मंगलाचरण
पाठ
मंगलाचरण
वक्ता विवेचन
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है।
सत्र का उपक्रम
वक्ता विवेचन
पूर्व में बालबोध के माध्यम से सांख्य और योग, जो स्वतः मोक्ष की प्रक्रिया सिद्ध कराने वाले हैं, उनका वर्णन किया गया। उसके पश्चात् परतः मोक्ष में जो पराश्रय या ईश्वराधीन मोक्ष की प्रक्रिया है, उसका निरूपण हुआ। इसमें बताया गया कि शिव, ब्रह्मा और विष्णु तीनों देवों में ब्रह्मा जी मोक्षप्रदायक नहीं हैं क्योंकि वे जगत के पालनकर्ता और रचयिता हैं, और मोक्ष उसका विपरीत धर्म है। मूलतः शिव और विष्णु ही जगत का हित करने वाले हैं, और दोनों में सामर्थ्यता है।
उत्थानिका — श्लोक १२ का सन्दर्भ
वक्ता विवेचन
वक्ता ने आज की उत्थानिका करने का क्रम रखा और उपस्थित प्रतिभागियों से वाचन के लिए आग्रह किया। चर्चा हुई कि श्लोक १२ और १३ का वाचन किस प्रतिभागी द्वारा किया जाएगा। अन्ततः वर्तमान वक्ता ने ही वाचन और विवेचन का क्रम जारी रखने का निर्णय लिया।
श्लोक १२ की उत्थानिका
पाठ
श्लोक १२ उत्थानिका
प्रतिभागी वाचन
उत्थानिका में कहा गया है कि शिव के शास्त्र में शिव को सर्वात्मक कहा गया है और विष्णु के शास्त्र में विष्णु को सर्वात्मक कहा गया है। ऐसे में विष्णु का सृष्टि पालन रूप एक कार्य है और शिव जी का सृष्टि संहार रूप एक कार्य है, तो यह कैसे संभव है, ऐसी शंका होती है।
वक्ता विवेचन
शिव तंत्र में शिव जी को सर्वात्म देव कहा गया है, जो सब सिद्ध कर सकते हैं। इसी प्रकार पंचराष्ट्रादिक विष्णु शास्त्र में विष्णु जी को सर्वात्मक पना कहा है कि सर्व समर्थता विष्णु जी में है। जब दोनों में ही सर्वात्मकता है तो फिर ये भिन्न-भिन्न कार्य किस प्रकार से संभव हैं, ऐसी शंका होने पर महाप्रभुजी उसका समाधान कर रहे हैं।
श्लोक १२ — ब्रह्म का सर्वात्मक पना
पाठ
श्लोक १२
प्रतिभागी वाचन
श्लोक १२ का भावार्थ है कि ब्रह्म ही विष्णु और शिव रूप हो गए हैं, इसलिए शास्त्र में उन दोनों को सर्व जगत का मूल कारण कहा है। अपने-अपने शास्त्र में उन दोनों को दोष रहित पना और सर्व गुण संपन्न पना कहा है। अर्थात गुणवतार विष्णु और शिव को जो उनके शास्त्र में सर्वात्मक पना आदि परब्रह्म के गुण बताए हैं, वे सब गुण परब्रह्म के ही हैं, उनके नहीं।
वक्ता विवेचन
- परब्रह्म का स्वरूप: ब्रह्म ही शिव और विष्णु रूप में अलग-अलग स्वरूप होकर सृष्टि संचालन के निमित्त स्वरूप धारण किए हैं। अलग-अलग शास्त्रों में जो सर्वात्मक पना बताया गया है, वह मूलतः ब्रह्म का है, ना कि उनके इन दोनों देव स्वरूपों का। वह वास्तव में परब्रह्म स्वरूप की सर्वात्मकता है। अथर्वशिर, श्वेताश्वर प्रवृत्ति उपनिषद में शिव रूप सु ब्रह्म का प्रतिपादन है और महानारायणोपनिषद, नारायणोपनिषद प्रवृत्ति उपनिषद में विष्णु रूप सु ब्रह्म का प्रतिपादन है। इन्हीं की अविरुद्धता से पाशुपथ तथा पंचराष्ट्रादिक में सर्वात्मक पनेसु दो का निरूपण है। यह मूलतः ब्रह्म का सर्वात्मक पना है।
- गुणवतारों का निरूपण: शिव के पांचों पादादिक शास्त्र में शिव जी को निर्दोष पूर्ण गुण कहा गया है, और विष्णु के पंचरात्रादिक शास्त्र में विष्णु को निर्दोष पूर्ण गुण कहा गया है। यह निरूपण शिव रूप और विष्णु रूप से परब्रह्म का ही निरूपण है, गुणावतारण के अभिप्राय का नहीं है।
- महाभारत का सन्दर्भ: महाभारत के मोक्ष धर्म पर्व में कहा गया है कि सांख्य, योग, पंचरात्र, वेद और पाशुपथ – इन पांचों की निष्ठा अंत में नारायण प्रभु में है। जो अज्ञानी इस अभिप्राय को नहीं जानते, वे जिस देवता का प्रतिपादन है, उसी को अंत में निष्ठा रूप मानते हैं।
- अज्ञान का फल: यदि जीव केवल गुणवतार स्वरूप में अवलंबित होता है, तो उसे केवल उस देव की साजदिक मुक्ति का फल मिल सकता है, लेकिन भगवान के आनंद, भजनानंद, स्वरूपानंद का अनुभव नहीं हो पाता है। इस प्रकार से महाप्रभुजी ने यहां जीव विचारित लौकिक मोक्ष का निरूपण किया है।
प्रश्नोत्तर — निर्दोष पूर्ण गुण का तात्पर्य
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने 'निर्दोष पूर्ण गुण' शब्द का अर्थ पूछा।
वक्ता विवेचन
- निर्दोष पूर्ण गुण का अर्थ: निर्दोष का अर्थ है 'दोष रहितता' और पूर्ण गुण का अर्थ है 'जिसमें सभी प्रकार की सामर्थ्यता, सभी प्रकार के गुण विद्यमान हों'। ऐसा स्वरूप जो दोष रहित भी हो और सभी गुणों से संपन्न भी हो, वही निर्दोष पूर्ण गुण रूप है।
- सर्वोत्तम स्तोत्र का सन्दर्भ: श्रीगुसाईंजी सर्वोत्तम स्तोत्र में भगवान के विषय में कहते हैं कि वे प्राकृत धर्मों का आश्रय नहीं हैं और अप्राकृत सभी गुणधर्म जिनमें हैं, ऐसे निगम यानी वेद के द्वारा जिनका प्रतिपादन किया गया है, ऐसे साकार परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ। ब्रह्म तत्व का निरूपण शास्त्र में 'निर्दोषम ही समम ब्रह्मा' – वह निर्दोष है और सम है, इस तरह से किया गया है।
- शंका का समाधान: पराश्रय मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वर कोटि के देवों – ब्रह्मा, विष्णु और शिव – का आश्रय करना चाहिए। ब्रह्मा तो सृष्टि निर्माण का कार्य करते हैं, मोक्ष नहीं देते। बचे शिव और विष्णु। उनके शास्त्रों में उन्हें पूर्ण गुण वाला, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्व फलदाता, सृष्टि का कर्ता, सभी देवों का नियामक कहा गया है। प्रश्न यह है कि ऐसे क्यों कहा जा रहा है कि शिव और विष्णु ही जगत के हितकारी हैं और स्थिति और संहार करते हैं, जबकि उनके शास्त्र उन्हें सभी कार्य करने वाला और सभी फल देने वाला कहते हैं? इसका उत्तर यह है कि ब्रह्म ही इन रूपों को धारण करता है – ब्रह्म ही शिव, विष्णु, ब्रह्मा बनता है। इसलिए जब पुराण विष्णु को ऐसा कहते हैं, वे विष्णु रूप को नहीं देखते, बल्कि विष्णु रूप धारण करने वाले उस ब्रह्म को देखते हैं। वे ब्रह्म रूप की स्तुति कर रहे हैं। इसी तरह शिवपुराण जब शिव को ब्रह्म के रूप में वर्णित करता है, तब वह शिव रूप धारण करने वाले ब्रह्म के लिए यह बात कह रहा है। ब्रह्म की योग्यता को देखकर शास्त्रों में ये बातें कही गई हैं। वक्ता ने उदाहरण दिया कि जैसे एक गणित का शिक्षक अनुपस्थिति में अंग्रेजी या हिंदी भी पढ़ा सकता है, पर वह उस समय उसी विषय का कार्य करता है जो उसे दिया गया है। इसी तरह इन देवों ने कार्य का विभाजन किया है।
प्रश्नोत्तर — सर्वात्मक और गुणावतार
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने सर्वात्मक पना को निर्दोष पूर्ण गुण के समान समझने की जिज्ञासा व्यक्त की।
वक्ता विवेचन
- सर्वात्मक का अर्थ: सर्वात्मक का अर्थ है 'सर्व रूप', अर्थात 'शिव ही सब कुछ हैं', 'विष्णु ही सब कुछ हैं'। विष्णु पुराण कहता है कि सब कुछ विष्णु ही हैं, जड़, जीव सब कुछ विष्णु ही हैं, उत्पत्ति, स्थिति, लयकर्ता भी विष्णु ही हैं। शिव पुराण कहता है कि जड़, जीव सब कुछ शिव ही बने हैं, उत्पत्ति, स्थिति, लय के कर्ता शिव ही हैं। इसी को सर्वात्मक कहते हैं।
- गुणावतार का अर्थ: गुणावतार का मतलब है इन तीन गुणों का नियमन करने वाला। उत्पत्ति रजोगुण का कार्य है, स्थिति सतोगुण का कार्य है, और लय या संहार तमोगुण का कार्य है। इन गुणों के कार्यों को इन तीन देवताओं में बांटा गया है: ब्रह्मा सृष्टि कार्य करेगा तो वह रजोगुण का नियामक बनेगा, विष्णु स्थिति और पालन करेगा तो वह सतोगुण का नियमक होगा, और महादेव संहार का कार्य करेंगे, वह तमोगुण का नियमन करेंगे। इनको गुणावतार कहा जाता है।
श्लोक १३ की उत्थानिका
पाठ
श्लोक १३ उत्थानिका
वक्ता विवेचन
वक्ता ने पुनः क्रम शुरू करते हुए कहा कि श्लोक १२ में बताया गया कि शिव और विष्णु दोनों ही अपने-अपने शास्त्र में निर्दोष पूर्ण गुण हैं, लेकिन मूलतः यह परब्रह्म का स्वरूप है। जब शिव और विष्णु दोनों ही परब्रह्म स्वरूप से या परब्रह्म के गुणावतार होने से सर्व सामर्थ्यवान हैं, तो पुनः एक शंका उत्पन्न हो रही है: शिव तथा विष्णु के भजन का फल एक है या भिन्न-भिन्न है? जब दोनों में दोनों प्रकार के सामर्थ्य हैं, तो फिर शिव और विष्णु के भजन करने वाले भक्तों को फल अलग-अलग मिलेगा या एक ही प्रकार का मिलेगा? इस जिज्ञासा का समाधान महाप्रभुजी आगे कर रहे हैं।
श्लोक १३ — भोग और मोक्ष के फल में देवों की भिन्नता
पाठ
श्लोक १३
प्रतिभागी वाचन
श्लोक १३ का भावार्थ है कि भोग तथा मोक्ष देने में यद्यपि दोनों (शिव और विष्णु) समर्थ हैं, तथापि शिव के भजन से भोग और विष्णु के भजन से मोक्ष मिलते हैं, ऐसा विशेष निश्चय है।
वक्ता विवेचन
वक्ता ने शिक्षक के उदाहरण को दोहराया कि गणित का शिक्षक अंग्रेजी भी पढ़ा सकता है, पर वह मूलतः गणित का शिक्षक है। इसी प्रकार शिव और विष्णु दोनों ही भोग और मोक्ष दोनों देने में समर्थ हैं, लेकिन स्वभावतः शिव जी के भजन से भोग मिलता है और विष्णु के भजन से मोक्ष मिलता है। यह विशेष निश्चय है।
- श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध का सन्दर्भ: श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध के ८८वें अध्याय का सन्दर्भ दिया गया है। महाराज परीक्षित ने श्रीसुखदेव जी से प्रश्न किया कि शिव जी और विष्णु जी स्वरूप से एकत्वता रखते हैं, किंतु गुणों में तारतम्यता है। शिव जी लक्ष्मी रहित होकर भी समस्त भोगों को देने वाले हैं, और विष्णु जी लक्ष्मी पति होकर भी भोग नहीं देते। इस पर सुखदेव जी ने निरूपण किया है।
- शिव जी का स्वरूप: शिव जी शक्ति युक्त हैं और गुणों से आवृत्त हैं। वे घोर शक्ति को अपने साथ साधे रखते हैं और अनेक प्रकार के गुण धारण करते हैं, जैसे कालकूट विष, सर्प, अग्नि, चंद्रमा। वे वस्त्रहीन हैं और बड़े-बड़े केश धारण करते हैं। इन सब को धारण करने से वे सृष्टि का नियमन करते हैं। सात्विक, राजस, तामस तीनों गुणों को अहंकार के साथ सममिश्रण करके १६ प्रकार के विकारों को भी धारण करके १६ विभूति रूप बने हैं। जो जिस देव विभूति की आराधना करता है, वह उस प्रकार की देव विभूति हो जाता है। शिव जी अनेक गुणों को धारण करने वाले, इसलिए सगुण हैं। उनके भजन से गुणों के विभूतिन का भोग मिलता है।
- विष्णु जी का स्वरूप: विष्णु गुणातीत होकर, माया से परे होकर सभी आनंद को भोग रहे हैं, और प्रकृति स्त्री स्वरूपा होकर उनके अधीन है। वे प्रकृति और माया से परे हैं।
- फल का भेद: शिव जी सगुण हैं, इसलिए उन्हें भजने वाले भक्तों को शिव जी सभी प्रकार के भोग का दान करते हैं। लेकिन जो विष्णु को भजते हैं, क्योंकि विष्णु स्वयं गुणातीत हैं और माया से परे अवस्था में हैं, तो उनको भजने वाले भक्त स्वयं भी निर्गुण हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष जैसी स्थिति प्रदान करते हैं।
- विपरीत धर्मता का कारण: कहीं-कहीं पुराण या श्रुति में विपरीत धर्मता आ जाती है कि शिव जी ने मोक्ष दिया है और विष्णु जी ने भोग दिया है। यह केवल उनकी सामर्थ्यता बताने के लिए है कि वे देने में सक्षम हैं, किंतु स्वाभाविक रूप से ऐसा नहीं है कि वे सभी को देते हैं, हां विशेष स्थिति में यह देते हैं।
सत्र का समापन
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बताया कि आज का समय पूर्ण हुआ और अगला क्रम सुबोधिनी जी का है, जो थोड़ी देर से शुरू होगा। आज के सत्र को यहीं विराम दिया गया।