॥ शिक्षापत्र २७_श्लोक ११ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 14 August 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्री हरिरायजी कृत शिक्षापत्र के २७वें पत्र के ११वें श्लोक पर आधारित है। इस श्लोक में श्री हरिरायजी ने श्री भगवान के विस्मरण का कारण बनने वाले दोषों का निरूपण किया है। इसमें धन, ग्रह, ग्रह शक्ति, लोक वेद की प्रतिष्ठा, कर्मादिक में निष्ठा और स्वर्ग आदि फल की आकांक्षा जैसे बाधक तत्वों पर विस्तृत चर्चा की गई है।

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२६वें शिक्षापत्र का समापन: सत्संग का महत्व
००:४४ – १०:०९ — २६वें शिक्षापत्र का समापन: सत्संग का महत्व
२६वें शिक्षापत्र का समापन: सत्संग का महत्व
श्री हरिरायजी ने २६वें पत्र में दुसंध से दूर रहने और उत्तम भक्तों का संग करने का उदाहरण दिया है। यह समझाया गया कि हमें अपने भाव को कभी किसी के सामने उद्घाटित नहीं करना चाहिए। दूती कालाप संसर्ग यथावर्धयते रति स्वरणी भक्त संसर्ग भाव वृद्धिम तथा नयत। जैसे व्यभिचारिणी स्त्री का काम दूती के संग से बढ़ता है, वैसे ही वैष्णवों को भगवत भक्त तादर्स मिलें तो भगवान में भाव बढ़ता है। पुष्टिमार्गीय भगवधी भक्तों का संग अवश्य कर्तव्य है। असत्या सर्वदा चित्तम ग्रह उच्चारितम यथा तथा भवनादौतु चेत स्थाप्य तदाश्रित ही। जैसे असती स्त्री का चित्त अपने गृह में सर्वथा ना लगे, सदा मन उचाटत ही रहे, वैसे ही भगवत आश्रितों को अपना मन गृह, देह संबंधी लौकिक, वैदिक कार्य में न लगाकर एक प्रभु की वार्ता और भगवत्सेवा में लगाना चाहिए। यह जल कमलवत घर परिवार में रहते हुए भी भगवान में मन लगाने का प्रकार है। इस प्रकार २६वाँ पत्र संपन्न होता है।
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२७वें शिक्षापत्र का परिचय एवं मंगलाचरण का भाव
१०:१० – १५:४५ — २७वें शिक्षापत्र का परिचय एवं मंगलाचरण का भाव
२७वें शिक्षापत्र का परिचय एवं मंगलाचरण का भाव
आगे २७वा पत्र है, सप्तवंश शिक्षा पत्र में श्री भगवान को विस्मरण करें, ऐसे दोष को निरूपण है। अब सबन की बुद्धि को नाश कर व्यवहारो काल आयो है। साधन हु सिद्ध नाही होय है। जो सेवा में तीन प्रतिबंध है, सो सिद्ध है। तो हो श्रीमद आचार्य जी के चरणारविंद के आश्रय फल लाभ होएगो ता फल में निराशता नाही राखनी यह निरूपण है। ऊपर कहे जो भक्त प्रभु के आश्रित है तिनको चित्त लौकिक में ना ही लगत है तहां फल में अनेक बाधक है तिन को तजिए तब फल सिद्ध होए सो कहां बाधक है कैसे तजिए सो आगे निरूपण करत है। निजाचार्य पदाम भोज युगला शयनम सदा। विधेय तेन निखिलम फलम भा विनाश्रमम। पुष्टिमार्गीय वैष्णव अपने निजाचार्य के दो चरण को आश्रय सदा राखे ता वैष्णव को निखिल बिना श्रम ही सिद्ध होए बिना साधन ते ही श्री प्रभु कृपा ते सकल फल सिद्ध होए।
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शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: धन और ग्रह की बाधकता
१५:४६ – २१:५२ — शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: धन और ग्रह की बाधकता
शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: धन और ग्रह की बाधकता
धनं ग्रहम ग्रह शक्ति प्रतिष्ठा लो वेदयो कर्मादि निष्ठा मनसः स्वर्ग आदि फल कांक्षणम। पुष्टि मार्ग के फल में ४० दोष हैं सो बाधक है और दोष तो अनेक है, परंतु यह ४० दोष मुख्य है तिन को तजिए तब फल सिद्धि होए सो कहत है। श्री महाप्रभुजी ने भोग, उद्वेग और प्रतिबंध इन तीनों को सेवाफल में प्रतिबंध रूप बताया है। उनमें भोग का तात्पर्य लौकिक भोग और उद्वेग चित्त की अशांति है। प्रतिबंध में दो जीवकृत और भगवत्कृत प्रतिबंध हैं। प्रथम धन है सो महादोष है। धन मदते यह जीव आंद्रो होए जाते। काहू को गिनत नाही ताते धन को प्रभु में निवेदन करी भगवत्सेवा में लगावे जा में प्रभु अपनो दास जाने। धन की प्राप्ति के कारण हमारे चित्त में अभिमान होता है, इसलिए जीव को प्राप्त धन भगवान के प्रति निवेदित कर भगवत्सेवा में विनियोग करना चाहिए ताकि दासत्व का बोध बढ़े। दूसरा ग्रह जो यह ग्रह है मैं बनाया है, मेरे पिता को है यह ममता है बाधक है। घर का अर्थ संसार के प्रति हमारी आसक्ति है। सांसारिक प्रवृत्तियाँ हमारे चित्त को भगवान में लगने नहीं देतीं। पारिवारिक कार्यों में इतने उलझे रहते हैं कि ठाकुरजी का स्मरण करने का अवकाश नहीं होता।
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शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: ग्रह शक्ति एवं लोक वेद की प्रतिष्ठा
२१:५३ – ३०:५५ — शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: ग्रह शक्ति एवं लोक वेद की प्रतिष्ठा
शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: ग्रह शक्ति एवं लोक वेद की प्रतिष्ठा
तीसरो ग्रह शक्ति अष्टा प्रहर ग्रहाद कार्य में आसक्त रहे। आजू यह करनो है यह आसक्ति बाधक है। कुछ लोगों का मन इतना उलझा हुआ होता है कि उनके पास भगवत्सेवा के लिए अवकाश ही नहीं होता या पूर्ण अवकाश वे दे नहीं पाते। दिन भर घर परिवार के कार्य कभी खत्म नहीं होते, और उनमें अनुसूत रहने से मन भगवान में प्रवण नहीं हो पाता। चौथों लोक वेद की प्रतिष्ठा। जो हो लौकिक में कछु घटितो कार्य करूंगा तो मेरी प्रतिष्ठा जाएगी ताते फलानो पांच लगावेगो तो मैं १० लगाऊंगा जा में मेरी बढ़ाई होएगी। समाज और घर परिवार में प्रसिद्धि की आकांक्षा (लोकेषणा) हमें अपना ज्यादा समय दूसरों की प्रशंसा पाने में लगाती है, जिससे भगवान से चित्त हट जाता है। बहुत सारे कार्य ऐसे होते हैं जिनकी आवश्यकता नहीं होती, परंतु स्वयं लोकासक्ति के कारण हम सांसारिक कामनाओं की पूर्ति में जुड़े रहते हैं और निवृत्त होना नहीं चाहते। यह लोकेषणा भी भक्ति में बाधक है।
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शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: कर्मादिक में निष्ठा एवं स्वर्ग फल की आकांक्षा
३०:५६ – ४०:०९ — शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: कर्मादिक में निष्ठा एवं स्वर्ग फल की आकांक्षा
शिक्षापत्र २७, श्लोक ११: कर्मादिक में निष्ठा एवं स्वर्ग फल की आकांक्षा
पांचवा कर्मादिक में निष्ठा, संध्या, तर्पण, व्रत, नियम इत्यादिक में निष्ठा यह भक्ति में बाधक है। संध्या, स्नान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृ तर्पण ये सब शास्त्र प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के नित्य धर्म हैं, और उनका यथा योग्य यथाशक्ति अनुसरण करना चाहिए। परंतु हमारी भगवत्सेवा के अंदर निष्ठा कम हो जाए और इन कर्मों में निष्ठा बढ़ जाए, तो यह बाधक है। अल्टीमेटली भगवत्धर्म ही हमारा प्रमुख धर्म है। लौकिकात्म वैदिकत्वम काप्यात ना अन्यथा वैष्णवत्व ही सहज। यह धर्मों को ठाकुरजी की सेवा के अनवसर में करने की आज्ञा साधन दीपिका में दी है। इन धर्मों को लेकर जब हमारे मन में ज्यादा आग्रह, अत्याग्रह या जड़ता प्रकट हो जाती है, तब भगवत्सेवा गौण होकर यह कर्मकांड आदि के धर्म प्रमुख बन जाते हैं। मन में स्वर्ग आदि फल की आकांक्षा जो स्वर्ग लोक में जाए नाना प्रकार के भोग विलास करूंगा यह बाधक है। भक्ति मार्गीय फल के बदले लौकिक और वैदिक या पारलौकिक फलों में निष्ठा का बढ़ जाना भी बाधक है। ऐसी वृत्तियाँ कभी कबभार जग जाती हैं, संग से या स्वयं शास्त्र के अंदर उन विषयों को पढ़ने से। भक्त को निरुपादिक और निष्काम होना चाहिए। कोई भी प्रकार की आकांक्षा और फलाकांक्षा का हमारे चित्त में होना यह भक्ति मार्ग से विपरीत धर्म है।
प्रश्नोत्तर
एक प्रतिभागी 'निखिल' शब्द का अर्थ पूछते हैं, जिसका अर्थ 'सब कुछ' बताया गया। दूसरे प्रश्न में, प्रतिभागी 'ग्रह' (ममता) और 'ग्रह शक्ति' (लगा रहना) के बीच का अंतर स्पष्ट करने का अनुरोध करते हैं। इस पर बताया गया कि 'ग्रह' से ममता और 'ग्रह शक्ति' से आसक्ति का अभिप्राय है। सूतक काल में भगवत्सेवा के नियम और प्रसादी के संबंध में प्रश्न किया गया। समाधान में बताया गया कि ठाकुरजी का दूध, गर्म चकड़ी आदि प्रसाद तो ग्रहण करना ही चाहिए। रसोई बनती हो तो ज्यादा की ले सकते हैं, और अन्नप्रसादी का भक्षण करने का प्रचलन रहा है।
📖 सार
📌 सार
• श्री हरिरायजी ने २६वें शिक्षापत्र में उत्तम भक्तों के संग का महत्व और भगवदीय भाव को उद्घाटित न करने की शिक्षा दी।
• असती स्त्री के दृष्टांत से गृहस्थ में रहते हुए भी चित्त को प्रभु में स्थिर करने का महत्व समझाया गया।
• २७वें शिक्षापत्र का आरंभ करते हुए, श्री महाप्रभुजी के चरणारविंद के आश्रय से ही बिना श्रम के सभी फल सिद्ध होने की बात कही गई।
• इस पत्र में भगवान के विस्मरण का कारण बनने वाले ४० मुख्य बाधक दोषों का निरूपण किया गया है।
• धन का मद, संसार के प्रति आसक्ति (ग्रह), और गृह कार्यों में अत्यधिक लिप्तता (ग्रह शक्ति) भक्ति मार्ग में प्रमुख बाधक हैं।
• लोक और वेद में प्रतिष्ठा की आकांक्षा (लोकेषणा) तथा स्मार्त/श्रौत कर्मों में जड़तापूर्वक निष्ठा भी भक्ति में बाधा डालती है।
• स्वर्ग आदि लौकिक या पारलौकिक फलों की आकांक्षा भक्त के निष्काम भाव के विपरीत है और भक्ति मार्ग से विमुख करती है।