विज्ञप्ति का मूल तात्पर्य
• पाठ: (कोई श्लोक नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: (उपलब्ध नहीं)
• वक्ता विवेचन: श्रीहरिराय जी ठाकुरजी को विज्ञप्ति कर रहे हैं। इस विषय को देखा कि मुख्यतया आपका तात्पर्य यह है कि हर प्रकार से अर्थात विविध तर्कों के द्वारा हम भगवान के कृपा पात्र हैं और कृपा प्राप्त करने योग्य हैं। इसी बात को सिद्ध करना श्रीहरिराय जी का यहां मूल तात्पर्य है।
श्लोक १० — प्रभु की श्रम रहितता और दोषों की गणना में श्रम
• पाठ: विज्ञप्ति श्लोक १०
• प्रतिभागी वाचन: हे हरे, आप श्रम रहित हो तो हे प्रभु, मेरे दोषों की गणना में श्रम पावेंगे। तासो हे गोपी जन के ईश, सर्वथा वह दोषों को विसरी जाओ।
• वक्ता विवेचन: **भगवान का सामर्थ्य और जीवों के दोष:** हे नाथ, तुमको किसी बात में हार नहीं। तुमको कभी कोई कार्य में श्रम ना होए। तुम एक क्षण में चाहो सो करो। ऐसे सामर्थ्य युक्त यद्यपि हो, तो भी मेरे दोष की गणना तुम करोगे तो तुमको श्रम ही होगा। मेरे अपार दोष हैं। ताते हे गोपीश। **गोपीजन शब्द का प्रयोजन:** गोपीज शब्द से आप यहां भगवान को उद्बोधित कर रहे हैं। यह संबोधन कहीं यह जताए कि तुम गोपी के ईश हो। बिना साधन गोपीजन पर कृपा करने से हमारे ऊपर कृपा करो। सर्वथा हमारे दोष को विसरी जाओ। श्री गोसाई जी विज्ञप्ति में कहे हैं अपराधेपि गणना नैव कार्या ब्रजादिप सहज ऐश्वर्य भावेन सस्य क्षुद्रतयाच क्षुद्रतयाच।
श्लोक १० का विवेचन जारी — दोषों की क्षुद्रता और कृपा की याचना
• पाठ: (कोई श्लोक नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: हे ब्रज के अधिप, निस्ताधन के फलात्मक हमारे अपराध की गणना करनी तुम्हें उचित नहीं है। कहते हैं जो तुम्हारो सहज ऐश्वर्य है, ता के आगे हमारे दोष शूद्र हैं। तो का सो कहां ताते कृपा करो।
• वक्ता विवेचन: **गोपी शब्द का महत्व और निसाधनता:** गोपी शब्द का आपने जो प्रयोग किया उसका प्रयोजन बताया कि बिना साधन ही गोपीजनों के ऊपर भगवान ने कृपा की। उसी प्रकार से हम भी निसाधन हैं, अर्थात कि कोई प्रकार के साधनों से युक्त नहीं हैं। इसलिए गोसाई जी ने भी जैसे विज्ञप्ति में यह विनती की है कि भगवान को हमारे अपराधों की गणना नहीं करनी चाहिए। **दोषों की क्षुद्रता:** भगवान पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त हैं और हम तो ऐश्वर्य विहीन हैं। हमारे बहुत से दोष हैं और वह सभी दोष भगवान के आगे तो उनकी कोई कीमत नहीं। भगवान के आगे वह सभी दोष की कोई स्टैंडर्ड नहीं है। इसलिए भगवान को उन दोषों के ऊपर ध्यान नहीं देना चाहिए। ऐसी विज्ञप्ति यहां कर रहे हैं।
श्लोक ११ — दीनता और पराधीनता में भी कृपा की योग्यता
• पाठ: विज्ञप्ति श्लोक ११
• प्रतिभागी वाचन: दीन संसार के गुण में लीन अथवा गुण रहित और पराधीन ऐसे जो तुम्हारे भक्त हैं इनके ऊपर सर्वथा कृपा ही करनी योग्य है।
• वक्ता विवेचन: **जीव की दीनता और पराधीनता:** हे नाथ, मैं अत्यंत दीन हूं, दुखी हूं। काहे जो माया के गुण करी संसारा आदिक में लीन हूं और पराधीन हूं। ऐसे दोष करी दीन हूं। तो हूं तुम्हारो हूं ताते मेरे ऊपर सर्वथा ही करुणा करिए। श्री गोसाई जी विज्ञप्ति में कहे हैं। कालक कर्माधीनता यतकर सुंदर तद अनुचित यमारी कृत। हे सुंदर, मोह पे काल कर्म के आधीन बनो जो आप करत हो तो योग्य नहीं है। कहते हैं जो मैं आपको हूं ऐसे अंगीकार कियो है। हे सुंदर श्रीकृष्ण, मैं काल कर्म के आधीन हूं तो भी तुम्हारो हूं। ताते अपनो जानी कृपा करो। **काल और कर्म का प्रभाव:** यहां श्री हरिराय जी यह आज्ञा कर रहे हैं कि बहुत से दोष तो हमारे कंट्रोल के विषय के नहीं हैं। इसलिए बहुत से हमारे दोष ऐसे हैं कि हम नहीं चाहते हैं परंतु काल और कर्म के वश होने के कारण वो दोष हमारे अंदर दिखाई देने लग जाते हैं, वो दोष प्रकट हो जाते हैं। इसलिए यहां यह विज्ञप्ति कर रहे हैं कि भगवान को इस विषय को ध्यान में लेते हुए हमारे दोषों की गणना नहीं करनी चाहिए। भगवान जो हैं वह तो काल और कर्म को भी अपने अधीन रखने वाले हैं, जबकि हम काल और कर्म के प्रति पराधीन हैं। **भगवान का परम सामर्थ्य:** पर फिर भी भगवान जो हैं, वह तो इन सभी से बढ़कर हैं। इसलिए ये विज्ञप्ति यहां कर रहे हैं कि भगवान इनसे परे हैं और इनसे परे होने के कारण भगवान को जो है वो इस विषय में हमारे दोषों की गणना न करते हुए हमें अपने सेवक के रूप में ही जानना चाहिए। अर्थात कि भगवान इस बात का विचार ना करें कि हमारे अन्य गुण दोष क्या हैं।
श्लोक १२ — आचार्य-आश्रित जीवों की कृपा-पात्रता
• पाठ: विज्ञप्ति श्लोक १२
• प्रतिभागी वाचन: निसाधन गयो है धन जिनको ऐसे ता कर मन में दीन, अत्यंत दुखी, अपने श्री आचार्य जी के आश्रित, शोक, लोभ, मोह, भय कर के व्याकुल ऐसे जो हैं सो आपकी कृपा के पात्र हैं। तासो हे बड़े उदार, दया के निधि रूप, इनको करुणा देहो। काहे ते जो पात्र में दियो सो अक्षय होए। मैं निसाधन हूं, मेरे में कोई साधन नहीं है। भाव रूपी धन भी चला गया है, ता कर अति दीन हूं, बहुत दुखी हूं। अपने श्री आचार्य जी के आश्रित हूं और शोक, लोभ, मोह, भय यह माया के गुण करके व्याकुल हो।
• वक्ता विवेचन: **पुष्टि जीव की मनोवस्था:** यहां अपनी मनोवस्था को श्री हरिराय जी प्रकट कर रहे हैं कि हम पुष्टि जीव जो है वो निसाधन है और हमारे अंदर वैसे तो कोई साधन करने की योग्यता नहीं है। परंतु भाव ही हमारे लिए साधन रूप है। परंतु कितनी ही बार वह भगवान के प्रति जो हमारा भाव होता है, वह भी कितनी ही बार विचलित हो जाता है, कितनी ही बार निवृत्त हो जाता है। तो उसके अंदर भी ऐसा विक्षेप जो है वह बना रहता है। उसमें एकरूपता रहती हो ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसा जो विक्षेप है वो निरंतर हमारे चित्त के अंदर बना रहता है। **भाव-रूपी धन का क्षय और व्याकुलता:** इसलिए यद्यपि शारीरिक रूप से तो कोई योग्यता हमारे अंदर नहीं है। परंतु भाव रूपी धन भी जो है वो हमारा चला गया है। जिस वजह से भक्त अति दीन अवस्था में है, दुखी हो गया है और श्रीमहाप्रभुजी के प्रति आश्रित होकर वो शोक, लोभ, मोह, भय ये सब माया के गुण के कारण वो व्याकुल हो रहा है। **कृपा-पात्रता और भगवान की अक्षय कृपा:** ऊपर कहे ऐसे हो तो प्रभु के कृपा पात्र हो। ताते श्रीहरिराय जी कहते हैं जो मैं हूं एसो हूं। तुम्हारे कृपा पात्र हूं, तुम महोदार हो, दया के निधि हो, ताते दया करो। पात्र में दान दियो तो अक्षय होत है तो मैं दया को पात्र हूं ताते दया करो। आचार्य जी इसलिए यह विज्ञप्ति कर रहे हैं कि हमारी जो यह स्थिति है उसके कारण जो कृपण होते हैं अर्थात जो अपना कार्पण्य भगवान के प्रति ज्योतित करते हैं, उन लोगों के ऊपर भगवान विशेष रूप से कृपा युक्त होते हैं। **भगवान की कृपा का स्वरूप:** भगवान जो है वह तो उदार चरित्र वाले हैं, दया युक्त हैं और भगवान जिसके ऊपर दया करते हैं वो कुछ दिनों की, कुछ समय की या कोई प्रकार के जीवों के ऊपर कृपा करते हो, कभी करते हो, कभी ना करते हो, ऐसे भगवान की कृपा के अंदर कोई प्रकार का तारतम्य नहीं आता है, भेद नहीं आता, परिवर्तन नहीं आता है। तो भगवान की जो कृपा है वह सभी जीवों के ऊपर सदा सर्वदा एक समान रूप से बनी रहती है। उसी को यहां आप बता रहे हैं कि भगवान जिसके ऊपर कृपा करते हैं, दया करते हैं, वह तो अक्षय होती है। तो भगवान ने आज कृपा की अब कल नहीं करेंगे या एक जीव के ऊपर की दूसरे के ऊपर नहीं करेंगे या भक्त के ऊपर कभी की कभी नहीं करेंगे। ऐसा तारतम्य भगवान की कृपा के ऊपर, भगवान की कृपा में नहीं आता है। उसके अंदर ऐसी एकरूपता सर्वदा बनी रहती है। वो जो प्रकार की एकरूपता है, उसी एकरूपता को यहां विचार में लेते हुए यह विज्ञप्ति कर रहे हैं कि भगवान जो हैं उन्हें जीव के ऊपर दया युक्त होना चाहिए और ऐसी जो भगवान की दया है वह दया के हम पात्र हैं। इसलिए प्रभु हमारे ऊपर कृपा युक्त हो ऐसी विज्ञप्ति यहां कर रहे हैं।
प्रश्नोत्तर — काल-कर्म की पराधीनता और भगवत्संकल्प
• पाठ: (कोई श्लोक नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: काल तो यद्यपि हमारे बस में नहीं है। अब कर्म है तो वो क्या प्रारब्ध कर्म समझने? क्योंकि अब वो तो जो भी है तो वो तो कर्म की व्यवस्था के अनुसार वो तो भुगतने ही पड़ेंगे। फिर वहां फिर अपन विवेक, धैर्य से और श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञा के अनुसार ना तो प्रार्थना या ना तो लौकिक या अलौकिक ऐसी कोई कामना कर सकते। अलौकिक यद्यपि शरणागति, भक्ति संबंधी और विरह संबंधी दर्शन संबंधी अलग बातें, पर कर्म को जैसे आपने समझाया कि जो कर्म, काल वगैरह, ऐसी बातें हमारे हाथ में नहीं रहती है तो भगवान को इस तरह हमें स्वकीय जान के, भक्त जान के, सेवक जान के कृपा... **प्रश्न:** ठाकुर जी को महाप्रभु जी ने जो वचन दिया, उसमें अयोग्यता होते हुए भी ठाकुरजी अंगीकार करते हैं। तो क्या दीनता और कार्पण्यता से ठाकुरजी को विनती की जा सकती है कि जो महाप्रभु जी ने समझाया वो? **प्रश्न:** ठाकुरजी को कृपा का बाहुल्य और ऐश्वर्य आदि सामर्थ्य इतना अनंत है कि उसमें हमारे दोष, अपराध, पाप आदि रवि किरण की छाया में कणका से भी कई गुना अधिक हैं। तो क्या शरणागति, समर्पण, सेवा भक्ति आदि में आपके गुणगान गाने में बाधक न हो, बस यही विज्ञप्ति कर सके?
• वक्ता विवेचन: **भगवान का कृपा संकल्प:** यहां ये मूलतः बताना चाहते हैं कि जो भक्त है वो जब भगवान के पास जाता है तो भगवान हमारे संप्रदाय के सिद्धांत के हिसाब से ये भगवान यह संकल्प करते हैं कि मैं जीव के अंदर कोई और प्रकार की योग्यता को ध्यान में लिए बिना मैं केवल और केवल उसके ऊपर कृपा युक्त होना चाहता हूं। अब यह भगवान का संकल्प है। **अयोग्यता का विचार नहीं:** इस संकल्प में जब भगवान उस जीव के ऊपर कृपा युक्त होते हैं तो भक्त यहां श्रीहरिराय जी यह मूलतः कन्व करना चाहते हैं कि हमारे अंदर अब भगवान ने क्यों अन्य प्रकार की योग्यताओं का विचार किया। क्यों भगवान ने यह नहीं सोचा कि यह भक्त की और कोई प्रकार की योग्यता तो है नहीं। इसलिए मुझे इसके ऊपर कृपायुक्त होना चाहिए और मैं तो केवल इसे अपना दास जानकर इसके ऊपर कृपा युक्त होता हूं और कोई प्रकार की योग्यता अयोग्यता का विचार मैं नहीं करूंगा। तो सिद्धान्तरहस्य के उसमें तो भगवान यही संकल्प करते हैं। तो अब जब भगवान ने इस प्रकार ऐसा संकल्प कर लिया है भक्त के विषय में तब फिर भगवान को उस बारे में कोई प्रकार से अन्य गुणों को, अन्य योग्यताओं को नहीं सोचना चाहिए। ऐसा यहां तात्पर्य है। **उत्तर:** हां, तो ठाकुरजी को याद दिलाया जा रहा है कि आपने ऐसा संकल्प किया था तो अब हमारे अंदर आपको दोष ढूंढना नहीं चाहिए। **उत्तर:** हां, उसी तात्पर्य से ये बात कही जा रही कि अर्थात मार्ग ही जब निसाधन जीवो के लिए अंडरस्टुड है कि हम योग्यता वाले नहीं है। हां वो उसका ठीक बात है। इसलिए फिर भगवान को उसमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि अब यह जीव के पास क्या है क्या नहीं है वगैरह वगैरह।
प्रश्नोत्तर — गुण-रहितता और संसार में लीनता
• पाठ: (कोई श्लोक नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: प्रणाम राजा। यहां पे ऊपर शुरू में ये जो पाठ भेद शायद लिया है, गुण लीनेशु और गुण हीनेशु, तो ये दोनों से मतलब अलग क्या? संसार के गुण में लीन अथवा गुण रहित, तो गुण रहित कैसे संदर्भ में भक्त के उसमें आएगा? **प्रश्न:** विज्ञप्ति के श्लोक में यह बताया कि 'मोह आप जो काल कर्म के आधीनपनो आप करत हो तो योग्य नाही है', और फिर 'हे सुंदर श्रीकृष्ण, मैं काल कर्म के आधीन हो तो हूं तुम्हारो', तो स्वयं क्यों ऐसे आधीनता मान रहे हैं अंत में? **प्रश्न:** जीव की स्थिति ऐसी संसार में लीन अवस्था है, इसलिए वो अपने आप को इन सब से आधीन मान रहा है। यद्यपि जो प्रभु का संकल्प है पुष्टिप्र मर्यादा के अनुकूल तो वहां पर वो आधीन नहीं होना चाहिए या मूलत वो आधीन नहीं होता है तो वो फिर भी उसकी सांसारिक स्थिति बनी है इसलिए वह शायद एक तरह से कहे तो प्रभु पे वो बात डाल रहे कि आपने ऐसी स्थिति जीव की बननी चाहिए थी, वह संकल्प नहीं था पर बन गई है, इसलिए मैं अपने आप को वैसे आधीन मान रहा हूं ऐसे?
• वक्ता विवेचन: **गुण रहित का अर्थ:** गुण रहित से तात्पर्य ये है कि हमारे अंदर क्या योग्यता भगवान देख सकते हैं। हां पूर्णतः हमारे अंदर भगवान कुछ गिन सके कि हां इसमें यह अच्छा है या ये मेरे योग्य है। ऐसा सोचने के लिए कुछ भी नहीं। **अपेक्षित गुणों का अभाव:** जो भक्त की अपेक्षा को जिन गुणों की है, वैसे कोई भी गुण नहीं है और दूसरी तरफ संसार के गुण में पूर्णतया लीन है। **जीवों की सामान्य स्थिति और श्रीहरिराय जी का स्वभाव:** वैसे हरिराय जी को इन पर्सन तो खैर ऐसी कोई उनमें दोष नहीं है या ना उन्हें ऐसी कोई बातें कहने की आवश्यकता है। पर दो बातें हैं कि एक तो सर्वसामान्य जीवों की दृष्टि से ये बात कही जाती है कि हम सभी जीव इसी प्रकार के हैं। और दूसरा ये है कि हरिराय जी के स्वभाव का भी यह है कि उन्होंने कभी भी अपने अंदर अपनी आत्म प्रशंसा की हो या अपने आप को उत्तम माना हो। ऐसा हरिराय जी की वाणी में कहीं भी प्रकट नहीं होता है। तो उन्हें दीनता सागर ऐसा ही बोला जाता है तो वो हरिराय जी का पर्सनल स्वभाव है। बाकी वो हमारे लिए ये बात कही जाती है कि हम ऐसे हैं। इसलिए भगवान जो है उनके सामने जीव मात्रा की तरफ से यह विज्ञप्ति की जा रही है। **काल-कर्म की अधीनता का वास्तविक अर्थ:** हां अर्थात कि हम में हमारी अधीनता है ही नहीं। हमारे अंदर दोनों अर्थ किए जा सकते हैं इसके। एक तो ये कि हम काल कर्म के प्रति अधीन है ही नहीं। पर हमारे अंदर तो केवल और केवल भगवान के प्रति ही अधीनता है और किसी के प्रति नहीं है। इसलिए एक अर्थ यह है कि जो कुछ भी ऐसी ऐसे गुण हमारे अंदर दिख रहे हैं या अवगुण हमारे अंदर दिख रहे हैं, वो भगवान की ही इच्छा से हमारे अंदर आए हैं। उसमें काल और कर्म का रोल नहीं है। ये एक इसका अर्थ किया जा सकता है। **भगवान की इच्छा सर्वोपरि:** और दूसरा इसका अर्थ ये है कि हम अपनी जो आप बता रहे हो कि हम सांसारिक अवस्था के कारण काल कर्म के प्रति अधीन हैं। परंतु वस्तुतः तो हम भगवान के ही प्रति अधीन हैं और किसी के प्रति नहीं हैं। तो जब हम और किसी के प्रति अधीन नहीं है तब फिर भगवान जो है वो हमें जैसा भी रखना चाहते हैं या जैसा भी हमारे साथ करवाना चाहते हैं वो भगवान करवाने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए काल कर्म के द्वारा भी अगर कुछ होता है तो वस्तुतः भगवत इच्छा से हो रहा है। ऐसा ही उसका तात्पर्य लेंगे।
प्रश्नोत्तर — आचार्य-आश्रित होकर भी माया से व्याकुलता
• पाठ: (कोई श्लोक नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: दंडवत प्रणाम राजा। जो यहां अभी डिस्कशन हुआ ना उसी के पे ये ११व कारिका की लास्ट लाइन है ना श्री आचार्य जी के आश्रित हूं। जब आचार्य जी के आश्रित है तो ये शोक, लोभ, मोह, भय और माया के ज्ञान से व्याकुल क्यों होगा जीव? जब शरणागति ले ली है और शरणागति श्रीमहाप्रभुजी द्वारा अपने प्रभु की भी ली है तो यह भय क्यों आया जी? धनवत प्रणाम। **प्रश्न:** यहां जो विज्ञप्ति गोसाई जी ने की है वह अपने बारे में की है कि गोसाई जी ने खुद ने खुद के बारे में लिखी है वो जरा कंफ्यूजन है वो ग्रंथ है वो पूरा ये कोटेशन जहां यहां सब जगह बताया है ना तो वो जरा स्पष्ट नहीं हुआ मेरे को प्रणाम राजा।
• वक्ता विवेचन: **शरणागति और सांसारिक वृत्तियाँ:** बात यह है कि हमने हम सब भी शरणागत हैं परंतु इन सब चीजों से हमें भी तो भय लगता है। हमारे मन में हमारे चित्त में भय उत्पन्न तो होता ही है। तो शरणागत तो हम हो जाते हैं परंतु हमारी सांसारिक वृत्तियों से हम निवृत्त नहीं होते हैं तो जब हम निवृत्त नहीं होते हैं उस वजह से वह सब कुछ हमारे अंदर बना रहता है। **विप्रयोग की अवस्था में विज्ञप्ति:** हां, गोसाई जी के खैर पुनः यही बात है कि ये तो गोसाई जी को जब अत्यधिक विप्रयोग का अनुभव हो रहा है। उस समय श्रीगोसाईं जी ने यह विज्ञप्ति की है। तो विप्रयोग का ही परिणाम है। परंतु यहां जो यह भाव श्रीगोसाईं जी प्रकट कर रहे हैं वो इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि विप्रयोग की अवस्था में उन्हें भगवान से दूर वो रह नहीं पा रहे। तो एक तो यही कारण है कि भगवान से जो दूरी है वो उनसे सहन नहीं हो रही। **सेवक भाव और क्लेश:** और दूसरा यह है कि भगवान के प्रति हमारे लिए गोसाई जी जो है वह तो भगवान के समान है या साक्षात है। परंतु श्रीगोसाईं जी स्वयं तो जब आचार्यत्व प्रकट है तो कृष्णदास अधिकारी के कारण जब विप्रयोग हुआ है तब उन्होंने तो सेवक भाव से ही अपने आप को देखा है। और सेवा से उनको दूर रहना पड़ रहा है। इसलिए उसका जो क्लेश प्रकट कर रहे हैं आप उसके अंतर्गत ये सब कुछ आपने लिखा है।