सत्र का आरम्भ एवं श्लोक १३ का संक्षिप्त विवरण
पाठ
(कोई विशेष श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
सत्र की शुरुआत में महाप्रभुजी द्वारा विरचित षोडशग्रन्थ के दूसरे ग्रन्थ बालबोध का उल्लेख किया गया। बताया गया कि बाल बोध में १३ श्लोक हो चुके हैं और १३वें श्लोक में यह अध्ययन किया जा चुका है कि शिव तथा विष्णु के भजन का फल एक है या भिन्न-भिन्न। १३वें श्लोक का भावार्थ बताया गया कि भोग तथा मोक्ष देने में यदि दोनों ही समर्थ हैं, तथापि शिवजी के भजन से भोग और विष्णु के भजन से मोक्ष मिलता है, ऐसा विशेष निश्चय किया है।
वक्ता विवेचन
- सत्र का परिचय: यह महाप्रभुजी द्वारा विरचित १६ ग्रन्थों का दूसरा ग्रन्थ बालबोध है, जिसके १३ श्लोक पूर्ण हो चुके हैं। पुष्टि विधानम में पेज संख्या १९३ पर १३वां श्लोक चल रहा है, जिसका अध्ययन कल हो चुका था।
- श्लोक १३ का भावार्थ: शिवजी के भजन से भोग तथा विष्णु के भजन से मोक्ष मिलता है, ऐसा निश्चय किया गया है। यह लौकिक युक्ति है जो बालकन को भी समझ में आवे ऐसी है।
श्लोक १४ — प्रिय वस्तु का त्याग और देवताओं का भोग्य
पाठ
बालबोध श्लोक १४
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने १४वें श्लोक का वाचन किया: ‘लोकेप यत प्रभु भक्त तन यति कहिते’। भावार्थ में बताया गया कि लोक में जो वस्तु स्वामी स्वयं भोगते हैं, वह वस्तु किसी को नहीं देते। टीका में कहा गया कि शिवजी वैराग्ययुक्त रहकर मोक्ष को भोगते हैं, इसलिए वे मोक्ष किसी को नहीं देते, बल्कि भोग देते हैं। विष्णुजी सर्वदा लक्ष्मीजी के संग भोग भोगते हैं, इसलिए वे भोग नहीं देते, बल्कि मोक्ष देते हैं। यह लौकिक युक्ति है।
वक्ता विवेचन
- श्लोक १४ का संदर्भ: १४वें श्लोक में बताया जा रहा है कि शिवजी भोग देने वाले हैं और विष्णु मोक्ष देने वाले हैं, यह बालकन को समझ में आवे ऐसी युक्ति समझाई जा रही है।
- लौकिक रीति: संसार की रीति है कि कोई भी स्वामी या मालिक अपनी सबसे प्रिय वस्तु किसी को नहीं देता, चाहे वह उसका कितना ही प्रिय व्यक्ति क्यों न हो।
- शिवजी और विष्णुजी का प्रिय: शिवजी को वैराग्य प्रिय है, इसलिए वे मोक्ष स्वयं भोगते हैं और अपने प्रिय भक्तों को भोग देते हैं। विष्णुजी लक्ष्मीजी के संग भोग भोगते हैं, इसलिए वे भोग किसी को नहीं देते, बल्कि मोक्ष देते हैं। यह लौकिक युक्ति है।
- वास्तविक अभिप्राय: जो शिवजी घोर शक्ति सहित फिरते हैं, उनके उपासक तामस होते हैं, इसलिए शिवजी उन्हें मोक्ष नहीं देते। जो भगवत्भक्त निर्गुण होते हैं, उनको लौकिक समृद्धि देने से उनका पतन हो सकता है, इसलिए भगवान उन्हें भोग नहीं देते, बल्कि मोक्ष देते हैं।
- सुदामा का उदाहरण: जिनको समृद्धि का मद नहीं होता, उनको भोग भी देते हैं, जैसे सुदामाजी को दिया। जो अति अनन्य और ज्यादा प्रिय भक्त होता है, उसे भगवान मोक्ष देते हैं, भोग नहीं।
- ग्रन्थ अध्ययन का अनुशासन: जब तक जो ग्रन्थ चलता हो, उसका पाठ और अर्थ का चिंतन करते रहना चाहिए, जिससे आगे-पीछे के विषय का अनुसंधान बना रहे। प्रस्तुति करने वाले को अपने श्लोक से आगे के भी एक-दो श्लोकों को तैयार करना चाहिए ताकि कोई अनुपस्थित हो तो श्लोक अधूरा न छूटे।
- वैष्णव की इच्छा: वैष्णव को मोक्ष की इच्छा नहीं होती, इसलिए वे विष्णु का भजन नहीं करेंगे यदि केवल मोक्ष ही फल हो। यदि भगवत्सेवा में भोग सिद्ध हो ऐसी समृद्धि की इच्छा हो तो वे शिवजी का भजन करेंगे, ऐसी शंका होती है। इस पर कहा गया कि प्रभु श्रीकृष्ण अपने भक्त संबंधी जिस वस्तु को अंगीकार करते हैं, वह वस्तु कोई शिवजी नहीं दे सकते।
- भगवान की भक्ति कल्पवृक्ष समान: भगवान भक्त काम पूरक हैं और उनकी भक्ति कल्पवृक्ष सदृश्य है, जो सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। यदि शिवजी भगवत्सेवा में समर्पित की वस्तु भगवत्सेवकों को प्रदान करें तो भगवान और भगवत्भक्ति को कल्पतरुत्व खंडित हो जाएगा।
- अलौकिक पना: प्रभु की भक्ति से जो अलौकिक पना प्राप्त होता है, उसे प्रभु ही अंगीकार करते हैं। ऐसी अलौकिक वस्तु शिवजी नहीं दे सकते, वह तो सिर्फ प्रभु ही देते हैं।
- प्रश्न: बिड़िया शब्द का क्या अर्थ है?
- उत्तर: वक्ता ने भावेश को बिड़िया शब्द का अर्थ स्पष्ट करने को कहा, पर स्पष्टीकरण नहीं हुआ।
- प्रश्न: शिवजी वैराग्ययुक्त रहते हैं, इसलिए भोग देते हैं; विष्णु भोग की स्थिति में रहते हैं, इसलिए मोक्ष देते हैं। उनकी वैराग्य और भोग की स्थिति कैसी है?
- उत्तर: शिवजी तपस्या में लीन रहते हैं, इसलिए मोक्ष को स्वयं भोगते हैं। विष्णुजी लक्ष्मीजी के संग भोग भोगते हैं, इसलिए वे भोग स्वयं भोगते हैं।
- आचार्यजी का दृष्टांत: महाप्रभुजी स्वभाव से रहःप्रिय थे। जीवोद्धार के लिए उन्होंने भारत के सभी वैष्णव तीर्थों में परिभ्रमण किया, पर स्वभाव से रहःप्रिय होने के कारण अडेल में एकांत स्थान में स्थिर वास किया।
- महादेवजी का दृष्टांत: महादेवजी भगवत्ध्यान में लीन रहना चाहते हैं। यदि वे अपने भक्तों को मोक्ष देने लग जाएं तो उनका कैलाश भीड़भाड़ वाला हो जाएगा। इसलिए वे अपने भक्तों को भोग प्रदान करके अपने से दूर रखते हैं, जिससे उनकी भगवत्आराधना में विक्षेप न हो। जिसको जो प्रिय है, वह किसी को नहीं देता।
- विष्णुजी का दृष्टांत: विष्णुजी भोग की साक्षात आदिवी शक्ति लक्ष्मीजी के साथ रहते हैं। लक्ष्मीजी अनन्य विष्णु परायणा हैं। लक्ष्मी किसी और के पास जाए यह विष्णुजी को प्रिय नहीं है, इसलिए मोक्ष देकर विष्णुजी छुट्टी ले लेते हैं, किसी को भोग प्रदान नहीं करते।
- श्रीगुसाईंजी का दृष्टांत: श्रीगुसाईंजी ने ब्रजयात्रा एकांत में की, बिना किसी को बताए, ताकि रसास्वादन में रसाभास न हो। जो लोग खुद आस्वादन नहीं करना चाहते, वे लोगों की भीड़ इकट्ठा करना पसंद करते हैं।
- प्रश्न: भगवत्भक्त यदि भगवत्सेवा हेतु भोग की इच्छा के लिए शिवजी की उपासना करें तो शिवजी उन्हें भोग क्यों नहीं देंगे? यह अन्याय या बहिर्मुखता नहीं है क्या? और शिवजी जानते हैं कि यह कृष्ण का भक्त है, तो क्यों नहीं देंगे?
- उत्तर: वक्ता ने स्पष्ट किया कि भगवत्सेवा में समर्पित वस्तु भगवान ही अंगीकार करते हैं। भगवान स्वयं भक्त काम पूरक हैं, वे सारी इच्छाएं पूर्ण करते हैं। शिवजी भोग देकर भगवान से उनके भक्त को दूर नहीं करते।
- शिष्टाचार का दृष्टांत: जैसे अस्पताल में डॉक्टर ने मना किया हो, तो जूनियर डॉक्टर या स्टाफ मरीज को मना करता है। यह एक शिष्टाचार है। बड़े के विषय में छोटे हस्तक्षेप नहीं करते। विष्णु के भक्तों को विष्णु द्वारा ही सब कुछ मिले, इसलिए शिवजी हाथ नहीं डालते।
श्लोक १५ — अत्यंत प्रिय का दान और साधना का स्वरूप
पाठ
बालबोध श्लोक १५: ‘अति प्रिया तदपि दते कुच देव नियतार्थ प्रदान तदत्वम तदाश्रय त प्रत्येकम साधनम चेता द्वितीय साधन श्रम’
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने बताया कि १५वें श्लोक में यह शंका उठाई जा रही है कि यदि शिवजी मोक्ष नहीं देंगे तो पाशुपात शास्त्र का मोक्ष शास्त्रत्व मिट जाएगा। यदि विष्णु भोग नहीं देंगे तो पुत्र, धन, स्त्री, हार, हमेल, घोड़ा, हाथी, स्वर्ग और मोक्ष हरिभक्त को नहीं मिल पाएंगे। भगवत्भक्ति से लोक व परलोक के सब सुख मिलने का जो वर्णन है, उसमें बाधा आएगी। इस शंका की निवृत्ति के लिए यह श्लोक कह रहे हैं।
वक्ता विवेचन
- श्लोक १५ का अर्थ: शिवजी को जो अत्यंत प्रिय हो, उसे शिवजी कभी-कभी मोक्ष भी देते हैं। विष्णुजी को जो अत्यंत प्रिय हो, उसे विष्णुजी भोग देते हैं। यह बात लोकसिद्ध है।
- सामर्थ्य का निरूपण: शिव और विष्णु दोनों में भोग तथा मोक्ष दोनों देने की शक्ति है। यदि कोई भक्त उनका अत्यंत प्रिय हो जाए और उनका आश्रय ले, तो वे उसके अधिकार के अनुसार भोग या मोक्ष प्रदान करते हैं।
- परस्पर आश्रय की अवस्था: यदि शिवजी केवल भोग देते और विष्णु केवल मोक्ष देते, तो विष्णु के भक्तों को भोग के लिए शिवजी का आश्रय लेना पड़ता और शिवजी के भक्तों को मोक्ष के लिए विष्णु का आश्रय लेना पड़ता। ऐसी विरोधाभास की अवस्था न हो, इसलिए जो अत्यंत प्रिय होता है, उसे दोनों पदार्थ (भोग और मोक्ष) दोनों ही दे देते हैं।
- भक्तिहीन के लिए मार्ग: जो भगवत्भक्त न हो, यदि उसे भोग की इच्छा हो तो वह शिवजी का भजन करे, और यदि मोक्ष की इच्छा हो तो विष्णु का भजन करे।
- भगवत्भक्त का आश्रय: जो भगवत्भक्त होता है, उसे सर्व पदार्थ भगवान से ही सिद्ध होते हैं। उसे अन्य देव के पास जाने की आवश्यकता नहीं। उसका भगवान से अभिन्न पना होता है, वह मन, वाणी, काया से पूर्ण स्वरूप से भगवान को जानता है। आश्रय सिद्ध कर रखा है, इसलिए सब सिद्ध होता है, क्योंकि भगवत्भक्त का आश्रय ही सबसे बड़ा साधन है।
- श्रम का विचार: शिवजी को मोक्ष देने में तथा विष्णु को भोग देने में 'श्रम' होता है। जो जिस वस्तु को प्रदान करने में प्रसन्न होता है, उसे उसी को प्रदान करने में सुगमता होती है। यदि विपरीत वस्तु मांगी जाए, तो श्रम होता है।
- लौकिक मोक्ष की व्यवस्था: शिवजी की उपासना से भोग आदि मिलते हैं, और विष्णु की उपासना से मोक्ष मिलता है। यह लौकिक मोक्ष की व्यवस्था है। विष्णु के भक्त सात्विक हैं और शिव के भक्त तामस हैं, ऐसा वामन पुराण के दशम अध्याय में और विष्णु पुराण में कहा गया है।
- गुणातीत पना: विष्णु भक्ति करने वाले सात्विक होने के कारण, उनकी सतोगुण की निवृत्ति होकर शीघ्र ही गुणातीत पना होता है, जो मोक्ष है। इसलिए विष्णु को मोक्ष देने में श्रम नहीं होता।
- विष्णु को भोग देने में श्रम: भोग देने में विष्णु को अपने शांत स्वभाव को फेरना पड़ता है, ताकि सात्विक भक्त को भोग में आसक्ति होकर दोष उत्पन्न न हो। ऐसा स्वभाव करने में विष्णु को श्रम होता है।
- शिवजी को मोक्ष देने में श्रम: शिवजी के भक्त तामस होते हैं। उन्हें मोक्ष देने के लिए पहले तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण के धर्म मिटाने पड़ेंगे, फिर गुणातीत पना होगा, तब मोक्ष मिलेगा। यह शिवजी को बहुत श्रम होता है।
- शिवजी को भोग देने में श्रम नहीं: तामस स्वभाव वालों को भोग देने में उनके स्वभाव को फेरना नहीं पड़ता, क्योंकि तामस भक्त भोग से तामस ही रहते हैं। इसलिए शिवजी को श्रम नहीं होता।
- दृष्टांत: कर्मचारी का व्यवहार: वक्ता ने एक कर्मचारी का उदाहरण दिया, जो पगार मिलने पर दो दिन तक काम पर नहीं आता। यह गुणों का खेल है। अच्छे-अच्छे लोग भ्रम में रहते हैं कि उन्होंने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया, पर अनुकूल माहौल न मिलने पर या प्रेशर हटने पर वे अपने स्वभाव से विचलित हो जाते हैं। इसलिए अत्यधिक प्रिय होने पर भी इन सब चीजों की सावधानी रखते हुए फल प्रदान करते हैं।
- लौकिक मोक्ष: लौकिक मोक्ष स्वर्ग की प्राप्ति को कहते हैं। अलौकिक मोक्ष वेद में है, जैसा कि महाप्रभुजी ने कहा 'अलौकिकास्तु वेदोह'। लौकिक मोक्ष ऋषि मुनियों द्वारा पुराणों, तंत्रों आदि में बताए गए धर्मार्थ काम मोक्ष हैं।
श्लोक १६ — जीव का स्वभाव, दोष निवृत्ति और भगवत्प्रेम
पाठ
बालबोध श्लोक १६: ‘जीवो स्वभाव तो दुष्ठा दो भाव सर्वथा श्रवणाद ही तणा प्रेमणा सर्व कार्यम ही सिद्धति’
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने बताया कि १६वें श्लोक में कहा गया है कि जीव भगवान के अंश हैं, इसलिए स्वरूप से दुष्ट नहीं हैं, परंतु स्वभाव से दुष्ट हुए हैं। उस दोष की निवृत्ति के लिए सर्वदा श्रवण आदि करना चाहिए। श्रवण आदि करने से प्रेम होता है और प्रेम से सर्व कार्य सिद्ध होते हैं।
वक्ता विवेचन
- जीव का स्वभाव: जीव भगवान का सनातन अंश है, इसलिए स्वरूप से दुष्ट नहीं है, परंतु स्वभाव से दुष्ट हुआ है।
- दोष निवृत्ति का उपाय: इस दोष की निवृत्ति के लिए सर्वदा श्रवण आदि करना चाहिए। नवधा भक्ति करनी चाहिए।
- प्रेम से कार्यसिद्धि: श्रवण आदि करने से भगवान में प्रेम होता है, और प्रेम से तदीपनो (भगवान के समान हो जाना) और तदाश्रय (भगवान का आश्रय लेना) सिद्ध होता है। इस प्रकार करने से जीव के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
- जीव का स्वधर्म: जीव भगवान के दास हैं और उनका स्वधर्म भगवत्सेवा करना है। यदि जीव यह नहीं करता, तो वह दोषयुक्त हो जाता है।
- श्रवण आदि का फल: श्रवण आदि करने से भगवान में प्रेम होता है और प्रेम करके सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं।