॥ शिक्षापत्र २८ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 18 September 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्री हरिरायजी विरचित २८वें शिक्षापत्र के विवेचन पर आधारित है। इसमें श्री हरिरायजी द्वारा वैष्णव जीव की भगवत्कृपा प्राप्त करने की योग्यता, संसार रूपी दावानल से मुक्ति हेतु भगवान की कृपा-वर्षा की आवश्यकता, और गृहस्थ आश्रम में आने वाली चुनौतियों का निरूपण किया गया है। सत्र में जीव की अपनी दुष्टता और भगवान के दयालु स्वभाव पर पूर्ण विश्वास की विज्ञप्ति की गई है।

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१
शिक्षापत्र २८ का परिचय
• वक्ता विवेचन: श्री हरिरायजी द्वारा रचित २८वें शिक्षापत्र में भगवान के कृपापात्र बनने और कृपा प्राप्त करने की हमारी योग्यता का निरूपण किया जा रहा है। पुष्टिमार्गी होना हमारा सहज धर्म और प्रमुख योग्यता है, जैसा कि विवेकश्रय में श्रीमहाप्रभुजी ने आज्ञा दी है। भगवान हमारे गुण-दोषों या अयोग्यताओं को ध्यान में न लेते हुए, हमारी एकमात्र भगवदंगीकृत होने की योग्यता को देखकर हमें सेवक के रूप में स्वीकार करें, ऐसी विज्ञप्ति श्री हरिरायजी कर रहे हैं। श्रीठाकुरजी ने ब्रह्मसम्बन्ध प्रदान करते समय श्रीमहाप्रभुजी को वचन दिया था कि ब्रह्मसम्बन्ध करने से देह और जीव के सभी दोष निवृत्त हो जाते हैं।
२
संसार रूपी दावानल से निवृत्ति
०३:२४ – ०५:१८ — संसार रूपी दावानल से निवृत्ति
संसार रूपी दावानल से निवृत्ति
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक में कहा गया है कि संसार रूपी दावानल से दग्ध जीवों को श्याम मेघ के अनंत जल के दान के बिना सुख नहीं मिलता। जैसे जंगल में दावाग्नि को शांत करने के लिए मेघ की वर्षा ही एकमात्र उपाय है।
• वक्ता विवेचन: हम सभी जीव संसार में अहंता-ममता के बंधन में बंध जाते हैं। अविद्याग्रस्त होना जीवात्मा का स्वाभाविक दोष है। पुष्टि मार्ग में भगवान द्वारा अंगीकृत होने पर भी जब जीवात्मा संसार में निमग्न होकर जलने लगती है, तब केवल भगवान की कृपा-वर्षा ही उसे शांति प्रदान कर सकती है। जैसे जंगल की आग बुझाने का एकमात्र उपाय वर्षा है, उसी प्रकार माया संबंधी अहंता-ममता रूपी दावानल में जलती हुई पुष्टि जीवात्मा को नीलमेघ रूप श्रीगोवर्धननाथजी (श्रीठाकुरजी) अपने आनंद रूप अनंत जल का दान करके कृपा करें, तभी पुष्टिमार्गीय वैष्णव को सुख मिलता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
३
अंगीकृत सेवकों की भावना नाश प्रवृत्ति
०५:१८ – ०९:३१ — अंगीकृत सेवकों की भावना नाश प्रवृत्ति
अंगीकृत सेवकों की भावना नाश प्रवृत्ति
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक का अर्थ है कि भगवान की सेवा के लिए गृहस्थ में रहे हुए जिन सेवकों को मैंने अंगीकृत किया है, वे ही भाव को नष्ट करने के लिए तत्पर होते हैं, तो मैं क्या करूँ?
• वक्ता विवेचन: **गृहस्थ आश्रम में सेवा:** हम स्वयं भगवान के सेवक होते हैं और हमारे परिवार के लोग भी भगवत्सेवा में इच्छुक होकर मार्ग में अंगीकृत होते हैं। गृहस्थ आश्रम में रहकर भगवत्सेवा परायण होना चाहिए, जिससे हमारी अहंता-ममता भगवान के प्रति समर्पित हो। जब हम स्वयं भगवत्सेवा पूर्णतः नहीं कर पाते, तो परिवार के जनों की सहायता लेते हैं। **अपेक्षित सहायता का अभाव:** परंतु यदि परिवार के लोग भी भगवत्सेवा में पूर्णतः प्रवृत्त न हों और उनका चित्त भगवत्सेवा में न लगे, जिससे ठाकुरजी को परिश्रमित होना पड़े, तो हमें क्लेश होता है। गृहस्थ आश्रम भक्ति का साधक है, बाधक नहीं, परंतु प्रायः हम भक्ति कर पाने में समर्थ नहीं होते, और हमारी भक्ति प्रक्रिया सहायक सिद्ध नहीं हो पाती। श्री हरिरायजी विज्ञप्ति कर रहे हैं कि अहंता-ममता का समर्पण करते हुए संसार भी साधक है, बाधक नहीं। किंतु यदि परिवार के लोग भक्ति से विपरीत कार्य करने लगें, तो उनके कारण हमें क्लेश होता है। ऐसी स्थिति में जीव क्या कर सकता है?
४
बहिर्मुख संबंधियों का प्रभाव
०९:३१ – ११:४५ — बहिर्मुख संबंधियों का प्रभाव
बहिर्मुख संबंधियों का प्रभाव
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक में कहा गया है कि जो बहिर्मुख हैं, वे अपने संबंध से मुझे बहिर्मुख कर रहे हैं। या वे अपने संबंध को ही बहिर्मुख करते हैं। परंतु इस भ्रम से कि वे सहायता करेंगे, मैं उनको छोड़ने का उत्साह नहीं करता।
• वक्ता विवेचन: परिवार के लोग कभी भगवत्सेवा में प्रवृत्ति दिखाते हैं, कभी नहीं, कभी उदासीनता दिखाते हैं। उनके अंदर एकरूपता न होने पर ऐसे लोगों को बहिर्मुख जानना चाहिए। बहिर्मुख व्यक्ति स्वयं भी बहिर्मुख होता है और अपने संग से अन्य लोगों को भी बहिर्मुखता प्रदान करवाता है। फिर भी जीव ऐसा सोचता रहता है कि मैंने इन सभी को भगवत्सेवा के लिए ही इकट्ठा किया है। परंतु उसके पीछे हमारा लोक पोषित होता है, भगवत्सेवा पोषित नहीं होती। उनकी बहिर्मुखता को देखने के बाद भी ऐसे लोगों को त्यागने की प्रवृत्ति हमारे अंदर प्रकट नहीं होती, जिसका क्लेश श्री हरिरायजी प्रकट कर रहे हैं।
५
गृहस्थ जन से ठगाया जाना
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक का अर्थ है कि जैसे ठग पुरुष मार्ग में रहे मनुष्य को सहायता का भ्रम उत्पन्न करके ठगते हैं, वैसे ही हे नाथ, मैं गृहस्थित जन से ठगाया गया हूँ।
• वक्ता विवेचन: **मार्ग में ठगाना:** श्री हरिरायजी विज्ञप्ति कर रहे हैं कि जैसे रास्ते में कोई व्यक्ति सहायता का भ्रम देकर (जैसे रास्ता दिखाने का बहाना करके) ठगी करता है, उसी प्रकार भक्त यह सोचते हैं कि उन्होंने अपने परिवार के लोगों को भगवत्सेवा के लिए संगठित किया है। **सेवक का ठगने जैसा अनुभव:** परंतु वही लोग जब भगवत्सेवा में सहायक नहीं होते, तो उनके सहायक न होने के कारण भक्त स्वयं को उनके द्वारा ठगा हुआ महसूस करता है।
६
गृहस्थों के दुर्वचन से व्यथा
१३:२५ – १५:१७ — गृहस्थों के दुर्वचन से व्यथा
गृहस्थों के दुर्वचन से व्यथा
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक का अर्थ है कि जैसे अंधे कुएं में गिरे हुए व्यक्ति को मेंढक अपने दुष्ट स्वर से व्यथा देते हैं, वैसे ही गृहस्थित जन के दुर्वचन से मुझे व्यथा होती है।
• वक्ता विवेचन: **अंधकूप का दृष्टांत:** जैसे कोई व्यक्ति गहरे कुएं में गिर जाए, तो उसे केवल मेंढकों की कर्कश आवाजें सुनाई देती हैं, जिससे उसके हृदय में भय उत्पन्न होता है। उसी प्रकार, जो जीव संसार के आवेश में पड़ चुका है, उसे घर-परिवार के लोग दुष्ट वचन बोलते रहते हैं। उन दुष्ट वचनों को सुनते-सुनते जीव को क्लेश और दुख होता है, जिसका निरूपण यहां किया जा रहा है।
७
प्रश्नोत्तर — 'मैंने सेवक किए हैं' का तात्पर्य
१५:१७ – १७:५६ — प्रश्नोत्तर — 'मैंने सेवक किए हैं' का तात्पर्य
प्रश्नोत्तर — 'मैंने सेवक किए हैं' का तात्पर्य
• वक्ता विवेचन: **प्रश्न:** 'मैंने सेवक किए हैं' और 'गृहस्थ वैष्णव' शब्दों का तात्पर्य क्या है? मुख्य सेवाकर्ता स्वयं है और अन्य सभी परिचारक हैं, इसलिए ऐसा कहा गया है? नौकरों की बात तो नहीं हो रही है?
**उत्तर:** 'मैंने सेवक किए हैं' का अर्थ है कि हमारे संपर्क में आने से, विवाह होने के कारण, या संतान उत्पन्न करने के कारण ही वे लोग वैष्णव बने हैं। स्वयं पहले मार्ग में अंगीकृत हुए हैं, और उसके बाद अन्य संबंधी बने हैं, इसलिए ऐसा कहा गया है। हम प्रधान सेवक होते हैं, इसलिए जो भी व्यक्ति हमारे घर में सेवा के लिए आता है, वह हमारा सहायक कहलाता है। पुष्टिमार्गीय भक्त वस्तुतः उन लोगों को अपने घर में भगवत्सेवार्थ ही लाते हैं। **गृहस्थ आश्रम का उद्देश्य:** 'पुत्रे कृष्ण प्रिय रतिह' आदि वचनों का यही तात्पर्य है कि हम गृहस्थ आश्रम में भक्ति मार्ग में सहायक लाने के लिए ही आते हैं। परंतु यदि वही लोग बहिर्मुखता उत्पन्न करवाने लग जाएं, तो क्लेश होता है। वे हमारे कारण मार्ग में आए हैं, ऐसी हमारी प्रतीति है। भगवान के द्वारा वे अंगीकृत हैं, यह तो स्वाभाविक है।
८
प्रश्नोत्तर — प्रतिकूल परिवार में भगवत्सेवा
१७:५६ – २०:२२ — प्रश्नोत्तर — प्रतिकूल परिवार में भगवत्सेवा
प्रश्नोत्तर — प्रतिकूल परिवार में भगवत्सेवा
• वक्ता विवेचन: **प्रश्न:** यदि परिवार वाले ब्रह्मसम्बन्ध ले लेते हैं पर सहायक नहीं होते हैं, तब इस स्थिति को कैसे संभालेंगे?
**उत्तर:** श्रीमहाप्रभुजी ने तीन प्रकल्प बताए हैं: 'उदासीने स्वयं कुरियत, प्रतिकू दहम तजेत, अनुकूले भगवत कार्य करवाना'। यदि वे अनुकूल हैं, तो उन्हें भगवत्सेवा में परायण करना चाहिए। यदि वे उदासीन हैं, तो उनसे नहीं कहना चाहिए, हमें स्वयं करना चाहिए। और यदि वे प्रतिकूल हैं, तो प्रतिकूल ग्रहम तेज, अर्थात प्रतिकूलता में हमें अपना घर छोड़ देना चाहिए। इन तीनों में से जो भी हमारे लिए संभव हो, वह हमें करना चाहिए। **क्लेश का कारण ममता:** क्लेश इसलिए होता है क्योंकि हम उनके प्रति ममता का त्याग नहीं कर पाते। उनके साथ हमारा सांसारिक संबंध होता है, और कर्तव्यपरायणता से अधिक उनसे हमें प्रेम होता है। वही प्रेम फिर बहिर्मुखता का कारण बनता है, क्योंकि उनका मन भगवान में नहीं लगता और उनके पीछे हमारा भी मन भगवत्सेवा में नहीं लगता या बँट जाता है। यह व्यक्ति की अपनी संभावना की बात है, पर सामान्य रूप से यही स्थिति होती है।
९
भगवत्कृपा की अपेक्षा और दोषों का विचार
२०:२२ – २३:०३ — भगवत्कृपा की अपेक्षा और दोषों का विचार
भगवत्कृपा की अपेक्षा और दोषों का विचार
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक में कहा गया है कि कितने दिन तक ऐसे ही मेरी उपेक्षा करोगे? या दोष सहित मैं हूं, तो दयालु ने त्याग क्यों किया? हे नाथ, मैं ऐसा दुखी हूं। मेरी उपेक्षा करोगे या मुझे दोष सहित जानकर त्यागोगे? परंतु मैं यह मन में जानता हूं कि तुम दयालु हो, त्याग तो कभी नहीं करोगे।
• वक्ता विवेचन: **भगवान के समक्ष दोष:** श्री हरिरायजी विज्ञप्ति कर रहे हैं कि भगवान के सामने हमारे बहुत दोष हैं। क्या भगवान ने हमारी उपेक्षा की, या हमारे दोष देखकर हमारा त्याग कर दिया? परंतु भक्त के मन में यह संकल्प होता है कि भगवान दयालु हैं, इसलिए भक्त का त्याग तो नहीं करते। **श्रीगोसाईंजी की विज्ञप्ति:** श्रीगोसाईंजी ने भी अपनी विज्ञप्ति में आज्ञा की है (श्लोक: चित्तेन दुष्टो वचसाप दुष्ट कायन दुष्ट क्रियाया च दुष्ट ज्ञानेन दुष्टो भजनेन दुष्टो ममा अपराध कतिधा विचार) कि हमारा चित्त दुष्ट है क्योंकि वह कृष्णप्रवण नहीं है। हमारी वाणी भी दुष्ट है क्योंकि हम वृथा आलाप करते रहते हैं। शरीर में भी दुष्टता है क्योंकि हम भगवत्सेवा में प्रवृत्ति नहीं करते, और लौकिकी क्रियाओं में हमारे देह आदि का अभिनिवेश होता है। हम ज्ञान से भी दुष्ट हैं क्योंकि प्रभु का ज्ञान हमारे चित्त में नहीं ठहरता। भगवत्भजन भी हम निष्कपटता से नहीं करते, कोई न कोई कापट्य हमारे चित्त में बना रहता है। **दयालुता पर विश्वास:** ये जो भी हमारे अपराध हैं, उनमें कितने अपराधों का भगवान विचार करेंगे? ऐसा सोचकर यहां विज्ञप्ति की जा रही है कि भगवान दयालु स्वभाव के हैं, इसलिए वह हमारा त्याग तो नहीं करते। भगवान को हमारे इन दोषों की उपेक्षा करनी चाहिए।
१०
भगवान के त्याग करने पर जीव की गति
२३:०३ – २५:४७ — भगवान के त्याग करने पर जीव की गति
भगवान के त्याग करने पर जीव की गति
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक का अर्थ है कि यदि आप त्याग करो तो मैं कहां जाऊं? मुझे कहीं शरण नहीं है। दीन अपने जन को नाव पर बिठाकर धारा के मध्य में डूबो मत।
• वक्ता विवेचन: **भगवान ही एकमात्र शरण:** श्री हरिरायजी विज्ञप्ति कर रहे हैं कि यदि भगवान हमें छोड़ देंगे, तो ऐसा होगा कि किसी ने हमें नाव पर बिठाकर मजधार में फेंक दिया हो। **असमर्थता और भय:** हे नाथ, तुम ईश्वर हो, अकर तुम, अन्यथा कर तुम, सर्व सामर्थ्य युक्त हो। यदि यह जानकर कि मैं शरण के लायक नहीं हूं, तुम कदाचित त्याग करो, तो हम कहां जाएंगे? तुम्हारे बिना और कहीं ठिकाना नहीं है, तुम्हारी शरण बिना किसी और को नहीं जानते। इसलिए तुम त्याग करोगे, तब मेरी क्या दशा होगी? **केवट का दृष्टांत:** जैसे नाव में बिठाकर मध्यधारा के बीच में नाव छोड़ दी जाए, तो वह क्या करे? वहां केवट ही सहायक हो तो पार लगे, और कोई उपाय नहीं है। हम तुम्हारे पुष्टिमार्ग रूपी नाव में बैठे हैं। अब तुम्हारे मन में आवे वैसी करो। **संसार सागर पार करने का आधार:** हम भगवान के ही सहारे संसार सागर को पार करते हैं, और कोई साधन से युक्त नहीं हैं। परंतु यदि भगवान ही ऐसी स्थिति में हमें छोड़ देंगे, तब हमारी क्या गति होगी? ऐसी स्थिति में हमें कोई बचाने वाला नहीं होता है। जैसे कोई केवट अपनी नाव में से किसी व्यक्ति को फेंक दे और समुद्र के बीच में छोड़ दे, तो केवट की सहायता के अलावा हम किसी और की सहायता ले भी नहीं सकते। उसी प्रकार संसार को पार करने की प्रक्रिया में भगवान के अतिरिक्त और कोई सहायक हो नहीं सकते। इसलिए ऐसी स्थिति में भगवान ही हमारे सहायक हैं, ऐसी विज्ञप्ति यहां श्री हरिरायजी कर रहे हैं।
११
प्रश्नोत्तर — भगवान द्वारा त्याग का भय
२५:४७ – २८:२९ — प्रश्नोत्तर — भगवान द्वारा त्याग का भय
प्रश्नोत्तर — भगवान द्वारा त्याग का भय
• वक्ता विवेचन: **प्रश्न:** घर वाले सहायक नहीं हैं, इसके लिए हम सेवा नहीं कर रहे, इसका मतलब ये हमको त्याग कर देंगे, तो खुद भी सेवा नहीं कर रहे? नहीं, पर हमारा भी त्याग कर देंगे, ऐसा क्यों?
**उत्तर:** हमारा त्याग कर देंगे, ऐसा नहीं है। हम मार्गीय प्रक्रिया का अनुसरण यदि ढंग से नहीं करेंगे, तो भगवान हम पर अप्रसन्न होंगे, और अप्रसन्न होंगे तो त्याग देंगे, ऐसी शंका होती है। घर वाले जो सहायक नहीं हैं, इसके लिए आपको कष्ट हो रहा है। इसके लिए आप सेवा बराबर नहीं कर रहे हो, ऐसा नहीं है। घर वाले नहीं कर रहे, वह बात तो सच है, पर हमसे खुद से भी तो (सेवा) नहीं होती है। **चित्त की कृष्णप्रवणता:** चित्त की कृष्णप्रवणता पूर्वक हमें जैसी भगवत्सेवा में प्रवृत्ति करनी चाहिए, वैसी प्रवृत्ति तो हमसे भी नहीं हो रही है। जब हमारा चित्त भगवत्सेवा में प्रवण नहीं होता है, तब ठाकुरजी को उसमें प्रसन्नता का अनुभव भी नहीं होता है। आज यहां रखते हैं। आगे का विषय फिर सोमवार को करेंगे।
📖 सार
📌 सार
श्री हरिरायजी के २८वें शिक्षापत्र में जीव की भगवत्कृपा प्राप्त करने की योग्यता का निरूपण है, जिसमें पुष्टिमार्गी होना ही वैष्णव का सहज धर्म और योग्यता है। माया संबंधी अहंता-ममता के दावानल में जलती जीवात्मा को केवल नीलमेघ रूप श्रीगोवर्धननाथजी की कृपा-वर्षा ही शांत कर सकती है। गृहस्थ आश्रम में भगवत्सेवा के लिए संगठित किए गए परिवारजन जब सहायक नहीं होते या भक्ति से विपरीत कार्य करते हैं, तो भक्त को क्लेश होता है। बहिर्मुख संबंधी स्वयं भी बहिर्मुख होते हैं और दूसरों को भी बहिर्मुखता प्राप्त करवाते हैं, फिर भी जीव ममतावश उनका त्याग नहीं कर पाता। भक्त अपनी चित्त, वाणी, काया, क्रिया, ज्ञान और भजन में दुष्टता स्वीकार करता है, परंतु भगवान के दयालु स्वभाव पर पूर्ण विश्वास रखता है कि वे उसका त्याग नहीं करेंगे। जीव भगवान के अतिरिक्त और किसी को अपनी शरण नहीं मानता, और विज्ञप्ति करता है कि यदि भगवान ही त्याग दें तो उसकी क्या गति होगी, जैसे मजधार में छोड़ी गई नाव का कोई सहायक नहीं होता। मुख्य सेवक से भी चित्त की कृष्णप्रवणता पूर्वक सेवा न होने पर ठाकुरजी को प्रसन्नता का अनुभव नहीं होता, जिससे भगवान की अप्रसन्नता का भय रहता है।