अर्जुन को आज्ञा करते हैं कि वेद त्रैगुण्य विषयक हैं, जबकि पुष्टि जीव निर्गुण मार्ग का अधिकारी है, अतः सगुण मार्ग विरुद्ध मार्ग हैं। इसलिए उनके प्रति निष्ठा या अवलंबन प्रकट नहीं करना चाहिए।
शिक्षापत्र २५, श्लोक ११ : आचार्यजी में अटल रति
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक ११
• चर्चा: पुष्टिमार्गीय भगवद्धर्म सेवाधिकारी को अपने श्री आचार्यजी महाप्रभुजी के दो चरणकमल को अपने हृदय में धारण करना चाहिए और मन में संशय या अविश्वास नहीं रखना चाहिए। संशय फल का नाश करता है।
• वक्ता: गीताजी में कहा गया है कि 'संशयात्मा विनश्यति' अर्थात् संशय रूप अंतःकरण वाला नाश को प्राप्त होता है। श्रीमहाप्रभुजी के मार्ग पर दृढ़ संकल्प होना चाहिए और कोई संशय उपस्थित नहीं होना चाहिए।
प्रश्नोत्तर : संशय और अविश्वास पर चर्चा
• चर्चा: एक सहभागी ने संशय और अविश्वास के बीच अंतर पूछा और बताया कि कभी-कभी साधक को लगता है कि वह कर नहीं पा रहा है, तो क्या यह संशय बुद्धि है।
• वक्ता: यह आत्म-परीक्षण और प्रगतिशील दृष्टिकोण के संदर्भ में उतना समस्याग्रस्त नहीं है। नवरत्न ग्रंथ में आज्ञा दी गई है कि आत्मनिवेदन के बाद दृढ़ निश्चय होता है कि भगवान ने उसे स्वीकार कर लिया है। श्रेष्ठ मार्ग में आना स्वयं कृपा का परिचायक है। परंतु इस मार्ग में आने के बाद बार-बार चित्त में अदृढ़ता उत्पन्न होना अच्छा नहीं माना गया है।
शिक्षापत्र २५, श्लोक १२ : संशय आसुरी वृत्ति का लक्षण
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक १२
• चर्चा: श्रीवल्लभाचार्यजी के स्वरूप में अथवा पुष्टिमार्ग में संशय करने वाले को सर्वथा आसुर जीव ही जानना चाहिए। यदि कोई दैवी जीव हो और उसमें अविश्वास हो, तो श्रीठाकुरजी उसे अपने हाथ से संसार में डाल देते हैं।
• वक्ता: श्रीहरिरायजी आज्ञा कर रहे हैं कि ऐसा संशय हमारी आसुरी वृत्ति को दिखाता है। यदि अन्य मार्गों को देखकर या अन्य साधनों को उत्तम मानकर हमारे चित्त में संशय आते हैं, तो वह हमारी आसुरी वृत्ति का कारण है। विवेक धैर्य ग्रंथ में श्री आचार्यजी महाप्रभु ने 'अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः' कहकर अविश्वास को महाबाधक बताया है।
प्रश्नोत्तर : दैवी जीव और संशय पर विचार
• चर्चा: एक सहभागी ने श्लोक १२ के शब्दार्थ में वर्णित 'दैवी जीव होए अथवा आसुर कोई होए, जाको अविश्वास होए ताको श्रीठाकुरजी अपने हाथ संसार में डारी दे ताको अंगीकार कबहुँ ना करें' पंक्ति का स्पष्टीकरण माँगा।
• वक्ता: दैवी जीव के मन में कभी भी ऐसा संशय नहीं आता। जो शुद्ध आसुरी जीव होता है, उसे भगवान इस मार्ग में लाते ही नहीं हैं। यदि आसुरी जीव दैवी मार्ग के अंदर घुस आया हो तो भगवान उसे संसार में डाल देते हैं, जिसका अर्थ है कि वह वर्ण से दैवी जीव नहीं था।
शिक्षापत्र २५, श्लोक १३ : भक्ति मार्ग में अप्रवृत्ति का कारण हरि कृपा
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक १३
• चर्चा: यह बड़ा आश्चर्य है कि पृथ्वी पर भगवान हरि प्रकट हुए हैं, श्रीभागवत विद्यमान है, श्रीभागवत की टीका सुबोधिनीजी विद्यमान है, सत्पुरुष भगवदीय विद्यमान हैं, और सभी अर्थों को जताने वाले ग्रंथ भी विद्यमान हैं, फिर भी मनुष्य भक्ति मार्ग में प्रवृत्त नहीं होते।
• वक्ता: इस अप्रवृत्ति का कारण यह है कि हरि ने अपनी कृपा ही कारण रूप में रखी है। सब पदार्थ विद्यमान होने पर भी, जब तक श्रीहरि की कृपा न हो, तब तक जीव इस मार्ग में प्रवृत्त नहीं होता। पुष्टिमार्ग तो केवल प्रमेय मार्ग है, अतः श्रीहरि की कृपा (प्रमेय बल) के बिना जीव इसमें कैसे आ सकता है।
शिक्षापत्र २५, श्लोक १४ : भगवत्कृपा ही सर्वसाधनों का प्राण
• पाठ: शिक्षापत्र २५, श्लोक १४
• चर्चा: मूर्छित इंद्रियों की वृत्ति की उत्पत्ति प्राण के बिना नहीं होती, उसी प्रकार कृपा के बिना सभी साधनों की उत्पत्ति नहीं होती। श्रीमहाप्रभुजी की कृपा के बिना कुछ भी सिद्ध नहीं होता।
• वक्ता: वक्ता ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे मूर्छित व्यक्ति की इंद्रियाँ प्राण के बिना कार्य नहीं कर सकतीं, उसी प्रकार भक्ति के जितने भी साधन शास्त्र में बताए गए हैं, वे इंद्रियों के समान हैं। परंतु उन इंद्रियों को प्राण देने वाले तो भगवान की कृपा है, और उस कृपा के बिना हमारे द्वारा किए गए साधन कोई फल उत्पन्न करने में सक्षम नहीं हैं।
• वक्ता: 'इति श्री हरिरायजी कृतम् पंच विंशतितमं शिक्षापत्रम् गोपेश्वरजी कृत ब्रज भाषा टीका समवेतं समाप्तम्' इस उद्धरण से शिक्षापत्र २५ की समाप्ति की घोषणा की गई।
प्रश्नोत्तर : दैवी-आसुरी भेद और संशय का स्पष्टीकरण
• चर्चा: एक सहभागी ने श्लोक १२ के शब्दार्थ में उल्लिखित 'दैवी सृष्टि में उत्पन्न भय होए तोहु हरि ने अपने श्री हरसो संसार में डारे हैं' पंक्ति पर पुनः प्रश्न किया।
• वक्ता: आसुरी जीव जो दैवी मार्ग के अंदर घुस आया हो, उसे भगवान संसार में डाल देते हैं। सहभागी ने स्पष्ट किया कि वाद ग्रंथों में पूर्वपक्ष के रूप में संशयात्मक विचार रखना केवल दृढ़ीकरण अर्थ होता है, न कि व्यक्तिगत अविश्वास। वक्ता ने इस पर सहमति व्यक्त की।