श्लोक २ (उपसंहार) : भावपूर्वक शरणागति एवं नामजप
पाठ
श्लोक २
वक्ता विवेचन
वक्ता ने स्पष्ट किया कि जीव जो भी साधन या क्रिया करे, वह भाव सहित होनी चाहिए। सत्संग, प्रभु का स्मरण और शरणागति—इन तीनों में अष्टाक्षर मन्त्र का जप अनिवार्य है, किन्तु वह शरणागति की भावना के बिना व्यर्थ है। केवल जिह्वा मात्र से उच्चारण करने से शरणागति सिद्ध नहीं होती; मन को प्रभु में लगाने और हृदय में भगवच्छरणागति का सुदृढ़ भाव धारण करने पर ही शरणागति की सिद्धि होती है।
श्लोक ३ : बुद्धिप्रेरक श्रीकृष्ण के चरणकमल
पाठ
श्लोक ३
वक्ता विवेचन
वक्ता ने पाठ करते हुए समझाया कि स्वकीय जनों पर दयालु श्रीमन्महाप्रभुजी ने आज्ञा की है कि बुद्धि के प्रेरक श्रीकृष्ण के चरणकमल प्रसन्न हों। हरिरायजी अपने वचनों को पुष्ट करने के लिए श्रीमन्महाप्रभुजी के भागवतार्थ प्रकरण के चतुर्थ स्कन्ध की कारिका का प्रमाण देते हैं कि भगवान ही हमारी बुद्धि को प्रेरित करते हैं। हम असमर्थ जीवों के लिए प्रभु के चरणकमलों के अनुग्रह से ही बुद्धि भगवच्छरणागति में स्थिर होती है। जो मन, वचन और कर्म से श्रीकृष्ण की शरण में रहता है, उसी की बुद्धि निर्मल और सुन्दर होती है।
श्लोक ५ : विषय-चिन्तन से बुद्धिनाश का क्रम
पाठ
श्लोक ५
वक्ता विवेचन
वक्ता ने श्लोक का अर्थ बताते हुए कहा कि बुद्धि का नाश होने पर सर्वनाश हो जाता है, अतः भगवद्भाव के प्राकट्य का कारण होने से बुद्धि की भली-भाँति रक्षा करनी चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर पतन का क्रम निरूपित किया गया कि विषयों के ध्यान से संसारी जीवों का दुःसंग होता है, जिससे विविध कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। कामना में विघ्न आने पर क्रोध, क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति-भ्रंश, स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश और अन्ततः आत्मा का पतन हो जाता है। अज्ञान के वशीभूत होकर जीव अधोगति की क्रियाओं में प्रवृत्त हो जाता है, इसलिए बुद्धि की रक्षा करना परम आवश्यक है।
श्लोक ६ : महाप्रसाद, सेवा और सत्संग से बुद्धि-रक्षा
पाठ
श्लोक ६
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बुद्धिरक्षा के व्यावहारिक उपाय निरूपित करते हुए स्पष्ट किया कि असमर्पित वस्तु में चित्त को कभी नहीं लगाना चाहिए। नित्य श्रीठाकुरजी के महाप्रसाद का ही भक्षण करना चाहिए, क्योंकि अन्न के अनुरूप ही बुद्धि का निर्माण होता है। प्रभु की नित्य भगवद्सेवा करनी चाहिए ताकि इन्द्रियाँ सांसारिक विषयों से विमुख रहें। दुःसंग का त्याग कर उत्तम भगवदीय वैष्णवों का सत्संग करना चाहिए तथा प्रभु के नाम और लीलाओं का श्रवण-कीर्तन करना चाहिए। इससे बुद्धि निर्मल और निश्चयात्मिका बनी रहती है और प्रभु हृदय में विराजते हैं। इसी के साथ श्रीगोपेश्वरजी कृत ब्रजभाषा टीका सहित उनतीसवाँ शिक्षापत्र सम्पन्न हुआ।
प्रश्नोत्तर : साधनांग, सम्मोह एवं स्मृति-विभ्रम
पाठ
प्रश्नोत्तर (श्लोक २ एवं गीता सन्दर्भ)
वक्ता विवेचन
- साधनांगों का त्रिविध स्वरूप: प्रतिभागी ने श्लोक २ में आए सत्संग, स्मरण और शरणागति को कायिक, वाचिक और मानसिक रूप से ग्रहण करने के विषय में पूछा, जिस पर वक्ता ने सहमति व्यक्त की।
- सम्मोह का स्वरूप: गीता के श्लोक में क्रोध के पश्चात सम्मोह की प्रक्रिया पर पूछे गए प्रश्न के समाधान में वक्ता ने बताया कि सम्मोह का तात्पर्य बुद्धि का किसी कामना में अटक जाना है। कामना पूरी न होने पर जब क्रोध आता है, तो व्यक्ति उस विचार से मुक्त नहीं हो पाता और बुद्धि उसी में उलझ जाती है।
- स्मृति-विभ्रम और विवेक: प्रतिभागी द्वारा स्मृति-विभ्रम की व्याख्या पूछने पर वक्ता ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ सामान्य भूलना नहीं, अपितु धर्म और अधर्म के विवेक का लुप्त हो जाना है। बुद्धि यह निर्णय करने में असमर्थ हो जाती है कि कौन सा कार्य करणीय है और कौन सा अकरणीय।