मंगलाचरण
• पाठ: मंगलाचरण
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: इस खंड में सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है।
शिक्षापत्र २८ का विषय — दीनता एवं भगवत्कृपा की प्रार्थना
• पाठ: शिक्षापत्र २८ का विषय
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: शिक्षापत्र के २७ पत्रों तक का विषय जन्माष्टमी से पूर्व किया गया था। अब २८वें पत्र से आगे का विषय देखेंगे। अष्टाविंशतिम शिक्षापत्र में अपनी दीनता के आविर्भावपूर्वक श्रीभगवान की प्रार्थना का प्रकार निरूपण करते हैं। वक्ता बताते हैं कि ऊपर कहे गए सर्व साधन और सेवा से रहित व्यक्ति को भी श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी के चरणाश्रय से फल प्राप्त होता है। यह फल किस प्रकार प्राप्त होगा, यह आगे कहते हैं कि आश्रय में दैन्य भाव ही फलरूप है, और उसी दीनता का आगे वर्णन किया जा रहा है। हमारे हृदय में जब दीनता प्रकट होती है तभी भगवान प्रसन्न होते हैं। इसलिए ऐसी दीनता को प्राप्त करने हेतु ही यहां प्रभु को विज्ञप्ति इस पत्र के द्वारा श्री हरिरायजी करना चाह रहे हैं कि भगवान की कृपा से ही हमें दीनता प्राप्त हो और उस दीनता से भगवान प्रसन्न हों। आगे के पत्र में वक्ता ने कहा कि हम जीव की ऐसी योग्यता नहीं है कि वह भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई साधन कर पाएं और भगवत्सेवा की भी प्राप्ति भगवदिच्छा से ही होती है, अन्यथा नहीं होती। फिर भी महाप्रभुजी के प्रति जो व्यक्ति अनन्य आश्रित होता है, उसे भक्तिमार्गी फल की सिद्धि तो होती ही है। इसलिए वह फल किस प्रकार से प्राप्त होगा, उसका निरूपण कर रहे हैं कि भगवान का आश्रय करने से दीनता का भाव हमारे हृदय में दृढ़ होता है और वही दीनता फलरूप है।
श्लोक २ — कृपा दृष्टि की प्रतीक्षा
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक २
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'कदाandजु कृपा दृष्टिम करिश्यति प्रतीक्षयदा मनः शान्तंम सह्द्रिय ही।' वक्ता इस श्लोक का अर्थ बताते हैं कि श्री नंदरायजी के पुत्र अपने भक्तों पर कब कृपा दृष्टि करेंगे, यह प्रतीक्षा करके ही हम सभी का मन इंद्रियों सहित शांत और शिथिल हो गया है। टीका में श्री हरिरायजी विज्ञप्ति करते हैं कि नंदात्मा श्रीकृष्ण ही हमारे सेव्य हैं, न कि वासुदेवजी के पुत्र। श्री सुखदेवजी ने श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध के नंद महोत्सव के अध्याय में कहा है, 'नंद आत्मा जो उत्पन्ने जात लादो महा मनाह।' जिसका अर्थ है कि श्री नंदरायजी की आत्मा से उत्पन्न ऐसे पुत्र हुए, तब उनको आनंद हुआ और बड़े मन वाले जात कर्म कराने लगे। यह वाक्य नंदरायजी की आत्मा से प्रकट हुए श्रीकृष्ण को भावात्मक पुष्टिपुरुषोत्तम के रूप में दर्शाता है। श्री हरिरायजी का भगवत्प्रादुर्भाव के विषय में एक स्वतंत्र ग्रंथ भी है, जिसमें उन्होंने यह तर्क दिया है कि भगवान का गोकुल में प्राकट्य पुष्टिपुरुषोत्तम के रूप में हुआ है, जबकि मथुरा में वासुदेव व्यूह रूप से। बाद में वासुदेवजी जब अपने पुत्र को गोकुल लाए, तब दोनों स्वरूप एक हो गए, भगवान ने तब तक अपने स्वरूप को माया द्वारा छुपा कर रखा था। इसी निर्णय का वर्णन यहां भी टीका में किया गया है कि नंदात्मा भगवान ही हमारे सेव्य हैं, क्योंकि नंदराज कुमार ही हमारे सेव्य हैं। 'आत्मज' का अर्थ है जो आत्मा से उत्पन्न हो, 'आत्मा व जायते पुत्र'। इस प्रकार सुखदेवजी ने नंदरायजी के पुत्र के रूप में भगवान के प्राकट्य का वर्णन किया है। ऐसे पुष्टिपुरुषोत्तम भगवान हमें अपना भक्त जानकर कब कृपा दृष्टि करेंगे, भक्त यही विज्ञप्ति करते हैं। यह प्रतीक्षा करते-करते हम सभी का मन इंद्रियों सहित शिथिल हो गया है।
श्लोक ३ — भगवत्स्वरूप का दर्शन
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ३
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: इस श्लोक में श्री गोसाईंजी विज्ञप्ति में कहते हैं, 'याद तादशी नाथ त्वत पदा जैक किंकरी तद्वम कथम प्यासु कुरु द्रगोचर मम।' जिसका अर्थ है कि मैं जैसी भी हूं, आपके चरणारविंद की ही दासी हूं। इसलिए कैसे भी हो, अपने मुखारविंद को शीघ्र मेरे दृष्टिगोचर करें। वक्ता समझाते हैं कि जो भक्त भगवान के प्रति अनन्य आश्रित होता है, पूर्णतया आश्रित होता है, वह भगवान से केवल यही विज्ञप्ति करता है कि उसे भगवान के ही दर्शन प्राप्त हों, और वे दर्शन पूर्ण रूप से प्राप्त हों। अन्य किसी प्रकार के फल को प्राप्त करने की आकांक्षा भक्त के हृदय में नहीं होती।
श्लोक ४ — भगवान की उपेक्षा पर चिंता
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ४
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'करुणा वध निधि सर्वाधिक प्रभु उपेक्षते कुतन इति चिंताम मनः।' इस श्लोक में दीन भक्त चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि दया के समुद्र, अपने निधिरूप सर्वत अधिक प्रभु अपने निजभक्तों की उपेक्षा क्यों करते हैं, ऐसा मेरा मन चिंतातुर है। टीका में, हे श्रीकृष्ण, आप करुणा के निधि हैं और सभी प्राणियों, सर्व जगत के प्रभु हैं। उनमें भी जो आपके अपने भक्त हैं, उनके तो आप सर्वस्व निधि हैं। ऐसे प्रभु अपने भक्तों की उपेक्षा क्यों करते हैं? वक्ता बताते हैं कि भगवान करुणा से परिपूरित हैं। सभी जीव वस्तुतः भगवान पर ही निर्भर हैं। परंतु उन सभी जीवों में भी भगवान को अपने भक्त अधिक प्रिय होते हैं। और भक्तों के लिए भी उनका सर्वस्व भगवान ही हैं, भगवान के अतिरिक्त उनका कुछ और नहीं है। तब भी भगवान अपने भक्तों की उपेक्षा क्यों करते हैं, यह चिंता करके भक्त का मन आतुर हो गया है।
श्लोक ५ — विप्रयोग में प्रार्थना की निरर्थकता
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ५
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'हा नाथ जीविताधीश राजीव दल लोचन यथोचितम विदेहति प्रार्थनाम तावत कस्य में।' श्री गोसाईंजी विज्ञप्ति में कहते हैं, हे नाथ, जीवित के अधीश, कमलदल लोचन, जैसे योग्य होए, वैसे करो। यह तुम्हारी प्रार्थना है। हे नाथ कमल लोचन, मैं तुमसे क्या प्रार्थना करूं? तुम्हारी कृपा से ही जीवित हूं तो यह विप्रयोग उचित है। इसलिए मैं क्या प्रार्थना करूं? तुम तो सर्वज्ञ हो, सब जानते हो। वक्ता निरूपण करते हैं कि विप्रयोग की अनुभूति में भक्त अधीर हो जाता है और भगवान कब दर्शन देंगे, कब पुनः प्राप्त होंगे, इसकी धीरज उनके अंदर रहती नहीं है। इसलिए भक्त शीघ्रतिशीघ्र भगवत्दर्शन की आकांक्षा रखते हैं। श्री हरिरायजी को जैसा यहां अनुभव हो रहा है, ऐसा ही विज्ञप्ति के अंदर श्री गोसाईंजी ने भी निरूपित किया है। इसलिए भगवान के प्रति यहां यह विज्ञप्ति कर रहे हैं कि भक्त भगवान की कृपा से ही जीवित रहता है। यदि विप्रयोग की प्रबल अवस्था में किसी जीव की मृत्यु नहीं हो रही या उसने प्राणों का त्याग नहीं कर दिया, तो उसका अर्थ यह है कि भगवान ही उसके प्राणों को टिकाए रखे हुए हैं। ऐसी अवस्था में जीव भगवान से क्या विज्ञप्ति कर सकता है? भक्त भगवान की सर्वज्ञता का स्मरण कर रहे हैं।
श्लोक ६ — भक्त के लिए भगवान की अविस्मृति
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ६
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'निजानंद निमग्नस्य भवे यद्यपि विस्मृतिह भक्तार्थम अवतीर्णस्य कृपालो रुचिता।' शब्दार्थ: अपने आनंद में मग्न ऐसे को यद्यपि विस्मृति हो, तथापि भक्त के अर्थ प्रकट हुए ऐसे दयालु को यह विस्मृति उचित नहीं है। टीका: हे श्रीकृष्ण, आप अपने आनंद में रात-दिन मग्न रहते हो, इसलिए यद्यपि आपको संसारादिक भावों की विस्मृति है, तब भी आप अपने भक्तों के लिए अवतार लिए हो। आप परम कृपालु हो, इसलिए जो भक्त संसार में हैं, उनकी विस्मृति नहीं करोगे, कृपा करके अंगीकार ही करोगे। वक्ता बताते हैं कि भगवान आनंद स्वरूप हैं, इसलिए सदा सर्वदा अपने ही रस का आनंद करते रहते हैं। भगवान के लिए यह संसार केवल उनकी क्रीड़ा का साधन है। इसलिए संसार के अंदर कोई जीव दुखी होता है या किसी जीवात्मा को कोई कष्ट होता है, उन सभी विषयों की कोई स्मृति भगवान को नहीं होती है। भगवान अपने स्वानंद का अनुभव करते हुए विराजमान होते हैं। फिर भी भक्त के ऊपर तो भगवान कृपा युक्त होकर उनका अंगीकार करते हैं। इस विषय का स्मरण यहां श्री गोसाईंजी की विज्ञप्ति से कर रहे हैं।
श्लोक ७ — अंगीकृत जीव पर कृपा का विचार
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ७
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'त्वदंगी कृत जीवषु अधिकारा यतः प्रभु अत तेन विचारह कृपा कुरु कृपा जीवन में जासो तुम्हारी अंगीकृति रूप अधिकार है।' जिसका अर्थ है कि हे प्रभु, हे दया के निधि, यह जीव विचार करने योग्य नहीं है, इसलिए कृपा करो। हे नाथ, आपका अंगीकृत जीव है। आप के अधिकार योग्य है। यह लौकिक संबंध आपको भूले हैं, यह अधिकार योग्य नहीं है। फिर भी आप कृपा समुद्र हो, इसलिए हम पर कृपा ही करो। वक्ता गोसाईंजी की विज्ञप्ति का निरूपण करते हैं कि जीवात्मा का स्वीकार भगवान ने किया है। उसे अपने भक्त और सेवक के रूप में भगवान ने स्वीकार लिया है। फिर भी जीव तो विचार करने के योग्य नहीं है। अर्थात हम अपनी अविद्या से ग्रस्त होकर अपने लौकिक आवेश के अंदर इतने ज्यादा निमग्न हो जाते हैं कि हमें भगवान की स्मृति या भगवत्कृपा की स्मृति ही रहती नहीं है। इसलिए ऐसा जीव होने के बावजूद भी भगवान तो जीव का अनुसंधान रखते हैं। ऐसे भगवान की स्मृति यहां कर रहे हैं।
प्रश्नोत्तर — भगवत् अनुसंधान
• पाठ: प्रश्नोत्तर
• प्रतिभागी वाचन: एक प्रतिभागी पूछते हैं कि भगवान तो आस्तिक नास्तिक सभी जीवों का अनुसंधान रखते हैं, फिर भक्त का अनुसंधान विशेष क्यों कहा गया है?
• वक्ता विवेचन: वक्ता बताते हैं कि सामान्यतया भगवान सभी जीवों का अनुसंधान रखते हैं, क्योंकि 'समो हम सर्वभूते न मे द्वेषो न प्रियः' (मैं सभी भूतों में समान हूं, न मेरा कोई द्वेष्य है न प्रिय)। सभी जीव भगवान के अंदर ही रहते हैं। परंतु भक्तों के विषय में भगवान का अनुसंधान विशेष होता है, जैसा कि 'अहं भक्तपराधीनो' (मैं भक्त के अधीन हूं) और 'यो मत भक्त स मे प्रियः' (जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है) जैसे वचनों से स्पष्ट है। भक्त के साथ भगवान का डायरेक्ट कॉन्टैक्ट रहता है।
श्लोक ८ — नायकम विहाय कौन की प्रार्थना करे
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ८
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'कम प्रार्थ यु दीना। विहाय निज नायकम तदे शरणा नित्यम विमुक्त सर्व साधने।' सर्व साधन से रहित और नित्य यही एक शरण जिनको है, ऐसे दीन भक्त अपने पति को छोड़कर किसकी प्रार्थना करें? टीका: हे नाथ, हम आपसे क्या प्रार्थना करें? हम दीन हैं। हम आपको अपना नायक पति जानते हैं। आपके बिना हम और किसी को नहीं जानते। और हम सर्व साधन से रहित हैं, इसलिए नित्य आपके ही शरण हैं, यही हमारा भरोसा है। साधन होता तो कुछ प्रार्थना करते, सो तो है ही नहीं। इसलिए आपका आश्रय करके आपके ही शरण हैं। श्री आचार्यजी महाप्रभुजी ने विवेकधराश्रय ग्रंथ में कहा है, 'अशक्यवा सुशक्यवा सर्वथा शरणम हरिह।' अर्थात अशक्य अथवा सुशक्य में सर्वथा हरि ही शरण हैं। इस वाक्य को विचार कर हमें और कोई उपाय नहीं सूझता, इसलिए हम आपके शरण हैं। वक्ता कहते हैं कि भक्त यह विज्ञप्ति करता है कि यद्यपि हम अपनी योग्यता जानते हैं कि हमारे अंदर ऐसी योग्यता नहीं है, फिर भी भगवान के अतिरिक्त और कोई हमारा है भी नहीं। इसलिए भक्त किसी भी स्थिति में भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी का अनुसंधान कैसे कर सकता है? कोई भी स्थिति हो, कैसी भी अवस्था हो, अंततः तो भगवान का ही अनुसंधान हम जैसे जीवों को, भक्तों को होता है। इसलिए भक्त भगवान के प्रति नित्य शरणागत है। चाहे स्थिति कैसी भी हो, अशक्य हो या सुशक्य हो, प्रत्येक स्थिति में भक्त केवल और केवल भगवान के ही चरणों का अनुसंधान करता है। इसलिए भगवान की शरणागति में होने से भगवान से ही अपनी शरणागति को प्राप्त करने की आकांक्षा भी रखता है। ऐसी विज्ञप्ति यहां कर रहे हैं।
श्लोक ९ — विरहाकुल भक्त की आकांक्षा
• पाठ: शिक्षापत्र श्लोक ९
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: 'मन्नाथ नाथ नूंम भवामि विरहा कुलह दर्शनमशनम वापी देह वेनु सरस्वती।' हे मेरे नाथ, मैं आपके विरह से आकुल हो गया हूं। इसलिए निश्चय में प्रार्थना करता हूं कि सेवा में दर्शन, स्पर्शन और वेणु स्वर की श्रुति हो। टीका: हे श्रीकृष्ण, आप मेरे नाथ हो और मैं महा विरह करके आकुल हो गया हूं। यह संसार के कार्य में तत्पर हो और आपकी सेवा भगवद्धर्म से रहित हो, तो संसार अग्नि से पीड़ित हूं। श्री गोसाईंजी विज्ञप्ति में कहते हैं, 'तदर्शन विहीनस तदीयसत जीवितम व्यर्थव यथानाथ दुर्गाया नवं वय।' आपके दर्शन से रहित आपके भक्तों का जीवन, हे नाथ, विधवा की नवीन अवस्था के समान व्यर्थ है। आपके दर्शन बिना आपके भक्त जीवित हैं तो व्यर्थ है। जैसे दुर्भगा, खोटे भाग्य वाली विधवा का यौवन व्यर्थ है। श्री हरिरायजी कहते हैं कि हमको दर्शन दो और चरण स्पर्श कराओ अर्थात सेवा कराओ, ताकि दर्शन और चरण स्पर्श हो। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्री हरिरायजी यहां यह विज्ञप्ति कर रहे हैं कि भगवान हमारे स्वामी हैं और भक्त भगवान के प्रति प्रबल विप्रयोग का अनुभव करता है। विप्रयोग है फिर भी संसार के कार्य तो निवृत्त नहीं हो रहे और संसार के कार्यों में लगे हुए होने के कारण ही भगवान की सेवा से भी वह विरहित हो गया है। ऐसी स्थिति में भक्त भगवान के दर्शन की, स्पर्श की, सेवा की आकांक्षा रखता है। गोसाईंजी के वचन बताते हैं कि भगवान के दर्शन बिना या भगवान की सेवा के बिना भक्त का जीवित होना ऐसे ही है जैसे कोई विधवा स्त्री अपने पति के बिना अपने जीवन का यापन करती हो। हम सौभाग्यवान, सौभाग्यशाली तब होते हैं जब हमें भगवत्सेवा प्राप्त होती है। भगवत्सेवा से विरहित होने पर हमारा जीवन, हमारी इंद्रियां, हमारा देह ये सभी किसी योग्य नहीं रह जाते। इसलिए यह निरूपण यहां कर रहे हैं कि जो भगवान के भक्त हैं उनका जीवन भगवत्सेवा, दर्शन आदि के व्यतिरिक्त ऐसा ही है जैसे किसी विधवा का सौंदर्य पति की उपलब्धि न होने पर व्यर्थ होता है। इसलिए हरिरायजी यहां प्रभु के दर्शन और सेवा के लिए विज्ञप्ति कर रहे हैं और वेणुनाद द्वारा हमारे हृदय में सुधा धरें, तब हमें सुख हो। विरहाग्नि से व्याकुल हैं, इसलिए केवल दर्शन से ही दुख दूर नहीं होगा। दर्शन, स्पर्श और वेणुनाद के सुर से हृदय का दुख दूर होगा। इस भांति सुख दें, तो प्रभु के दर्शन प्राप्त हों, भगवान के चरण स्पर्श अर्थात सेवा प्राप्त हो और वेणुनाद करके भगवान ने ब्रजभक्तों के विप्रयोग का जैसे निवारण किया और उन्हें अपने पास बुला लिया था। उसी प्रकार से यहां भी जो भक्त हैं उन भक्तों को भी विप्रयोग की निवृत्ति हेतु भगवान अपने पास उन्हें बुला लें। ऐसी विज्ञप्ति श्री हरिरायजी कर रहे हैं।
प्रश्नोत्तर — साधनहीनता और प्रार्थना
• पाठ: प्रश्नोत्तर
• प्रतिभागी वाचन: एक प्रतिभागी पूछते हैं कि निस्साधन होना शरणागति के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि साधन है तो प्रार्थना क्यों? यदि जीव स्वयं साधन कर रहा है तो उसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, यह समझ में नहीं आया।
• वक्ता विवेचन: वक्ता इसे 'अनवस्था दोष' जैसा बताते हैं। भक्ति करने के लिए शरणागति चाहिए, शरणागति की सिद्धि के लिए दैन्य चाहिए। दैन्य की सिद्धि भी हम अपने आप नहीं कर सकते। इसलिए दैन्य की सिद्धि के लिए भी भगवान के प्रति विज्ञप्ति करेंगे। यह विज्ञप्ति भी शरणात्मिका ही होगी।
प्रश्नोत्तर — विप्रयोग में प्रार्थना का औचित्य
• पाठ: प्रश्नोत्तर
• प्रतिभागी वाचन: एक प्रतिभागी श्लोक ५ के संदर्भ में पूछते हैं कि पहले तो प्रभु से दर्शन की प्रार्थना कर रहे हैं और फिर कहते हैं 'हे नाथ कमल लोचन मैं तुमसे प्रार्थना कहां करूं', यह विरोधाभास समझ में नहीं आया। यदि तुम्हारी कृपा से जीवित हूं तो यह विप्रयोग उचित है, फिर प्रार्थना करने का क्या लाभ?
• वक्ता विवेचन: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि विप्रयोग की अवस्था में भक्त की मृत्यु हो सकती है। परंतु यदि भक्त ने विप्रयोग का अनुभव करते हुए भी प्राण धारण करके रखे हुए हैं तो उसका अर्थ यह है कि उनके प्राणों को भगवान ने ही बचा कर रखा है। अन्यथा तो उस भक्त की मृत्यु ही हो जाती। इसलिए यह बताया जा रहा है कि प्राण धारण करके रहना या जीवित होना यह भगवत्कृपा का ही लक्षण है कि भगवान ने ही भक्त के प्राणों को बचा कर रखा है। अब विप्रयोग का अनुभव कब करेगा? जीवित होगा तो करेगा, अन्यथा तो मृत्यु ही हो जाएगी। इसलिए अब भी विप्रयोग का अनुभव हो रहा है, उसका अर्थ यह है कि भगवान की ही उस विषय में ऐसी आकांक्षा है। और यदि ऐसी आकांक्षा भगवान की ही है कि भक्त विप्रयोग का अनुभव करता रहे, तब फिर हमारी प्रार्थना करने से क्या लाभ होगा, यही कहना चाहते हैं।
प्रश्नोत्तर — विधवा के जीवन का दृष्टांत
• पाठ: प्रश्नोत्तर
• प्रतिभागी वाचन: एक प्रतिभागी श्लोक ५ की टीका में विधवा के दृष्टांत पर पूछते हैं कि 'और को दुख रूप होए' का क्या अर्थ है। यदि भगवान के दर्शन बिना भक्त का जीवन अपने को तथा और को दुख रूप हो तो 'और को दुख रूप हो' का क्या अभिप्राय है?
• वक्ता विवेचन: वक्ता समझाते हैं कि यदि कोई भक्त भगवान के विप्रयोग का अनुभव करे, रोता हो, उसे भगवान ना मिलते हों या भगवान की सेवा ना मिलती हो, तो उन्हें देखकर हमें भी दुख लगता है। एक अन्य प्रतिभागी श्री महाप्रभुजी के अंतःकरण में वर्णित 'प्रौढ़ापिता यद स्नेहा प्रेषतेवरे' श्लोक से विधवा के दृष्टांत को सहसंबंधित करते हुए पूछते हैं कि जैसे प्रौढ़ हुई कन्या को पति के घर न भेजने पर उसका यौवन व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि वह पति को प्रसन्न नहीं कर पाती, वैसे ही यहां भी विधवा का जीवन या सौंदर्य व्यर्थ हो जाता है। वक्ता इस अर्थ से पूर्णतः सहमत होते हैं।