शिक्षापत्र २८ — आश्रय सिद्धि हेतु दैन्य सिद्धि की कामना का परिचय
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शिक्षापत्र २८ (परिचय)
वक्ता विवेचन
श्रीहरिरायजी २८वें पत्र में आश्रय सिद्धि हेतु दैन्य सिद्धि की कामना प्रकट कर रहे हैं। वक्ता ने बताया कि जीव की अवस्था का वर्णन किया गया है और भगवान जो भक्तों के दुर्गुणों या जीवों के स्वाभाविक सहज आविद्यक दोषों को देखकर कहीं उनका त्याग न कर दें, ऐसी संभावना का विचार किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जीवों की क्या गति होगी, उस पर विचार किया गया है।
शिक्षापत्र २८, कारिका २० — आचार्य कुल में जन्म का प्रयोजन
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शिक्षापत्र २८, कारिका २०
वक्ता विवेचन
वक्ता ने कारिका प्रस्तुत की: 'निजचार्य कुले जन्म किमर्थं विहितम मम विहितम चेन मई सदा दोष पीने कृपा कुरु।' शब्दार्थ में बताया कि 'अपने आचार्य कुल में मेरो जन्म काहे को कियो? जब कियो तब सदा दोष सो पुष्ट एसो जो मैं ताकि ऊपर कृपा करो।' वक्ता ने टीका का आशय समझाते हुए कहा कि श्रीहरिरायजी विनती कर रहे हैं कि भले ही भगवान जीव का त्याग कर दें, तो जीव का भगवान की इच्छा पर कोई वश नहीं है, उसे तो हर स्थिति में स्वीकारना ही है। परन्तु यदि श्रीमहाप्रभुजी जैसे आचार्य कुल में जीव को जन्म मिला हो, तो फिर भगवान ऐसा त्याग क्यों करें? भगवान ने ही इस उत्तम कुल में जन्म दिया है, अतः उत्तम कुल में जन्म देने के बाद जीव का यदि त्याग कर देते हैं, तो वह अनुरूप नहीं है, ऐसी विनती श्रीहरिरायजी कर रहे हैं।
शिक्षापत्र २८, कारिका २१ — असत्संग और भय की स्थिति
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शिक्षापत्र २८, कारिका २१
वक्ता विवेचन
वक्ता ने कारिका प्रस्तुत की: 'असंग सर्वथा दुए असत्संग सहितोक्त्यम यथाने परित्यक्तः कादशी को मृगादनह।' शब्दार्थ में बताया: 'मैं असत पुरुषन के संग सहित हूं सो इनसो सर्वथा असंग संग दोष न लगे दूर रहत हूं तोहू खेद पावत हो जैसे वन में परित्यक्त और दिगूढ़ माथो फिर गयो तासो दिशा भूल गयो पुरुष मृगादन जो सिंहादिक ता कर भय पावे ते मैं असत्संग सो भय पावत हूं।' वक्ता ने टीका का आशय स्पष्ट करते हुए बताया कि हे नाथ, असत्संग भक्त को दसों दिशाओं से घेरे हुए है, यह बड़ा दुख है। रंचक कुसंग से भी बुद्धि बिगड़ जाती है, और यहाँ तो सर्व ओर से दुस्संग व्याप्त है, जिससे सुंदर बुद्धि का नाश हो गया है। सत्संग उससे दूर हो गया है, इसलिए भक्त अकेला है। वक्ता ने समझाया कि ऐसी दुस्संग वाली स्थिति में हमें ऐसी प्रतीति होती है कि मानो किसी ने हमें जंगल में अकेला छोड़ दिया हो, जहाँ भय लगता है और चारों तरफ से जब सिंह की गर्जना की आवाज आती है, तो हम यह नहीं जानते कि किस दिशा में जाने पर हमारी रक्षा हो पाएगी। कलयुग के अंदर भक्त को भी ऐसा ही प्रतीत होता है कि चारों तरफ से उसे दुस्संग ने घेर रखा है और वह नहीं जानता कि किस दिशा में जाने पर उसे उत्तम मार्ग प्राप्त हो पाएगा या वह इस असत्संग से बच पाएगा।
शिक्षापत्र २८, कारिका २२ — भक्तों द्वारा त्याग की अवस्था
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शिक्षापत्र २८, कारिका २२
वक्ता विवेचन
वक्ता ने कारिका प्रस्तुत की: 'जात पक्षाह खगाह जननीन चजती ही यथा तथा करा लेस्मिन कालेह हम भगवत जनेह।' शब्दार्थ में कहा गया: 'जैसे पाख उत्पन्न भए ऐसे पक्षी अपनी माता को छोड़ देते हैं। फिर माता करी रहित होत है। मैं भगवान के जन जो भक्त ता करी रहित हो गयो हूं।' वक्ता ने टीका का आशय समझाते हुए बताया कि मेरी क्या अवस्था है, जैसे पक्षी के बच्चे को जब पंख होते हैं, तब वह बच्चा अपनी जननी जो माता है, उसको तजकर अनेक वन में उड़ जाता है। वक्ता ने व्याख्या की कि उत्तम भक्त जो थे, उत्तम संग जिनका हमें प्राप्त हो रहा था, उन लोगों ने तो हमें छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें अब हमारे साथ रहने की जरूरत नहीं है। परन्तु हमें तो उनकी अपने साथ आवश्यकता थी। भक्त की यह स्थिति है कि वह अभी तक अपरिपक्व अवस्था में है, अब तक उसे पंख नहीं उगे हैं। ऐसी स्थिति में अन्य भक्तों ने जब उसे छोड़ दिया है, तो अब उसके पास अपनी रक्षा का कोई साधन नहीं रहा, ऐसी स्थिति की प्रतीति हो रही है।
शिक्षापत्र २८, कारिका २३ — चिंता रूप भवसागर से उद्धार
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शिक्षापत्र २८, कारिका २३
वक्ता विवेचन
वक्ता ने कारिका प्रस्तुत की: 'चिंता पारा वारे पतितस्यत्रव मग्नस्य एत जल वड़वाग्निह शरणम श्री वल्लभाचार्य।' शब्दार्थ में कहा गया: 'चिंता रूप समुद्र में गिर्यो और या में ही डूब्यो एसो जो मैं ताको वह जल के शोषण में वडवानल रूप श्री वल्लभाचार्य जी शरण हैं।' वक्ता ने टीका का आशय समझाते हुए बताया कि भगवदीय के संग के बिना मेरे हृदय में ऐसी चिंता है जिसका पार नहीं। भक्त चिंता रूप समुद्र में मग्न है। दृष्टांत देते हुए कहा कि जैसे कोई महागंभीर पानी के समुद्र में मग्न हो गया हो, ताको एक वडवा अगगनि ही सहायभूत होती है, जो एक क्षण में सारा पानी शोष लेती है। वक्ता ने वडवाग्नि का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि समुद्र के अंदर भी ऐसे पर्वत होते हैं जिनमें ज्वालामुखी होते हैं, यद्यपि वे इतने गहरे होते हैं कि वहाँ तक हम पहुँच नहीं सकते, परन्तु वो अग्नि जल के अंदर भी कहीं न कहीं रहती है। वडवानल का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे अग्नि जल का वाष्पीभूत कर देती है और हम उसमें से बच जाते हैं, ऐसे ही यह संसार रूपी भवसागर भी इतना गहरा समुद्र है कि इसमें हम जल रहे हों, ऐसी स्थिति में श्रीमहाप्रभुजी की शरण में जाने पर ही हमारी रक्षा हो सकती है। महाप्रभुजी लौकिक अग्नि नहीं, अलौकिक अग्नि रूप हैं, जो एक क्षण में सारी चिंता, संसार दुख सब शोष लेंगे, यह उपाय है। श्रीमहाप्रभुजी की उपस्थिति में यह जो संसार रूपी अथाह सागर है, वह भी हमें डुबो नहीं देगा, ऐसी आकांक्षा यहाँ उपस्थित कर रहे हैं।
शिक्षापत्र २८, कारिका २३ पर विप्रयोगात्मक भाव
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शिक्षापत्र २८, कारिका २३ पर विप्रयोगात्मक भाव
वक्ता विवेचन
- श्री हरिरायजी का अनुभव: वक्ता ने बताया कि 'हा कृष्ण हा नंद सोनो हा यशोदा प्रिया भका हा गोपिका हृदा धार धार यस्व करेण नमः।' ऊपर कहे अनुसार श्रीहरिरायजी दीनता करते-करते विप्रयोगात्मक अग्नि हृदय में प्रकट होने से अत्यंत विरह में देहानुसंधान भूलकर 'हा कृष्ण' ऐसे फलात्मक नामों का स्मरण कर रहे हैं।
- भगवान के फलात्मक नाम: वक्ता ने स्पष्ट किया कि श्रीहरिरायजी विप्रयोग का अनुभव करते हुए अपने हृदय से जो उद्गार प्रकट कर रहे हैं, उसमें भगवान के जिन नामों का उच्चारण किया गया है, वे सभी ब्रज भक्तों के रूप से किए गए हैं, क्योंकि उन्हीं को भगवान के विप्रयोग रूप उत्तम फल की अनुभूति होती है:
- 'हा कृष्ण': यह भगवान का फलात्मक नाम है, और यह श्रुति रूप गोपिकाओं के भाव से कहा गया है।
- 'हा नंद सोनू': 'श्री नंदरायजी के पुत्र' इस पद से कुमारिकाओं के भाव का बोध होता है। जैसे श्रीनंदरायजी ने प्रभु का पालन किया, वैसे ही कुमारिकाओं को प्रभु के दर्शन और प्रभु की सेवा प्राप्त हुई। इसलिए यह दूसरा नाम कुमारिकाओं के भाव से कहा गया है।
- 'हा यशोदा प्रिया भका': 'श्री यशोदाजी के प्राण प्रिय पुत्र' यह श्रीयमुनाजी के भाव से है।
- 'हा गोपिका हृदा धार': 'श्री गोपीजन के हृदय के आधार' यह मुख्य श्रीस्वामिनीजी के भाव से है।
- उद्धार की आकांक्षा: वक्ता ने बताया कि ये चारों नाम लेकर कहते हैं जो ऐसे प्रभु विप्रयोग समुद्र में हम परे हैं, तिनके तिन को अपने करते उद्धार करो। ऐसे जो भगवान हैं, जिन्होंने सभी ब्रज भक्तों को अपने विप्रयोगात्मक उत्तम फल का अनुभव करवाया, परम फल का अनुभव करवाया, उन्हीं को फल के रूप में यहाँ कह रहे हैं। यह जो फलात्मक भगवान का स्वरूप है, इसी फल के द्वारा हमें ऐसा ही फल हमें भी भगवान के विप्रयोग में सिद्ध हो, ऐसी आकांक्षा से यह भाव श्रीहरिरायजी ने प्रकट किए हैं। वक्ता ने अंत में बताया कि 'इति श्री हरिराय जी कृत कृतम अष्टाविंशति तमंम शिक्षा पत्रम श्री गोपेश्वर जी कृत ब्रज भाषा टीका समेतम समाप्तम' – यहाँ ये २८वां पत्र संपन्न होता है।
शिक्षापत्र २९ का परिचय — बुद्धि नाश के कारण और उपाय
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शिक्षापत्र २९ (परिचय)
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बताया कि आगे २९वां पत्र है। २९वें शिक्षापत्र में बुद्धि को नाश करने वाला यह काल आ गया है। तासो सत्संग, श्रीकृष्ण स्मरण और शरणागति रूप साधन करके बुद्धि स्थिर रखनी चाहिए। ऐसे न करें तो स्वकृति व्यर्थ है। तासो ही श्री आचार्यजी बुद्धि प्रेरक श्रीकृष्ण के चरणकमल प्रसन्न हों, ऐसे प्रार्थना करके गायत्री का अर्थ बताया है। श्रीकृष्ण स्मरण और शरणागति से प्रभु ही बुद्धि स्थिर रखेंगे, यह निरूपण है। वक्ता ने समझाया कि दैन्य से विप्रयोग प्रकट होने पर भगवद्धर्म सिद्ध होता है, तो बुद्धि कौन प्रकार स्थिर रहे, यह आगे कहा जा रहा है। कलयुग के कारण हमारी बुद्धि का नाश हो जाता है, ऐसा निरूपण जो २८वें पत्र में श्रीहरिरायजी ने किया था, कि यहाँ हमें दुष्ट संग थोड़ा भी मिलता है तो हमारी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। ऐसी स्थिति में सत्संग, श्रीठाकुरजी का नित्य प्रतिस्मरण और प्रभु की अनन्य शरणागति — ये तीन ही साधन हैं जिनसे हमारी बुद्धि स्थिर रहती है। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो हम कलयुग में बैठे-बैठे जितना भी करते रहते हैं, वह सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। वक्ता ने बताया कि श्रीमहाप्रभुजी ने भी भगवान के ही चरणकमलों में प्रणाम करके और फिर सब कुछ कार्य किया है। गायत्री का अर्थ यद्यपि महाप्रभुजी के नाम से प्रचलित है वह ग्रंथ, परन्तु श्रीपुरुषोत्तमजी ने उस ग्रंथ के ऊपर टीका नहीं लिखी है, इसलिए महाप्रभुजी का हो ऐसा प्रामाणिक रूप से संप्रदाय में स्वीकारा नहीं गया है। तात्पर्य यह है कि भगवान का स्मरण और शरणागति से ही हमारी बुद्धि स्थिर रह पाती है। इसलिए दैन्य से विप्रयोग प्रकट हो और भगवद्धर्म की सिद्धि हो, उसी के लिए हमारी बुद्धि का निसंग होना अर्थात कम से कम दुष्ट संग से ज्यादा प्रभावित ना हो जाना आवश्यक है, उसी का निरूपण इस पत्र में कर रहे हैं।
सत्र समापन
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सत्र समापन
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बताया कि समय हुआ है, आज यहाँ रखते हैं। कल श्रीपुरुषोत्तमजी के उत्सव निमित्त श्री श्यामाकाकाजी के प्रवचन का क्रम है, इसलिए रात्रि अध्ययन का क्रम नहीं रखेंगे। सभी लोग श्यामकाकाजी के प्रवचन को कल सुनें और परसों आगे का क्रम करेंगे।