॥ शिक्षापत्र २७_श्लोक १६-१८ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 21 August 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

इस सत्र में श्रीहरिरायजी कृत २७वें शिक्षापत्र का विवेचन किया गया है। वक्ता ने प्रारम्भ में ४० बाधक स्थितियों और ९ सहायक गुणों का संक्षिप्त स्मरण कराया, जिनका निरूपण श्रीहरिरायजी ने किया था। तत्पश्चात शिक्षापत्र के श्लोक १६ से १८ तक के सारगर्भित अर्थ पर प्रकाश डाला गया, जिसमें काल दोष, साधना की असिद्धि, और भगवत्सेवा में बाधक तत्वों – उद्वेग, प्रतिबंध तथा लौकिक भोग – का विस्तार से वर्णन है। सत्र का समापन इस दृढ़ आश्रय निष्ठा के साथ होता है कि श्रीमहाप्रभुजी के चरणारविन्द के आश्रय से पुष्टिमार्गीय फल की प्राप्ति निश्चित है, भले ही वर्तमान में सेवा में विप्रयोग हो।

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शिक्षापत्र २७: सामान्य परिचय एवं भक्ति बाधक स्थितियाँ
००:१० – ०१:५४ — शिक्षापत्र २७: सामान्य परिचय एवं भक्ति बाधक स्थितियाँ
शिक्षापत्र २७: सामान्य परिचय एवं भक्ति बाधक स्थितियाँ
श्रीहरिरायजी ने २७वें शिक्षापत्र में ४० ऐसी स्थितियों का निरूपण किया है जो भगवत्भक्ति में बाधक होती हैं। इन बाधक स्थितियों के निरूपण के बाद उन्होंने नौ ऐसे गुणों का भी वर्णन किया जिनसे भक्ति को बनाए रखा जा सकता है। वक्ता बताते हैं कि मूलतः इसका तात्पर्य श्रीमहाप्रभुजी के प्रति दृढ़ आश्रय, भगवान में अनन्य आश्रय, फलाकांक्षाओं से रहित होना और मार्गनिष्ठा बनाए रखना है, जिससे भक्तिमार्गीय भाव बना रहता है। कलयुग के काल दोष और संग दोष के कारण भगवत्भक्ति को बनाए रखना कठिन हो गया है। भगवान की कृपा बल से ही हमें सब कुछ प्राप्त होता है, इसलिए साधनाभिमान छोड़कर भगवान की प्रेरणा से मार्ग में बने रहना चाहिए।
२
श्लोक १६: काल दोष और साधन की असिद्धि
०१:५४ – ०५:०७ — श्लोक १६: काल दोष और साधन की असिद्धि
श्लोक १६: काल दोष और साधन की असिद्धि
श्रीहरिरायजी श्लोक १६ में कहते हैं: 'साधना सिद्धती काल दोष दुरात्म प्रतिबंधस कालाद कृत प्रत्य मेधते।' जिसका अर्थ है कि काल दोष के कारण जिनकी आत्माएँ दुष्ट हो गई हैं, उन्हें साधन सिद्ध नहीं होते। काल के कारण प्रतिदिन प्रतिबंध बढ़ते जाते हैं। वक्ता इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि जो भी साधन करने से मन में दुर्वासनाएं, अर्थात् भगवत्भक्ति में प्रतिबंधक भावनाएं, प्रकट न हों और भगवत्कार्य की सिद्धि हो, ऐसे साधन करने चाहिए। परन्तु वक्ता यह भी बताते हैं कि इस कठिन काल में ऐसे साधन भी अब सिद्ध हो पाना कठिन हो गया है। जब साधन की सिद्धि ही कठिन है, तो उससे उत्पन्न फल तो अति दुर्लभ हो गया है। काल के प्रतिबंध दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।
३
श्लोक १७: उद्वेग, प्रतिबंध और लौकिक भोग
०५:०७ – १२:२४ — श्लोक १७: उद्वेग, प्रतिबंध और लौकिक भोग
श्लोक १७: उद्वेग, प्रतिबंध और भोग
श्लोक १७ में कहा गया है: 'उद्वेग प्रतिबंधोवा भोगस चाप प्रजा प्रतिबंध सेवनम त प्रत्याशा का फलस्य।' इसका शब्दार्थ है कि उद्वेग अथवा प्रतिबंध और शरीर आदि के भोग उत्पन्न होते हैं, ये तीन सेवा में प्रतिबंध हैं। इनके सेवन से फल की आशा कैसे करें? टीका में श्रीआचार्यजी महाप्रभु ने सेवाफल में उद्वेग, प्रतिबंध और भोग को बाधक बताया है। पहला उद्वेग है, जिससे मन सेवा में नहीं लगता। वक्ता 'उद्वेग' को आज की भाषा में 'एंग्जायटी' या 'उचाट' बताते हैं, जिससे चित्त अस्थिर और चंचल हो जाता है, कृष्णप्रवण नहीं रह पाता। दूसरा प्रतिबंध, जो जीवकृत (जैसे लोकासक्ति, अन्याश्रय, असमर्पित भक्षण) और भगवत्कृत (भगवान द्वारा फल को स्थगित करना) दोनों प्रकार का होता है। तीसरा प्रतिबंधक लौकिक भोग है, जिससे मन में विषयावेश होता है और प्रभु अप्रसन्न होते हैं। भगवत्प्रसाद का भोग तो अलौकिक होता है, किन्तु भगवान से असम्बन्धित वस्तु या व्यक्ति में प्रेम या आसक्ति लौकिक भोग है, जो भक्ति में बाधक है।
४
श्लोक १८: श्रीमहाप्रभुजी के आश्रय का महत्त्व
१२:२४ – १७:३३ — श्लोक १८: श्रीमहाप्रभुजी के आश्रय का महत्त्व
श्लोक १८: श्रीमहाप्रभुजी के आश्रय का महत्त्व
श्लोक १८ है: 'तथापि श्रीमदाचार्य चरणाश्रय शयन मम निवर्तते निराशम सन मनः फल लब्धितः।' इसका अर्थ है कि श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणारविन्द के आश्रय से मेरा मन फल की प्राप्ति से निराश होते हुए भी निवृत नहीं होता। टीका में कहा गया है कि इस मार्ग में सेवा ही फल है, परन्तु महाकाल दोष के कारण सेवा के बिना फल में निराश होना स्वाभाविक है। फिर भी, वक्ता के मन में यह एक भरोसा है कि उन्होंने श्रीवल्लभाचार्यजी के चरणकमल का आश्रय लिया है, जिससे भगवत्सेवा न कर पाने पर भी श्रीमहाप्रभुजी के चरणकमल के आश्रय से पुष्टिमार्गीय फल निश्चित ही सिद्ध होगा। यह विश्वास श्रीहरिरायजी ने अपनी प्रवास की स्थिति में व्यक्त किया है, जब वे जैसलमेर में भगवत्सेवा से वंचित थे। वे धैर्य धारण करने और भगवान द्वारा अधिकारी बनाकर लाए जाने की बात पर जोर देते हैं कि भगवान कभी फल से वंचित नहीं रखेंगे।
५
प्रश्नोत्तर: लौकिक ते अविरुद्ध विषय पर जिज्ञासा
१७:३३ – २१:४८ — प्रश्नोत्तर: लौकिक ते अविरुद्ध विषय पर जिज्ञासा
प्रश्नोत्तर: लौकिक ते अविरुद्ध विषय पर जिज्ञासा
एक प्रतिभागी तीसरे श्लोक के आठवें कार्य में 'लौकिक ते अविरुद्ध विषय में आसक्ति' की अवधारणा को स्पष्ट करने का अनुरोध करते हैं। वक्ता बताते हैं कि उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर पहले दिया था और रिकॉर्डिंग सुनने से स्पष्ट हो जाएगा। एक अन्य प्रतिभागी अंतिम श्लोक में 'निराशम सन मनः' का अर्थ पूछते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ 'निराश होते हुए भी' ऐसा है। एक और प्रतिभागी श्रीहरिरायजी की विप्रयोग की स्थिति का उल्लेख करते हुए पूछते हैं कि थोड़े दिन की सेवा के बाद भी यदि उद्वेग हो जाता है, तो जो प्रभु द्वारा दी गई सामर्थ्य से भी सेवा नहीं कर पा रहे हैं, उनकी स्थिति कैसी होगी। वक्ता स्वीकार करते हैं कि यह सही बात है और निरुद्ध अवस्था के भक्तों को यह उद्वेग होता है, अवस्था भेद के कारण ऐसा होता है।
६
प्रश्नोत्तर: साधना में दुर्वासना का निवारण
२१:४८ – २९:०२ — प्रश्नोत्तर: साधना में दुर्वासना का निवारण
प्रश्नोत्तर: साधना में दुर्वासना का निवारण
एक प्रतिभागी श्लोक १६ के संदर्भ में पूछते हैं कि कौन से साधन से मन में दुर्वासना नहीं उठती और भगवत्कार्य की सिद्धि होती है, तथा काल दोष के कारण आत्मा के दुष्ट होने का संदर्भ क्या है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्रीमहाप्रभुजी द्वारा बताए गए तनुवत्त सेवा साधन, दुःख समय से निवृत्ति, अन्न दोष से दूर रहना, असमर्पित का भक्षण न करना आदि साधनाएं आज की स्थिति में पूरी तरह सिद्ध नहीं हो पाती हैं। हम जो भी थोड़ा बहुत कर रहे हैं, उससे केवल हमारी दुर्वासनाएं निकल पा रही हैं और अच्छी आदत बन रही है, पर वह फल की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि प्रतिदिन काल अधिक और अधिक बाधक बनता जा रहा है। वक्ता बताते हैं कि श्रीहरिरायजी के शिक्षापत्र सिद्धांत ग्रंथ की शैली में नहीं लिखे गए हैं, बल्कि सांत्वना पत्र की तरह भावावेश में लिखे गए हैं, इसलिए उनके संदर्भ को समझना आवश्यक है।
७
प्रश्नोत्तर: आत्म-संतुष्टि और फल प्राप्ति का यथार्थ
२९:०२ – ३५:५८ — प्रश्नोत्तर: आत्म-संतुष्टि और फल प्राप्ति का यथार्थ
प्रश्नोत्तर: आत्म-संतुष्टि और फल प्राप्ति का यथार्थ
एक प्रतिभागी पूर्व के प्रश्न को आगे बढ़ाते हुए पूछते हैं कि यदि कोई यह कहे कि जिन साधनों से दुर्वासना न उठे, उन्हें मत करो, और साधन ही संपन्न न हो पाएं तो फल कैसे होगा, इसका समाधान क्या है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि हम अपने मन को यह बोलकर खुश करते हैं कि 'ठीक है, जितना हो रहा है, उतना करो; हम थोड़ा तो कर लें।' परन्तु यह आत्म-संतुष्टि केवल झूठा दिलासा है। यदि हम ऐसा समझते हैं कि हमारी यह प्रक्रियाएं फलपर्यवसायी होने वाली हैं, तो यह एक गलतफहमी ('मिसकसेप्शन') है, जैसा श्रीमहाप्रभुजी ने कहा है। वक्ता का तात्पर्य है कि हम जो भी कृपा बल से कर रहे हैं, उसमें संशय नहीं, परन्तु हमारी वर्तमान स्थिति को देखते हुए हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम किसी फलपर्यवसायी प्रक्रिया का अनुसरण कर रहे हैं। शिक्षापत्र की शैली को समझना आवश्यक है, यह सिद्धांत ग्रंथ नहीं बल्कि सांत्वना पत्र हैं।
सत्र का समापन
वक्ता घोषणा करते हैं कि आज का क्रम यहीं समाप्त होता है और जन्माष्टमी के बाद आगे का अध्ययन क्रम २८वें शिक्षापत्र के साथ जारी रहेगा। सभी प्रतिभागियों को प्रणाम के साथ सत्र का समापन होता है।
📖 सार
📌 सार
श्रीहरिरायजी के २७वें शिक्षापत्र में भक्ति बाधक ४० स्थितियों और सहायक ९ गुणों का निरूपण किया गया है।
कलयुग के काल दोष और संग दोष के कारण भगवत्भक्ति को बनाए रखना अत्यंत कठिन है।
श्लोक १६ में काल दोष से दुष्ट आत्माओं को साधन सिद्ध न होने और प्रतिबंधों के बढ़ने की बात कही गई है।
श्लोक १७ में सेवा में तीन प्रमुख बाधक – उद्वेग, प्रतिबंध (जीवकृत एवं भगवत्कृत) और लौकिक भोग – समझाए गए हैं।
उद्वेग मन की अस्थिरता, प्रतिबंध बाह्य बाधाएं और लौकिक भोग भगवान से असम्बद्ध विषयों में आसक्ति हैं।
श्लोक १८ इस बात पर जोर देता है कि श्रीमहाप्रभुजी के चरणारविन्द का आश्रय ही पुष्टिमार्गीय फल की निश्चित प्राप्ति का आधार है।
वक्ता ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में अपने साधनाओं से आत्म-संतुष्टि केवल झूठा दिलासा है, फल भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है।
शिक्षापत्र सांत्वना पत्र की शैली में लिखे गए हैं, अतः इन्हें सिद्धांत ग्रंथों से भिन्न दृष्टिकोण से समझना चाहिए।