गत सत्र का स्मरण एवं श्लोक ४ का उपक्रम
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १-३ (संदर्भ), श्लोक ४ (उपक्रम)
• प्रतिभागी वाचन: कल हमने बालबोध ग्रन्थ के तीन श्लोक देखे थे। आज चौथे श्लोक में श्रीमहाप्रभुजी लौकिक पुरुषार्थों का निरूपण कर रहे हैं। अलौकिक पुरुषार्थ वेद में सुस्थित हैं और उन पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
• वक्ता विवेचन: **उपक्रम का महत्व:** उपक्रम का अर्थ है विषय को सही ढंग से जोड़ना। दूसरे श्लोक में श्रीमहाप्रभुजी ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मनीषियों के चार पुरुषार्थ बताए थे, जिनका विचार ईश्वर और जीव दोनों ने किया। ईश्वर विचारित पुरुषार्थ वेद में कहे गए हैं और जीव विचारित पुरुषार्थ ऋषियों द्वारा ईश्वर की आज्ञा से प्रकट किए गए हैं।
श्लोक ४ — अलौकिक पुरुषार्थों का वेद में स्थित होना
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक ४
• प्रतिभागी वाचन: अलौकिक पुरुषार्थ तो वेद में स्थित हैं, जिनको विचार करने की आवश्यकता नहीं है। श्रीमहाप्रभुजी समझा रहे हैं कि अलौकिक पुरुषार्थ वेद में ईश्वर विचारित हैं, इसलिए उन पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
• वक्ता विवेचन: **अलौकिक पुरुषार्थों की स्थिति:** श्रीमहाप्रभुजी स्पष्ट करते हैं कि अलौकिक पुरुषार्थ वेद संस्थित हैं, ईश्वर विचारित हैं। अतः इनके बारे में यहाँ निरूपण नहीं करेंगे। जिन भक्तों को अलौकिक पुरुषार्थ सिद्ध करने की इच्छा हो, वे वेद में लिखे प्रमाणों का आचरण करें।
अलौकिक पुरुषार्थों की वर्तमान में अनुपलब्धता
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक ४ (विवेचन)
• प्रतिभागी वाचन: (यह खंड प्रश्नोत्तर और वक्ता विवेचन पर केंद्रित है।)
• वक्ता विवेचन: **कलिकाल में सिद्धि में बाधा:** कलिकाल के प्रवाह के कारण वैदिक धर्म और उसके पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) सिद्ध नहीं हो सकते, क्योंकि काल के प्रवाह से सब नष्ट हो चुका है। फल की तो दूर की बात है, ये पुरुषार्थ सिद्ध ही नहीं हो पाएंगे और इतने प्रचलित भी नहीं हैं। **प्रश्न:** अलौकिक पुरुषार्थों की सिद्धि आज के जीव से संभव नहीं है? **उत्तर:** ये पुरुषार्थ सिद्ध नहीं हो पाएंगे क्योंकि काल के प्रवाह के कारण सब नष्ट हो चुका है। वैदिक धर्म का आचरण करने की योग्यता भी आज के जीवों में नहीं बची है। कई वेद तो उपलब्ध ही नहीं हैं, जैसे सामवेद की १००० शाखाओं में से अब केवल २ ही बची हैं। श्रीमहाप्रभुजी को भी वेद की केवल ११ शाखाएँ ही उपलब्ध हुई थीं, और आज हम उनकी १६वीं पीढ़ी में हैं तो वह ११ शाखाएँ भी पूरी नहीं मिलतीं। **वेदों का लुप्त होना:** शाखा का अर्थ है एक मुख्य वेद, जिसे व्यास के शिष्यों ने पढ़ा और अपनी परंपरा में रखा। हर शाखा में मंत्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद जैसे चार भाग होते हैं। आज की तारीख में सभी वेदों के न तो उपनिषद उपलब्ध हैं, न संहिता, न ब्राह्मण, न आरण्यक, और न ही स्वर। जिन शिष्यों को वेद पढ़ाए गए, उनकी परंपरा में वेदों को संभालकर नहीं रखा गया। पुराने समय में वेदों को लिखना पाप माना जाता था, जिससे वे श्रौत परंपरा से ही जीवित थे। जब उस परंपरा का निर्वाह करने वाले नहीं रहे, तो वेद ही नष्ट हो गए। अब वेद ही नहीं होंगे, तो वैदिक पुरुषार्थों का पालन कैसे होगा? खंडित वेदों के आधार पर लोग उनका पालन कैसे कर पाएंगे? **व्यवहार में अनुपलब्धता:** शास्त्र की व्यवस्था है कि व्यक्ति को अपने वेद और शाखा के अनुसार ही श्रौत एवं स्मार्त कर्म करने चाहिए, जैसे षोडश संस्कार और अग्निहोत्रादि यज्ञ। आजकल लोग आर्य समाज या गायत्री परिवार की विधि से कर्म करते हैं, जो नियम विरुद्ध है। अपनी वेद शाखा का ज्ञान न होने पर या वेद उपलब्ध न होने पर, या पठन-पाठन की परंपरा न होने पर कोई उन पुरुषार्थों का पालन नहीं कर सकता। इन कठिनाइयों को देखते हुए आचार्यचरण कहते हैं कि अलौकिक पुरुषार्थ वेद में कहे गए हैं और वेद में ही स्थित हैं। व्याख्याकार बताते हैं कि 'वेद में स्थित है' का अर्थ है कि वे केवल किताबों में ही हैं, व्यवहार में उनका अनुष्ठान संभव नहीं है। उस विषय का ज्ञान भी किसी को नहीं है। अतः श्रीमहाप्रभुजी कहते हैं कि उस विषय की चर्चा में अब हम नहीं पड़ते, क्योंकि उसके ज़माने बीत गए।
श्लोक ४ — त्रिवर्ग पुरुषार्थों का स्वरूप एवं प्रभु की कृपा
• पाठ: धर्म शास्त्र नीति काम शास्त्रानी चक्रमा स्त्री वर्ग साधका नय उच्चते
• प्रतिभागी वाचन: मनुस्मृति आदि धर्म निरूपण करने वाले शास्त्र, नीति शास्त्र (अर्थशास्त्र) तथा वात्स्यायन आदि काम शास्त्र क्रमशः धर्म, अर्थ और काम इन त्रिवर्ग के साधक हैं। श्रीमहाप्रभुजी समझा रहे हैं कि जो भक्त धर्म पुरुषार्थ सिद्ध करना चाहे, वह धर्म शास्त्रों को, अर्थ चाहने वाला नीति शास्त्र को, और काम चाहने वाला काम शास्त्र को रेफर कर सकता है। धर्म, अर्थ और काम तीनों त्रिवर्ग पुरुषार्थ कहे गए हैं। शुद्ध भाव वाले अनन्य भक्त को इन पुरुषार्थों को सिद्ध करने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं रहती, प्रभु ही सिद्ध कर देते हैं।
• वक्ता विवेचन: **त्रिवर्ग में साधारण भक्त:** यदि साधारण भक्त को प्रभु त्रिवर्ग सिद्ध कर दें, तो वह इतने में ही अटक जाएगा और आगे प्रभु को भूल जाएगा। भगवान का चित्त उसके चित्त में नहीं लगेगा। यदि अर्थ पुरुषार्थ की इच्छा हो और वह मिल जाए तो भक्त भगवान को भूल जाएगा। इसलिए प्रभु साधारण भक्तों के इन त्रिवर्ग संबंधी श्रम प्रयत्न का नाश करते हैं। **प्रश्न:** 'प्रभु श्रम नाश करते हैं' इसका क्या अर्थ है? **उत्तर:** इसका अर्थ है कि प्रभु उनकी पुरुषार्थ सिद्ध करने की इच्छा का नाश करते हैं। यदि भक्त धर्माचरण में ज़्यादा रुचि प्रकट करता है, तो भगवान उसके धर्माचरण में विघ्न पैदा करते हैं। **प्रभु के विघ्न के उदाहरण:** जैसे इंद्रयाग का भंग भगवान ने करवाया, जब तक प्रभु प्रकट नहीं हुए तब तक कोई समस्या नहीं थी, पर प्रकट होने के बाद प्रभु कहते हैं कि मेरा ही भजन करो। उन्होंने उनके धर्म पुरुषार्थ में टांगे खींची, उनकी रोकवाए। इसी तरह, यशोदाजी की आसक्ति छुड़ाने के लिए सकट व्यंजन कर दिया। नंदरायजी अंबिका वन की यात्रा में गए तो अंबिका पूजा करने पर वरुण के द्वारा उनका अपहरण करवा दिया। प्रभु यह चाहते हैं कि भक्त प्रभु में ही लगा रहे, इसलिए जब भी भक्त भगवान से विमुख हो ऐसी संभावना भगवान को लगती है, तो भक्त के उस बहिर्मुखता करने वाले सभी प्रयत्नों में प्रभु बाधा-विघ्न उपस्थित करते हैं, उनको सफल नहीं होने देते।
श्लोक ५ — मोक्ष के चार शास्त्र (सांख्य और योग)
• पाठ: मुक्त चतवारी शास्त्राण लोक के परता स्वतः दुविधा द्व द्वयस तत्र सां योग प्रकीर्तत्यागा त्याग विभाग सांख्य त्यागा प्रकीर्तता
• प्रतिभागी वाचन: अलौकिक मोक्ष में दो शास्त्र मार्ग उपाय साधन परतः मोक्ष सिद्ध करने वाले हैं और दो शास्त्र स्वतः मोक्ष सिद्ध करने वाले हैं। स्मार्त मोक्ष विषयक चार शास्त्र हैं। जीव के स्वाधीन मोक्ष में त्याग और अत्याग के भेद से सांख्य और योग शास्त्र कहे गए हैं। सांख्य में त्याग करके मोक्ष सिद्ध होता है और योग में त्याग किए बिना भी मोक्ष सिद्ध होता है। सांख्य शास्त्र में नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक होने पर वैराग्य होता है, फिर त्याग करने पर मोक्ष होता है। ऐसे त्याग करके मोक्ष जीव के स्वाधीन है, यह सांख्य शास्त्र बताता है।
• वक्ता विवेचन: **स्वतः और परतः मोक्ष:** मोक्ष में चार स्मार्त शास्त्र हैं। दो शास्त्र परतः (दूसरों की कृपा से) मोक्ष सिद्ध करने वाले हैं और दो शास्त्र स्वतः (जीव के स्वाधीन) मोक्ष सिद्ध करने वाले हैं। सांख्य और योग स्वतः मोक्ष के उपाय हैं, यानी किसी का सहारा या भक्ति के बिना मुक्ति प्राप्त करने के उपाय हैं। **प्रश्न:** स्वतः मोक्ष और परतः मोक्ष क्या हैं? **उत्तर:** स्वतः मोक्ष में सांख्य और योग आते हैं, और परतः मोक्ष में वैष्णव और शैव मत आते हैं, जहाँ विष्णु या शिव के आश्रय से मुक्ति प्राप्त होती है। यह विषय आगे आएगा।
श्लोक ७ — अहमता-ममता नाश से जीव को मुक्ति
• पाठ: अहमता ममता नाश सर्वता निरहंकृत स्वरूपस्तो यदा कृतार्थ सा निगदते
• प्रतिभागी वाचन: सांख्य शास्त्र में त्याग मात्र से मुक्ति कैसे हो सकती है, जब देहादिक संघात विद्यमान है? इस शंका का समाधान करते हुए श्लोक ७ कहता है कि अहमता-ममता का नाश होने पर सर्वथा निरहंकार होने पर जब जीव अपने स्वरूप में स्थित होता है, तब वह कृतार्थ कहलाता है। इसमें स्थूल शरीर तथा लिंग शरीर की अहमता और उनके परिकर जो ग्राहादिक, प्राण, इंद्रिय प्रवृत्ति हैं, उनमें ममता का त्याग होता है। बुद्धि तत्व में रहने वाला 'मैं हूँ', 'यह मेरा है' जैसा अन्यथा ज्ञान या भ्रम मिट जाता है। तब कर्तापन और भोगतापन भी मिट जाता है। जीव अपने ही स्वरूप में प्रकाशमान होता है, साक्षीभूत आत्मा में स्थित होता है। ऐसे जीव को मुक्त कहा जाता है, ऐसा सांख्य आचार्य ने वर्णन किया है।
• वक्ता विवेचन: **मोक्ष के साधन और त्याग:** **प्रश्न:** मोक्ष का साधन क्या होगा? **उत्तर:** मोक्ष के लिए सांख्य और योग में जो नियम बताए गए हैं, वे सब अनुसरने होंगे। **प्रश्न:** क्या वे वर्णाश्रम धर्म के अंतर्गत आएंगे या सन्यास लेना होगा? **उत्तर:** सांख्य में त्याग होता है, अर्थात सन्यास लेना होता है। योग में अत्याग होता है, यानी गृहस्थ में रहकर भी अष्टांग योग साधना से अंतरत्याग किया जा सकता है। **मोक्ष के चार स्मार्त शास्त्र:** स्मार्त मोक्ष विषयक चार शास्त्र हैं। दो शास्त्र स्वतः मोक्ष सिद्ध करने वाले हैं, जिनमें सांख्य शास्त्र और योग शास्त्र हैं। दूसरे दो परतः मोक्ष सिद्ध करने वाले वैष्णव और शैव मत हैं। यह पूरा विषय आगे ग्रन्थ में चलेगा। **सत्र का विराम:** आज का सत्र यहीं विराम लेता है।