सत्र का प्रारम्भ एवं पूर्वावलोकन
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: (कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन: सत्र का प्रारम्भ `भाग ग्रंथ` के अध्ययन से होता है। पूर्व में `श्लोक ७` तक विवेचन हो चुका है। आज `गोविंद जी` का क्रम है। वक्ता ने सत्र के `विषय-वस्तु` को संक्षेप में प्रस्तुत किया, और `प्रतिभागियों` को प्रश्न पूछने के लिए `हाथ` उठाने को कहा। एक `प्रतिभागी` ने `कल्प श्लोक` में वर्णित `स्वरूप` में स्थित होकर `कृतार्थ` होने का अर्थ पूछा, जिस पर `वक्ता` ने स्पष्ट किया कि `जीवात्मा` के ऊपर से `स्थूल` और `सूक्ष्म शरीर` के `आवरण` हट जाना तथा `आत्मा` का `ब्रह्म` के `चिदंश` रूप में रह जाना ही `स्वरूप स्थिति` है, जो `मुक्ति` का `अत्यंत प्राथमिक स्वरूप` है।
श्लोक ८ की उत्थानिका — सांख्य और गौतम मत में मोक्ष
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने शंका व्यक्त की कि `गौतम` मत और `सांख्य` मत में `वेद विरुद्ध` अंश होने पर भी `सांख्य` के `मोक्ष` को शिष्टजन आदर क्यों देते हैं, और `गौतम` मत को क्यों नहीं। उन्होंने `गौतम` मत को `न्याय शास्त्र` से संबंधित बताया, जिसमें `प्रकृति` और `पुरुष` को मूल माना गया।
• वक्ता विवेचन:
**गौतम मत का परिचय:** `वक्ता` ने `गौतम ऋषि` के `न्याय शास्त्र` का परिचय दिया। `गौतम ऋषि` भारतीय `तर्कशास्त्र` के प्रवर्तक हैं, जिनका मत है कि यह `सृष्टि परमाणुओं` के संयोजन से बनी है, जैसा कि आधुनिक `विज्ञान` मानता है। उनके मत में `ईश्वर` ने `परमाणुओं` को मिलाने का कार्य किया है, इसलिए वे `ईश्वर` का स्वीकार करते हैं। `वक्ता` ने बताया कि `गौतम` मत में सृष्टि जिन तत्वों से निर्मित है, उन तत्वों के ज्ञान से `जीवात्मा मुक्त` हो सकता है। `गौतम` मत `शास्त्रों` द्वारा प्रतिपादित `ब्रह्म` में से `सृष्टि` प्रकट होने के मत के `विरुद्ध` है।
**सांख्य मत का परिचय:** `सांख्य` का मत है कि `सृष्टि प्रकृति` और `पुरुष` से उत्पन्न हुई है। `प्रकृति` `जड़भूता` है और `पुरुष` `चेतन` है, परंतु `पुरुष प्रकृति` से बंधा हुआ है और स्वयं को `प्राकृत धर्मों` वाला समझता है। `पुरुष` को जब यह ज्ञान हो जाता है कि `शरीर` आदि सब `प्राकृत जड़` हैं और यह `पुरुष` का सच्चा `स्वरूप` नहीं है, `प्रकृति पुरुष` से अत्यंत भिन्न है, तो वह `प्रकृति` के बंधन से मुक्त हो जाता है।
**मूल शंका का विस्तार:** `वक्ता` ने `उत्थानिका` में व्यक्त `जिज्ञासा` को स्पष्ट किया कि आस्तिकजन `गौतम ऋषि` के `तत्व दर्शन` का `वेद` के साथ `विरोध` होने के कारण आदर नहीं करते, परंतु `सांख्य दर्शन` में `वेद विरुद्ध` अंश होने पर भी उसमें `शिष्टों` का आदर क्यों देखा जाता है, जबकि `गौतम` मत में `मोक्ष` का `निरूपण` इतना आदर प्राप्त नहीं करता। आचार्य `श्रीवल्लभाचार्यजी` इस `आख्यानिका` का उत्तर दे रहे हैं।
श्लोक ८ — पुराणों द्वारा निरूपित मोक्ष प्रक्रिया
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक ८
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने `श्लोक` का पाठ किया: `प्रक्रियाः पुराणेषु निरूपिता ऋषिभिर्बहुधा प्रोक्ताः फलमेकमवाप्यते`। `भावार्थ` बताते हुए कहा कि `अन्यथा रूप` को त्याग कर अपने `स्वरूप` में स्थित होना `मुक्ति` है। ऐसी `मोक्ष` प्रक्रिया का `पुराणों` में भी `निरूपण` हुआ है, और `अनीश्वर सांख्य` को छोड़कर सबका `फल` एक है।
• वक्ता विवेचन:
**पुराणों की भूमिका:** `वक्ता` ने `टीका` के आधार पर बताया कि `पुराण वेद` के अर्थ की वृद्धि करके स्पष्ट निर्णय करते हैं, जिससे `वेद` के `अर्थ` को समझना सरल हो जाता है।
**सांख्य और गौतम मतों का आदर/अनादर:** `वक्ता` ने बताया कि `सांख्य` का `मोक्ष` `पुराणों` के अनुकूल है, इसलिए `शिष्टजन` (सज्जन) उसका आदर करते हैं। `गौतम आदिक` के `मोक्ष` का प्रतिपादन `पुराणों` के अनुकूल नहीं है, इसलिए उसमें `शिष्टों` का आदर नहीं होता है।
**सांख्य में मोक्ष का स्वरूप:** यद्यपि `ऋषियों` ने बहुत प्रकार से `सांख्य` की प्रक्रिया कही है, जिसमें `सांख्य` के `तत्वों` को किसी ने कम और किसी ने ज्यादा माना है, फिर भी `निरीश्वर सांख्य` को छोड़कर अन्य सभी `सांख्य` में `आत्म व्यक्ति` (आत्मा के अतिरिक्त सबका त्याग करना) `अंतरंग साधन` एक समान है। `वक्ता` ने समझाया कि `आत्म व्यक्ति` का अर्थ है `आत्मा` से अतिरिक्त सभी का `त्याग` करना, जो `सांख्य शास्त्र` का `सिद्धांत` है। `पुरुष` (आत्मा) `प्रकृति` (देह) से बंधा हुआ है, और `आत्मा` को छुड़ाने के लिए `देह` से `आसक्ति` के कारणों (जैसे `घर`, `धन`, `परिवार`, `समाज`) का `त्याग` करना `सन्यास` या `त्याग` का प्रथम साधन है।
**निरीश्वर सांख्य का फल:** `वक्ता` ने स्पष्ट किया कि `निरीश्वर सांख्य` (जिसमें `ईश्वर` को `प्रकृति` का मूल कारण नहीं माना गया) का `फल` `नरक प्राप्ति` ही है। `सईश्वर सांख्य` का `मोक्ष फल` एक समान (स्वरूप स्थिति) है।
श्लोक ९ — योग मार्ग और मानसिक त्याग
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक ९
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने `श्लोक` का पाठ किया: `अत्यागमार्गैस्त्यागोपि मनसैव विधीयते, यमास्तु कर्तव्य सिद्धे योग एव न चापरः`। `भावार्थ` में उन्होंने बताया कि `त्याग` न करने वाले के लिए `योग मार्ग` है, जिसमें `त्याग` मानसिक होता है। `यम`, `नियम`, `आसन`, `प्राणायाम`, `प्रत्याहार`, `ध्यान`, `धारणा` और `समाधि` जैसे साधन करने पड़ते हैं, जिससे `आत्मा` के `स्वरूप` में `स्थिति` रूप `मोक्ष` प्राप्त होता है।
• वक्ता विवेचन:
**योग मार्ग का स्वरूप:** `वक्ता` ने `टीका` के आधार पर बताया कि जिसको `त्याग` किए बिना `मोक्ष` का साधन करना हो, उसके लिए `योग मार्ग` है। `योग मार्ग` में चित्तवृत्ति को निरोध करके `आत्मा` का बोध किया जाता है। यह `पुराणों` के अनुकूल है। इसमें `त्याग` मानसिक रूप से होता है, यानी घर पर रहकर ही मन से `त्याग` किया जा सकता है।
**योग के आठ अंग:** `वक्ता` ने `योग` के आठ `साधनों` का संक्षिप्त परिचय दिया:
**यम:** इसमें `अहिंसा` (शारीरिक व मानसिक हिंसा का त्याग), `सत्य` (झूठ न बोलना), `अस्तेय` (चोरी न करना), `ब्रह्मचर्य` (पूर्ण पालन), `अपरिग्रह` (संतोषी जीवन) आते हैं।
**नियम:** इसमें `शौच` (आंतरिक व बाहरी पवित्रता), `संतोष` (प्रभुदत्त में संतोष), `तप` (सेल्फ कंट्रोल, इंद्रियों का नियमन), `स्वाध्याय` (वेद व शास्त्रों का नित्य अध्ययन), `ईश्वर प्रणिधान` (प्राणों को ईश्वर के प्रति संलग्न रखना) आते हैं।
**आसन:** शरीर को स्थिर करना और बैठने का अभ्यास करना।
**प्राणायाम:** सांस को नियंत्रित करना (लेना और छोड़ना)।
**प्रत्याहार:** इंद्रियों का अपने विषयों के प्रति आकर्षण रोकना।
**धारणा:** मन को एक स्थान पर केंद्रित करना।
**ध्यान:** इंद्रियों को लंबे समय तक एक जगह रोककर रखना।
**समाधि:** `धारणा` और `ध्यान` के सिद्ध होने पर `समाधि` मानी जाती है।
**योग के फल पर चर्चा:** `वक्ता` ने बताया कि ये आठ अंग बहुत कठिन हैं। इन कठिन `परिश्रमों` के बाद जो `मोक्ष` प्राप्त होता है, वह `ईश्वर` के द्वारा प्राप्त नहीं होता, बल्कि स्वयं के `साधन` से होता है। इसमें `आत्मा` स्वतंत्र होकर घूमती है, परंतु किसी `ईश्वरीय लोक` में नहीं जाती।
**प्रश्न:** एक `प्रतिभागी` ने पूछा कि `निरीश्वर सांख्य` का फल `नरक प्राप्ति` कहा गया, तो `योग` का फल क्या है, क्योंकि `योग` में `त्याग` मानसिक होता है, जबकि `सांख्य` में `स्वरूप` से।
**उत्तर:** `वक्ता` ने स्पष्ट किया कि `वेद विरोधी सांख्य` का फल `तत्फल` की प्राप्ति नहीं होती, जैसा `श्रीमहाप्रभुजी` ने `सर्व निर्णय निबंध` में कहा है। `बालबोध ग्रंथ` में वर्णित `वेद` से अविरोधी `सांख्य` और `योग` का फल `आत्मा` की `स्वरूप स्थिति` रूप `मोक्ष` है। `निरीश्वर सांख्य` का फल ही `नरक प्राप्ति` है, न कि `सईश्वर सांख्य` या `योग` का। `योग` से `मुक्ति` होती है, `नरक प्राप्ति` नहीं। यदि `योग` भी `वैदिक प्रणाली` या `ईश्वर` से `विरोधी प्रक्रिया` से किया जाए, तो उसका फल भी अनिष्टकारक हो सकता है, परंतु यहाँ उसकी चर्चा नहीं की गई है।
श्लोक १० की उत्थानिका — परतः मोक्ष और ब्रह्मा का कार्य
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने `उत्थानिका` पढ़ी कि `स्वतः जीव` के `स्वाधीन मोक्ष` के बाद `परतः मोक्ष` (पर आश्रय `मोक्ष`) के दो `शास्त्रों` का निर्णय करने के लिए `मोक्ष` के `स्वरूप` का `निरूपण` और `विस्तार` किया जाएगा। इसमें बताया जाएगा कि `ब्रह्मा जी` `मोक्ष` नहीं देते हैं, और इसका प्रमाण भी दिया जाएगा।
• वक्ता विवेचन: `वक्ता` ने `उत्थानिका` को दोहराते हुए बताया कि अब तक `स्वतः मोक्ष` की चर्चा हुई है और अब `परतः मोक्ष` पर विचार होगा। `ब्रह्मा जी` `मोक्ष` क्यों नहीं देते, इसका प्रमाण आगे के `श्लोक` में दिया जाएगा।
श्लोक १० — परतः मोक्ष: शिव और विष्णु द्वारा, ब्रह्मा द्वारा नहीं
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १०
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने `श्लोक` का पाठ किया: `पराश्रयेण मोक्षस्तु द्विधासौ निरूप्यते, ब्रह्मा ब्रह्मविदो यस्मात्तदपि सुशुते, ते सर्वथा नाचार्याः शास्त्रे किंचित् स्मृतम्`। `भावार्थ` में कहा कि `पराश्रय` से `मोक्ष`, `शिव` तथा `विष्णु` के आश्रय से दो प्रकार का निरूपित होता है। `ब्रह्मा जी` `वेदज्ञ` और `परब्रह्मज्ञानी` होते हुए भी, और `ब्राह्मण जाति` के `अभिमान` वाले `देवता` होने के बावजूद, उनकी सेवा से `धर्म`, `अर्थ`, `काम`, `मोक्ष` रूप `अर्थ` प्राप्त नहीं होते। ब्रह्माद `मोक्ष` नहीं देते। शास्त्र ब्रह्मा के विषय में कुछ और ही कहते हैं।
• वक्ता विवेचन:
**परतः मोक्ष का स्वरूप:** `वक्ता` ने `श्लोक` का `भावार्थ` समझाते हुए कहा कि `पराश्रय` करके `मोक्ष` `शिव` और `विष्णु` के आश्रय से दो प्रकार का निरूपित होता है। ये `मोक्ष` `शिव` तथा `विष्णु` के `आराधन भक्ति` से प्राप्त होते हैं, और इन दोनों को बताने वाले `शास्त्र` भी दो प्रकार के हैं।
**त्रिदेवों की समानता और ब्रह्मा का पूजत्व:** `वक्ता` ने बताया कि `सत`, `रज`, `तम` `गुणों` के आधार पर `ब्रह्मा` (`सत`), `विष्णु` (`रज`) और `शिव` (`तम`) इन तीनों `देवताओं` को `पुराणों` में समान रूप से `निरूपित` किया गया है। परंतु `सरस्वती जी` के श्राप के कारण `ब्रह्मा जी` में से `पूजत्व` मिट गया है।
**ब्रह्मा द्वारा मोक्ष का अभाव:** `ब्रह्मा जी` `वेदज्ञ` और `परब्रह्मज्ञानी` हैं, तथा `ब्रह्मत्व` के `रजोगुणी अभिमान` के कारण उनका `अर्चन` वंदन ब्राह्मण के `स्वरूप` से हो गया है। `वक्ता` ने समझाया कि `मोक्ष` के लिए `ब्रह्मा जी` का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि उनका `कार्य सृष्टि` करना है, और `मोक्ष` (जीव का दोबारा संसार में न आना) तो `सृष्टि कार्य` से `विरुद्ध` है।
**ब्रह्मा से प्राप्त होने वाले फल:** `वक्ता` ने बताया कि `धर्म`, `अर्थ`, `काम`, `मोक्ष` रूप सब `अर्थ` `ब्रह्मा जी` से प्राप्त नहीं होते, केवल `अर्थ` और `काम` (भोग) ही प्राप्त हो सकते हैं। `ब्रह्मा जी` का `यजन` `पूजन` करने वाले सभी प्रकार के `अर्थ` वाले नहीं होते, बल्कि उन्हें बहुत कम `अर्थ` मिलते हैं। `शास्त्रों` में `ब्रह्मा जी` द्वारा `मोक्ष` का वर्णन अल्प मात्रा में है, जबकि `धर्म`, `अर्थ`, `काम` का विस्तार से वर्णन है। इससे सिद्ध होता है कि उनकी रुचि `मोक्ष` प्रदान करने में नहीं है।
श्लोक ११ की उत्थानिका — शिव और विष्णु का स्वरूप
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने बताया कि `श्लोक १०` में `ब्रह्मा जी` को `मोक्ष प्रदाता` नहीं माना गया, और `शिव` तथा `विष्णु` को `मोक्ष` प्रदान करने वाला बताया गया। अतः `श्लोक ११` में `श्रीमहाप्रभुजी` `शिव` और `विष्णु` के `स्वरूप` को समझा रहे हैं।
• वक्ता विवेचन: `वक्ता` ने `प्रतिभागी` द्वारा प्रस्तुत `उत्थानिका` को स्वीकार करते हुए `श्लोक ११` के `प्रयोजन` को स्पष्ट किया, जिसमें `शिव` और `विष्णु` के `स्वरूप` का विवेचन किया जाएगा, क्योंकि उन्हें `मोक्ष` प्रदान करने वाला माना गया है।
श्लोक ११ — शिव और विष्णु जगत के हितकारक
• पाठ: षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक ११
• प्रतिभागी वाचन: `प्रतिभागी` ने `श्लोक` का पाठ किया: `अतः शिवश्च विष्णुश्च जगतो हितकारकौ, वस्तुस्थिति संहारकार्यौ शास्त्रप्रवर्तकौ`। `भावार्थ` में कहा कि `ब्रह्मा जी` से `मोक्ष` नहीं मिलता, इसलिए `शिव` और `विष्णु` `जगत` का हित करने वाले हैं। `विष्णु` `वस्तु` का पालन करते हैं, और `शिव` `वस्तु` का `संहार` करते हैं। ये दोनों `चतुर्वर्ग` (`धर्म`, `अर्थ`, `काम`, `मोक्ष`) विषयक `शास्त्रों` के प्रवर्तक हैं।
• वक्ता विवेचन:
**शिव और विष्णु की भूमिका:** `वक्ता` ने समझाया कि `ब्रह्मा जी` से `मोक्ष` प्राप्त नहीं हो सकता, परंतु `शिव` और `विष्णु` `जगत` का `हित` करने वाले हैं। `विष्णु भगवान` `जगत` के `पालनहार` हैं और `शिव` `जगत` का `संहार` करने वाले हैं। ये दोनों उनके कर्तव्य हैं।
**चतुर्वर्गों के प्रवर्तक:** `वक्ता` ने बताया कि `धर्म`, `अर्थ`, `काम`, `मोक्ष` इन `चतुर्वर्गों` से संबंधित `शास्त्रों` के प्रवर्तक `शिव` और `विष्णु` दोनों ही हैं। `जीव` के `अधिकार` के अनुसार उसकी उस मार्ग या उस `शास्त्र` में प्रवृत्ति होती है।
**अनकही बात - भगवान की उदासीनता:** `वक्ता` ने `श्रीमद्भगवद्गीता` का `श्लोक` (`यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्`) उद्धृत किया, जिसका अर्थ है कि `जो जिस भी देव या देवी` का `भक्त` है और `श्रद्धापूर्वक` अपने `इष्ट देव देवियों` का `अर्चन` करना चाहता है, `भगवान` उसकी `श्रद्धा` को उसके `इष्ट देवी देवता` में अविचल बनाते हैं। `भगवान` को कोई समस्या नहीं है कि व्यक्ति किसको भजे, वे उसकी `श्रद्धा` को `दृढ़` करते हैं।
**देवताओं द्वारा फल प्रदान करने की सामर्थ्य:** `वक्ता` ने `श्रीमद्भगवद्गीता` के अगले `श्लोक` (`स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्` - ७/२२) का उल्लेख करते हुए बताया कि `भगवान` ने ही `देवी देवताओं` को `फल` प्रदान करने की `सामर्थ्य` दे रखी है। `निष्काम ब्रह्म बुद्धि` से `भजन` करने वाले को `उत्तम फल` (जैसे `सालोक्य`, `सारूप्य`, `सामीप्य`, `सायुज्य` आदि `मुक्ति`) तथा `क्षुद्र लौकिक` या `पारलौकिक कामना` से `भजन` करने वाले को तदनुसार `फल` प्राप्त होते हैं।
**बालबोध में मोक्ष के सीमित प्रकारों का कारण:** `वक्ता` ने समझाया कि `मुक्ति फल` कई तरह से प्राप्त होते हैं, परंतु `बालबोध ग्रंथ` में सभी `उपायों` का वर्णन न करके केवल चार प्रकारों का वर्णन किया गया है। इसका कारण यह है कि अन्य `मुक्तियाँ` इनकी तुलना में `उतरती कक्षा` की हैं, यानी केवल कहने भर के लिए `मुक्ति` हैं। इसलिए `श्रीमहाप्रभुजी` ने `मुक्ति` के मुख्य प्रकारों पर ही बात की है।
**त्रिदेवों की श्रेष्ठता:** `ब्रह्मा`, `विष्णु` और `शिव` `ईश्वर कोटि` के `देव` हैं। `नारायण` स्वयं `सत`, `रज`, `तम` `गुणों` का नियमन करने के लिए `ब्रह्मा`, `विष्णु` और `शिव` के रूप में प्रकट होते हैं। `द्वितीय स्कंध` में `नारायण` से `ब्रह्मा` का `प्राकट्य` और फिर `ब्रह्मा` से `शिव` का `प्राकट्य` बताया गया है। `नारायण` स्वयं `विष्णु` ही हैं। `नारायण` या `विष्णु पिता` हैं, `ब्रह्मा पुत्र` हैं और `रुद्र` (शिव) उनके `पोते` हैं। ये सभी एक ही रूप माने गए हैं, केवल `कार्य` का विभाजन है। इन त्रिदेवों द्वारा प्राप्त `मोक्ष` उत्कृष्ट कक्षा का है। अन्य `देवता` (`देवा नारायणांगजा`) इन त्रिदेवों की `अवर कक्षा` के हैं, इसलिए उनसे प्राप्त `मुक्ति` भी उत्कृष्ट नहीं है।
**ब्रह्मा द्वारा मोक्ष प्रदान न करने का कारण:** `ब्रह्मा` `सृष्टि कार्य` करते हैं, और `मुक्ति` `सृष्टि` के विरुद्ध क्रिया है। जो बनाता है, वह बिगाड़े कैसे? `ब्रह्मा` ने ऐसा चरित्र प्रकट किया कि `मोक्ष` की चाहना रखने वाले उनका `उपासन` न करें। `ब्रह्मा` `मोक्ष` दे नहीं सकते, ऐसा नहीं है, बल्कि `सामर्थ्य` तो है परंतु उन्होंने अपने `सामर्थ्य` का संकोच किया है क्योंकि उनके हाथ में `सृष्टि` का कार्य है। अतः `मोक्ष प्रदाता देव` के रूप में `विष्णु` और `शिव` ही प्रसिद्ध हैं।
सारांश एवं समापन
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: (कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन: `वक्ता` ने सत्र का समापन करते हुए `पुनरावृत्ति` की कि `शिव` और `विष्णु` `जगत` के `हितकारक` कहे गए हैं। वे `वस्तु` की `स्थिति` और `संहार` करते हैं, तथा `शैव` और `वैष्णव शास्त्रों` का प्रवर्तन भी इन्होंने करवाया है। `वक्ता` ने समय समाप्त होने के कारण सत्र को यहीं `विराम` देने की घोषणा की।