मंगलाचरण
(इस अध्याय में मंगलाचरण का पाठ किया गया है। शास्त्र के नियमानुसार इसके विषय-वस्तु का विवरण यहाँ नहीं दिया गया है।)
सेवा की फलसिद्धि में बाधकों का वर्णन
श्रीहरिरायजी ने सेवा की फलसिद्धि में आने वाले बाधकों का क्रमशः वर्णन किया है। वक्ता ने बताया कि कल के सत्संग में ग्रह शक्ति, अन्यास शक्ति, अभिमान और द्रव्य के प्रति लोलुपता जैसे दोषों का निरूपण किया गया था। यह चर्चा उन सभी अवरोधों को स्पष्ट करती है जो भगवद्सेवा के पूर्ण फल को प्राप्त करने में बाधक बनते हैं।
गृहादि में प्रीति और कृष्णानुभाव रहित देश में स्थिति
वक्ता ने 'गशु अभिरत ही भार्या पुत्रादु मनोगति कृष्णानुभाव रहित देश सतत संस्थित' श्लोक का शब्दार्थ समझाया। इसमें लौकिक कार्यों में अष्टप्रहर प्रीति, देह सम्बन्धी स्त्री-पुत्र में मन का अभिनिवेश, और श्रीकृष्ण कथा-सेवा-कीर्तन रहित देश में निरंतर स्थिति को पुष्टि फल में बाधक बताया गया है। गोसाईंजी द्वारा गोकुल गांव बसाने का उदाहरण देकर समान भाव वाले वैष्णवों के साथ रहने के महत्व पर बल दिया गया, जिससे भक्ति की वृद्धि होती है और उद्वेग से बचा जा सकता है।
हर्ष शोक, स्वतंत्रता की भावना और जीव का स्वाभाविक हठ
'हर्ष शोकौ लोक लाभ तदभाव कृतौ तथा स्वातंत्र्य भावनं स्वस्य जीव स्वाभाविको हठ' श्लोक के माध्यम से समझाया गया कि लौकिक लाभ-हानि में हर्ष-शोक का अनुभव करना पुष्टि फल में बाधक है। देह सम्बन्धी कुटुम्ब और द्रव्य की आसक्ति के कारण होने वाले सुख-दुख में मग्न रहना भी बाधा रूप है। साथ ही, स्वयं को स्वतंत्र मानना और जीव के स्वाभाविक दुष्ट स्वभाव (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मातर्य) को भक्ति में अवरोधक बताया गया।
अधिकार, पाप, पक्षपात और क्रूरता
'अधिकार पाप रति पक्षपातो दुरात्म नाम हृदय क्रूरता दीन जनोपेक्षा क्षमा' श्लोक का निरूपण करते हुए, अधिकार भेद को फलसिद्धि में बाधक बताया गया। भागवत श्रोता-वक्ता के दृष्टांत (ब्रह्मा, नारद, व्यास, श्रीसुखदेवजी) से स्पष्ट किया गया कि भगवान जिसका जो अधिकार निर्धारित करते हैं, उसी के अनुसार फल मिलता है। पापवृत्ति में प्रीति, खोटे मनुष्यों का पक्षपात, हृदय की क्रूरता, दीन जनों की उपेक्षा और अक्षमा (क्रोध) को भी भक्ति मार्ग में बाधक दोष कहा गया।
प्रश्नोत्तर — अधिकार भेद का विवेचन
एक सहभागी ने पूछा कि अधिकार जीव के हाथ में नहीं है, फिर वह बाधक कैसे? वक्ता ने समझाया कि अधिकार का निर्णय हम अपनी चित्तवृत्ति से नहीं कर सकते, यह भगवत्कृत प्रतिबंध भी हो सकता है। यदि निरंतर प्रयास के बाद भी भक्ति में कोई प्रगति या फल नहीं दिखता, तो यह समझना चाहिए कि या तो हम उस फल के अधिकारी नहीं हैं या फलित होने में विलंब है। साधना में प्रयत्न करते रहना जीव का धर्म है, पर अंतिम फल भगवदिच्छा पर निर्भर है।
प्रश्नोत्तर — अधिकार भेद और भगवत आज्ञा
सहभागी ने उद्धवजी और अर्जुनजी का उदाहरण दिया, जहाँ ठाकुरजी ने उनकी अधिकारिता स्थापित करके उपदेश दिया। वक्ता ने इस पर बल दिया कि हमें साधना में भक्ति की वृद्धि के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए, भले ही फलित होना प्रभु की इच्छा पर निर्भर हो। प्रभु द्वारा प्राप्त अधिकार ही कभी-कभी फल से विमुख कर सकता है, खासकर जब जीव उन कार्यों में अत्यधिक लीन हो, जिससे प्रभु की लीला का अनुसंधान बाधित हो।