पिछले श्लोक १६ की समीक्षा और १७वें श्लोक की भूमिका
पाठ
श्लोक १६ का संक्षेपण।
प्रतिभागी वाचन
जीवात्मा भगवान का अंश है, स्वभाव से दुष्ट नहीं है। स्वभाव की दुष्टता को निवृत्त करने के लिए श्रवण, स्मरण, कीर्तन आवश्यक है, जिससे प्रेम होता है और प्रेम से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। शिवजी के भक्त राजस होते हैं, उनको मुक्ति प्रदान करना कष्टदायक होता है। विष्णुजी के भक्त सात्विक होते हैं, उन्हें कल्प प्रदान करना सहज होता है। भगवान को जो अत्यधिक प्रिय है, उनको फल देने में सामर्थ्य है।
वक्ता विवेचन
- प्रश्न: पिछले श्लोक में बताए गए सामर्थ्य और साधन की व्यवस्था को स्पष्ट करें।
- उत्तर: सामर्थ्य यह है कि गुणावतार ईश्वर का ही रूप है, इसलिए उनके सामर्थ्य में कोई न्यूनता नहीं है। सभी देव सभी प्रकार का फल प्रदान करने में समर्थ हैं। साधन यह है कि पराश्रय से सिद्धि चाहने पर आराध्य का अनन्य आश्रय और तदीयता प्राप्त करनी होगी। दोषों को दूर करने के लिए नवधा भक्ति करने से प्रेमलक्षणा भक्ति सिद्ध होगी, जिससे फल की प्राप्ति होगी।
- प्रश्न: मत्स्य पुराण में वर्णित चार प्रकार के कल्पों का उल्लेख क्यों किया गया है?
- उत्तर: कल्प भी एक प्रकार का काल है, जिसका स्वभाव प्रभु निर्धारित करते हैं। जीव का स्वभाव और काल का स्वभाव (सात्विक, राजस, तामस) एक दूसरे के अनुरूप न होने पर आराध्य को फल प्रदान करने में अत्यधिक श्रम होता है। यदि जीव राजस-तामस स्वभाव का हो और तामस कल्प के कलयुग में प्रतिकूल कामना करे, तो आराध्य को बहुत कष्ट होता है। श्रुति के अनुसार मनुष्य, देव और असुर (राजस, सात्विक, तामस) स्वभाव से ही तीन प्रकार के होते हैं। काल, स्थान और कुल परंपरा का भी जीव के स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है। विषम परिस्थितियों में फल प्रदान करने में भगवान को अधिक श्रम होता है। यदि जीव स्वयं जागरूक होकर योग्य बन जाए तो दाता को श्रम नहीं होता। अतः स्वभावगत दोषों को दूर करने के लिए श्रवण, कीर्तन आदि करने से प्रेम होता है और प्रेम होने पर सब कुछ सिद्ध हो जाता है।
- प्रश्न: ऐसी स्थिति में 'अतिप्रिय' कहने का क्या औचित्य है?
- उत्तर: जिन्होंने जो कार्य अपने जिम्मे सोचा है, उससे अलग कुछ देना हो तो वे साधारण प्रिय को नहीं देते, केवल अतिप्रिय को ही देते हैं। जैसे विष्णु साधारण भक्त को भोग नहीं देते, अतिप्रिय सुदामा को दिया। महादेव साधारण भक्त को भोग दे देते हैं, परंतु मोक्ष के लिए अतिप्रिय होने पर ही देते हैं, और वह भी क्वचित् ही। यह भगवान द्वारा निर्मित एक व्यवस्था है, जिसका उल्लंघन करने पर पूरी व्यवस्था टूट जाती है।
श्लोक १७ — मोक्ष और भोग की सुलभता तथा आत्मसमर्पण का महत्व
पाठ
श्लोक १७
प्रतिभागी वाचन
मोक्ष तो विष्णु से सुलभ है और भोग शिव से सुलभ है। अतिप्रियत्व प्राप्त करने के लिए अपनी आत्मा को भगवतचरणारविंद में अर्पण करना चाहिए, जिससे निश्चित तदीयता प्राप्त होती है। जिसने अपनी आत्मा का समर्पण कर दिया और अपने ममत्व के विषयों को प्रभु इच्छा के अनुसार विनियोग कर रहा है, उसकी तदीयता निश्चित सिद्ध हो चुकी है।
वक्ता विवेचन
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: श्लोक में 'अनात्मनो' शब्द में अशुद्धि है, इसे 'आत्मनो ही समर्पण' पढ़ना चाहिए। इसका अर्थ है आत्मा का समर्पण करने से निश्चित रूप से तदीयता होती है। समर्पण करने के बाद सामने वाला इंकार नहीं कर सकता, वह स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाता है। निवेदन तक तो केवल जबानी बात होती है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। समर्पण में यह बल है।
श्लोक १८ की उत्थानिका — आत्मसमर्पण के बिना फलसिद्धि पर विचार
पाठ
उत्थानिका
प्रतिभागी वाचन
ऊपर के श्लोक में देखा कि जीव को पूर्ण रूप से प्रभु के चरणों में आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। यदि किसी कारणवश आत्मसमर्पण नहीं किया और केवल आश्रय मात्र किया है, तो उस जीव के अंदर भगवती पना सिद्ध नहीं हुआ है, तो उसकी फलसिद्धि कैसे होगी? इसे जानने के लिए महाप्रभुजी आगे कहते हैं।
श्लोक १८ — आश्रय, स्वधर्म और दुगना भार
पाठ
श्लोक १८
प्रतिभागी वाचन
यदि भगवती पना सिद्ध नहीं हुआ है और केवल 'प्रभु मेरे रक्षक हैं' ऐसा अनुसंधान करके आश्रित है, तो उसे अपने वर्णाश्रम धर्म का आचरण करना चाहिए। आश्रय तथा तदीयता की बुद्धि के लिए कुछ श्रवण आदि करना चाहिए, अन्यथा दुगना भार होगा। यदि वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता है, तो अधर्म का दोष और जीव के स्वभावगत दोष मिलकर दुगना दोष हो जाता है। ऐसे जीव का उद्धार करने में प्रभु को अत्यधिक श्रम होता है। यदि भक्त वर्णाश्रम धर्म छोड़कर प्रभु के चरणों का भजन करता है और पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है, तो उसका कोई व्यक्तित्व स्वार्थ नहीं बचता। वह हर कार्य प्रभु की प्रसन्नता के लिए करता है, तो उसका कभी गलत नहीं होगा, उसका कभी बुरा नहीं होगा, प्रभु सदैव कल्याण ही करेंगे। यदि प्रभु के चरणों का भजन नहीं करता और केवल वर्णाश्रम धर्म का पालन करता है, तो उसे वर्णाश्रम धर्म का कोई भी अर्थ प्राप्त नहीं होगा, जैसा कि भागवत जी के प्रथम स्कंध में नारद जी के एक वाक्य से प्राप्त होता है। जीव को वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए प्रभु के चरणों में आश्रय प्राप्त करने और तदीयता की सिद्धि के लिए कथा, कीर्तन, मनन आदि करते रहना चाहिए। ऐसा न करने पर कोई भी फल प्राप्त नहीं होगा और भक्तिमार्गी धर्म का आचरण न करने से प्रत्यावा (दोष) होता है, जिससे दुगना भार होता है और जीव का नाश निश्चित है।
श्लोक १९ — बालबोध ग्रंथ का उपसंहार
पाठ
श्लोक १९
प्रतिभागी वाचन
इसी प्रकार से बालकन को बोध कराने के लिए, पुष्टि जीवों को समझाने के लिए महाप्रभुजी संक्षेप में निरूपण करते हैं कि पूर्वोक्त प्रकार से अपने और दूसरों के सिद्धांतों के संग्रह रूप सब कहा गया है। इसका ज्ञान होने पर पुरुषार्थों के स्वरूप को समझने में अन्यथा ज्ञान फिर नहीं होता। हमने शास्त्रों के सभी सिद्धांतों को पुष्टि मार्गीय और मर्यादा मार्गीय जीवों को समझा दिया है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के स्वरूप को अच्छे से समझा कि इनसे कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। हमें यह पुरुषार्थ नहीं चाहिए। इन विषयों को समझने के बाद जीव के मन की सभी भ्रांतियां समाप्त हो जाती हैं, कोई संशय नहीं रहता। मोक्ष और मुक्ति के दो प्रकार (श्वेता मोक्ष और परता मोक्ष) भी महाप्रभुजी ने समझाए, पर हमें इनकी भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की मुक्ति भी नहीं चाहिए। यदि आपने इन पुरुषार्थों के स्वरूपों का अच्छे से ज्ञान कर लिया है, तो यह आपकी भक्ति में स्वागत है, आपको भक्ति मार्ग में आने का अधिकार प्राप्त हो गया है।
वक्ता विवेचन
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: ग्रंथ यहां संपन्न हो रहा है। कल इस ग्रंथ के विषय में किसी को कुछ कहना हो, क्या समझ में आया, क्या जानकारी बढ़ी, क्या उलझनें बढ़ीं, या क्या प्रश्नों के उत्तर मिले, इन सब विषयों पर चर्चा होगी। परसों से हमारे यहां छह दिन का सत्र आरंभ हो रहा है जिसमें युवा वैष्णव और वल्लभ कुल के बालक ठोस ग्रंथ, तत्वदीप निबंध जैसे ग्रंथों का अध्ययन करके चर्चा करेंगे। उनकी समझ प्रबुद्ध हो जाती है। आप लोगों को अपनी आगे की पीढ़ी के लिए सोचना चाहिए, उन्हें संस्कार देने चाहिए ताकि ठाकुरजी घर में विराजें और ग्वाल मंडली में न पधारें। एक-आध पीढ़ी तक तो खींच जाएगा, तीसरी पीढ़ी का कुछ कह पाना संभव नहीं है।