शिक्षापत्र 19 : उत्तम भगवदीय का स्वरूप
इस भाग में वक्ता ने शिक्षापत्र के तीसरे श्लोक 'निजाचार्य पद भोज सेविनस्तु' की व्याख्या करते हुए अनन्य पुष्टिमार्गीय भगवदीय के लक्षणों को स्पष्ट किया है। यहाँ ऐसे वैष्णव की चर्चा है जो श्रीमहाप्रभुजी के चरणकमलों में अनन्य निष्ठा रखते हैं, दंभ और पाखंड से रहित हैं तथा श्रीकृष्ण की सेवा एवं लीला-चिंतन में सदैव तत्पर रहते हैं। वक्ता ने इस कलिकाल में ऐसे दुर्लभ वैष्णवों के संग की अनिवार्यता पर विशेष बल दिया है।
शिक्षापत्र 19 : मनुष्य देह की सार्थकता और दीनता
इस अध्याय में वक्ता ने शिक्षापत्र के चौथे और पांचवें श्लोक के माध्यम से श्रीहरिरायजी की दैन्य-भावना का विश्लेषण किया है। यहाँ यह समझाया गया है कि दुर्लभ मनुष्य देह प्राप्त होने पर भी यदि श्रीकृष्ण की शरणागति सिद्ध न हो, तो यह जन्म वृथा है। वक्ता ने प्रह्लादजी और जनकजी के वचनों को उद्धृत करते हुए यह स्पष्ट किया कि कौमार अवस्था से ही भगवद्धर्म का आश्रय लेना चाहिए क्योंकि यह देह क्षणभंगुर है।