मंगलाचरण
(सत्र का प्रारंभ मंगलाचरण के साथ होता है। इसमें गुरुवंदना एवं इष्टदेव का स्मरण किया जाता है।)
शिक्षापत्र २७ — भक्ति में बाधक दोषों का प्रारंभ
श्रीमहाप्रभुजी ने सेवाफल में भोग, उद्वेग और प्रतिबंध नामक तीन बाधक बताए हैं, जिनका विस्तार श्रीहरिरायजी ने किया है। भोग से तात्पर्य असमर्पित का भक्षण है, उद्वेग से चित्त की अशांति और प्रतिबंध जीव द्वारा साधनों से उत्पन्न बाधा या भगवान की इच्छा से उत्पन्न बाधा है। श्रीहरिरायजी ने छह दोषों का वर्णन किया था, जिनमें घर के प्रति आसक्ति, लोक वेद में प्रतिष्ठा की आकांक्षा, कर्म में अत्यधिक निष्ठा और भगवत्प्राप्ति के अतिरिक्त लौकिक/पारलौकिक फलों की आकांक्षा प्रमुख थे।
कारिका ३ — लौकिक प्रीति, विरुद्ध विषय की इच्छा, अविरुद्ध में आसक्ति एवं स्वादबुद्धि
तीसरी कारिका में श्रीहरिरायजी लौकिक देह संबंधी स्त्री-पुत्र आदि में परम प्रीति को भक्ति में बाधक बताते हैं। भक्ति के विरुद्ध लौकिक विषयों की इच्छा भी फल में बाधा है, जैसे असमर्पित का भक्षण या वृथा आलाप। लौकिक रूप से अविरुद्ध विषयों में आसक्ति भी बाधक बन सकती है, जैसे वैदिक कृत्य जो भक्ति के विरुद्ध नहीं, पर अनावश्यक होने पर आसक्ति से बाधा उत्पन्न करते हैं। भगवत्प्रसाद में स्वादबुद्धि रखना भाव विनाशक है, जिसे बैंगन के प्रसंग से समझाया गया कि प्रसाद को स्वाद बुद्धि से नहीं, प्रसाद बुद्धि से ग्रहण करना चाहिए।
कारिका ३ — देहाभिमान, कुलाभिमान, विद्याभिमान और भगवत्सेवा के अभाव के दोष
देहाभिमान, कुलाभिमान (बड़े कुल में उत्पन्न होने का मद), और विद्याभिमान (मैं बहुत पढ़ा हूँ) को भक्ति में बाधक बताया गया है। देह का पोषण यदि भगवत्सेवा के अनुकूल्य के लिए न किया जाए, तो वह दोष है। श्रीगुसाईंजी ने 'अस्मत कुलम निष्कलंकम' कहकर समझाया कि कुल का निष्कलंक होना तभी है जब कृष्ण के प्रति एकनिष्ठता हो। भगवत्सेवा न करके लौकिक-वैदिक कार्यों में अत्यधिक संलग्नता भी बाधक है। जैसे गायत्री का जाप न करने से ब्राह्मण का द्विजत्व नष्ट होता है, वैसे ही भगवत्सेवा न करने से वैष्णव का सेवकत्व समाप्त हो जाता है।
कारिका ४ — असत्संग, असमर्पित भक्षण और निवेदन-शरण विस्मृति के दोष
चौथी कारिका में असत्पुरुषों के संग, श्री कृष्ण को भोग धरे बिना अन्न का भक्षण, निवेदन मंत्र के अनुसंधान का त्याग और शरण की विस्मृति को भक्ति में महाबाधक बताया गया है। असत्संग भगवत्भाव का नाश करता है। पद्म पुराण और कूर्म पुराण के वचनों को उद्धृत कर असमर्पित अन्न भक्षण की घोर निंदा की गई है। हरि परमात्मा को अर्पण किए बिना खाया गया अन्न स्वान के मांस/विष्ठा समान और जल मदिरा समान बताया गया है, जो बुद्धि को भ्रष्ट कर नरक का पात्र बनाता है। निवेदन के धर्म का स्मरण और शरणागति का भावन नित्य करना आवश्यक है ताकि दासत्व का धर्म विस्मृत न हो।
प्रश्नोत्तर — असमर्पित भक्षण का पितृओं पर प्रभाव
असमर्पित अन्न ग्रहण करने से पितृओं के नरक में जाने के विषय पर प्रश्नोत्तर किया गया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि जैसे संतान के धर्म का फल बड़ों को मिलता है, वैसे ही संतान द्वारा किए गए अधर्म का भाग भी उन्हें भोगना पड़ता है। यह असमर्पित भक्षण की अत्यंत जगन्यता और उसके गंभीर परिणामों को बताने के लिए कहा गया है।