मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा श्रीगुसाईंजी के मंगलाचरण का पाठ किया जाता है, जिसके पश्चात् मुख्य विषय वस्तु का प्रारम्भ होता है।
कारिका ११ : हरिस्मरण के विस्मरणकारी दोष
शिक्षापत्र २७ की ११वीं कारिका में श्रीहरिरायजी उन कारणों का निरूपण करते हैं जिनसे हमारी भक्ति पलित नहीं हो पाती। वक्ता बताते हैं कि पूर्व में वर्णित ४० दोष और उनके अतिरिक्त अन्य दोष भी श्रीकृष्ण का विस्मरण कराते हैं। दासों और श्रीकृष्ण के दासों को इन दोषों से सावधान रहना चाहिए। इन दोषों की दोषरूपता इसीलिए है क्योंकि इनके रहते हम भगवान को भूल जाते हैं, जिससे हमारा दासत्व भाव लुप्त हो जाता है। भगवान का विस्मरण होने से जीव का कोई अस्तित्व नहीं बचता। इन दोषों से डरते रहना चाहिए और चित्त को स्वस्थ रखना चाहिए।
कारिका १२ : दोषों की निवृत्ति के नवगुण
वक्ता १२वीं कारिका का पाठ करते हुए बताते हैं कि भक्तिमय मार्ग में स्थित रहकर, मार्ग के फल की इच्छा रखते हुए, अन्य से विरक्त होकर, श्रीकृष्ण के गुणों में आसक्त रहकर, आचार्यजी की शरण में जाकर, उनमें विश्वास युक्त होकर, समग्र त्याग करके और सदा दर्शन में उत्साह रखकर वैष्णवन को रहना चाहिए। यह सब भगवन्मार्ग है जो भगवान द्वारा प्रकटित है। हमें इस मार्ग से च्युत नहीं होना चाहिए और इसके मार्ग बल से फल प्राप्त होता है, अपने पुरुषार्थ से नहीं। अन्य मार्गीय फलों (स्वर्ग, ब्रह्मलोक, चतुर्विध मुक्ति) से विरक्त होकर केवल पुष्टिमार्गीय फल (भगवद्सेवा, स्वरूपानंद का अनुभव) की आकांक्षा करनी चाहिए। लौकिक कार्यों से भी विरक्ति आवश्यक है, केवल जीवन निर्वाह और आवश्यक पारिवारिक जिम्मेदारियों तक ही सीमित रहना चाहिए।
श्रीकृष्णगुण में आसक्ति एवं आचार्यचरण शरण
वक्ता बताते हैं कि हमें मन, वाणी और क्रिया द्वारा हर प्रकार से भगवत्कार्य में लगे रहना चाहिए। अन्य कार्यों और प्रवृत्तियों से चित्त को दूर कर लेना चाहिए। ऐसे भगवन्निष्ठ जीवों का ही संग करना चाहिए जो पूर्णतः भगवान को समर्पित हों। श्रीआचार्यजी के चरणकमलों के शरण में रहना चाहिए और श्रीमहाप्रभुजी के प्रति अनन्य आश्रय का भाव रखना चाहिए। मन में दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि श्रीआचार्यजी की कृपादृष्टि से ही सर्व कार्य निश्चय सिद्ध होंगे। लौकिक और वैदिक ऐसे सभी कृतियों का त्याग करना चाहिए जो पुष्टिमार्ग के विरुद्ध हों, जिनसे अन्याश्रय या सकामता बढ़ती हो। नित्य नैमित्तिक धर्मों का अनुसरण करना चाहिए।
कारिका १३ : कालदोष और दुःसंग का बाधक प्रभाव
१३वीं कारिका का पाठ करते हुए वक्ता बताते हैं कि कलिकाल सर्व बुद्धि का नाश करने वाला है, जिसमें सतप्राणी की बुद्धि भी नष्ट हो जाती है, तो अज्ञानी की बुद्धि का क्या कहना। काल और दुःसंग भक्तिमार्ग में बहुत बाधक हैं। दुःसंग बिना चाहे ही स्वतः सामने आकर मिल जाता है, जिससे थोड़ा-बहुत धर्म भी नष्ट हो जाता है। कलिकाल और दुःसंगजन्य दोष दोनों ही स्थितियां अत्यधिक भयंकर हैं, जो भगवद्भाव और धर्म करने की क्षमता को हर दिन घटाते जाते हैं।
प्रश्नोत्तर : मिलिताक्षस्य शब्द का अर्थ
एक प्रतिभागी 'मिलिताक्षस्य' शब्द का संदर्भ पूछते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ है 'नेत्र मूंदकर रहने वाले' भी दुःसंग से नहीं बच पाते। जैसे कोई अंधा व्यक्ति सोचे कि उसे दुनिया दिखाई नहीं देती, पर हाथ-पैर तो चलते हैं। उसी प्रकार, आंखें बंद करके बैठने पर भी दुःसंग हाथों में आकर गिर जाता है, अर्थात बिना प्रयास के ही प्राप्त हो जाता है। यह कलिकाल के प्रभाव को दर्शाता है।
प्रश्नोत्तर : मार्गनिष्ठा, आचार्यनिष्ठा और भगवन्निष्ठा में भेद
एक प्रतिभागी १२वीं कारिका में बताए गए 'भगवन्मार्ग में स्थित रहना' और आगे 'आचार्यजी के चरणकमल के शरण में रहना' तथा 'दृढ़ विश्वास रखना' के बीच सूक्ष्म भेद पूछते हैं। वक्ता बताते हैं कि इनमें कोई मेजर डिफरेंस नहीं है, बल्कि तात्पर्य यह है कि इन तीन बिंदुओं को क्रमशः मार्गनिष्ठा, आचार्यनिष्ठा और भगवन्निष्ठा के रूप में विभाजित किया गया है। यह गुणों को और अधिक सूक्ष्मता से समझाने के लिए है।
प्रश्नोत्तर : कालदोष और दुःसंग का परस्पर संबंध
एक प्रतिभागी पूर्व वर्णित नवगुणों और कालदोष तथा दुःसंग के बीच इंटररिलेशन पूछते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि सीक्वेंस वाली कोई बात नहीं है। नवगुण उत्तम धर्म हैं जिनका क्रमशः निरूपण किया गया है, जबकि कालदोष और दुःसंग बाधक तत्व हैं। वह 'कैमुतिक न्याय' की तरह है कि जब काल से सत्पुरुषों की बुद्धि नष्ट हो जाती है तो अज्ञानी के बारे में क्या कहना। वक्ता बताते हैं कि शिक्षापत्र प्रकरण ग्रंथ की तरह नहीं हैं, बल्कि सांत्वना पत्र हैं, इसलिए इनकी शैली अलग है। काल और संगदोष निवारण के उपाय आगे भी श्रीहरिरायजी करेंगे।
कारिका १३ की व्याख्या : प्रभुबल का उपसंहार
वक्ता १३वीं कारिका का पाठ करते हुए बताते हैं कि कलयुग के कालदोष में चित्त विपरीत अवस्था को प्राप्त करता है। भगवत्संबंधी कार्य करते हुए भी विपरीत स्फुरणा होती है। चित्त अस्थिर होकर घूमता रहता है, एकरूपता और कंटिन्यूटी नहीं बनी रहती। अनेक प्रतिबंध पड़ते रहते हैं। परंतु यदि भगवान पर विश्वास हो कि वे सर्वोपरि हैं और सभी कार्य सिद्ध कर सकते हैं, तो उनका प्रताप दशो दिशाओं में प्रकट है। वेद, पुराण, श्रीभागवत, गीता जैसे सभी शास्त्र श्रीकृष्ण को प्रसिद्ध पति बताते हैं। परंतु प्रभु ने अपने बल का उपसंहार किया है, जिससे हमारा विश्वास छूट जाता है और लौकिक सुख-दुःख का अनुभव होता है। साधनाभिमानी बनने पर भगवान पर से विश्वास छूट जाता है और सांसारिक गति होती है।