मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा श्रीगुसाईंजी के स्वरूप का स्मरण करते हुए स्तुति की गई। पुष्टिमार्ग की परम्परा में मंगलाचरण के माध्यम से आराध्य देव एवं आचार्यों को नमन कर सत्र का शुभारम्भ किया जाता है।
छठी कारिका — अन्याश्रय का निरूपण
वक्ता ने श्रीहरिरायजी कृत शिक्षापत्र की छठी कारिका 'देवांतराय प्रार्थना फलार्थितः भगवत चरित्र व्यावृत्त रप लौकिक भगवत चित्त रहता व्यावृत्त रपि लौकिक शब्दार्थ और देवन को आश्रय फल की इच्छा' का निरूपण प्रारम्भ किया। उन्होंने बताया कि भगवान में चित्त रहित ऐसी लौकिक व्यावृत्ति और देवों को आश्रय महाबाधक है। साक्षात पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को आश्रय छोड़कर अन्य देव को आश्रय करना पुष्टिमार्ग को फल सिद्ध नहीं होने देता। अन्याश्रय पुष्टिमार्ग में महाबाधक और अत्यधिक दोषपूर्ण है।
हरित स्मृति एवं श्रीगोसाईंजी के वचन
वक्ता ने 'हरित स्मृति' का उद्धरण प्रस्तुत किया: 'नान्यम देवं नमस्कार ना्यम देवम निरीक्षत नान्य प्रसाद मध्याच नान्यदायतम ब्रजेत'। इसका अर्थ है कि अन्य देव को नमस्कार ना करें, उनके दर्शन ना करें, उनका प्रसाद ना खाएं और उनके मंदिर में ना जाएं। श्रीमहाप्रभुजी ने भी अन्य देवी-देवताओं के मंदिर में जाना, उनसे कुछ मांगना, उनके प्रसाद ग्रहण करना और उनके उत्सवों को मनाना दोष रूप कहा है। श्रीगोसाईंजी ने अपनी विज्ञप्ति में आज्ञा की है: 'भगवत पद पद्म परागो नहीं युक्त तर मरण पितरम इतराष्ट्रणं गजराज ग्रतो नहीं नहीं रास नहीं रास भयं मयूररी कुरते अन्य संबंध गंधोपि कंधरा में बाधते'। भगवान के चरणारविंद के रज को सेवने वाले को मरण पर्यंत संकट आए तो भी अन्य को आश्रय करना उचित नहीं।
गीता जी का प्रमाण एवं समापन
वक्ता ने स्पष्ट किया कि जैसे हाथी की सवारी करके कोई गधे के ऊपर नहीं बैठता, वैसे ही श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम हैं और अन्य सभी देवताएं उनकी भक्ति में संलग्न रहते हैं। गीता जी में भगवान ने उदाहरण दिया है कि जैसे मूल का सेचन करने से वृक्ष का सेचन हो जाता है, पत्तों को और टहनियों को अलग से पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। 'सर्वदेव नमस्कारम केशवम प्रतिगच्छति' — सभी देवताओं के प्रति किया गया नमस्कार अंततः तो भगवान के प्रति ही जाता है, इसलिए अनावश्यक और दोषपूर्ण है। अतः अन्य किसी भी देवी-देवता का आश्रय करना पुष्टिमार्ग में अपराध और महापतितकारी है। लौकिक-वैदिक कामनाओं की पूर्ति के लिए भी इन देवी-देवताओं का आश्रय बाधा रूप है। भगवान के चरणारविंद में वैराग्य, लौकिक-वैदिक कार्य मन में असंभावना, विपरीत भावना, मिथ्या ध्यान, अष्टप्रहर लौकिक व्यावृत्ति ये सभी पुष्टि मार्ग के फल में बाधक हैं।