बाल बोध ग्रंथ का आवर्तन और उसकी कठिनाइयाँ
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बताया कि `बालबोध` ग्रंथ का एक आवर्तन संपन्न हो चुका है, जिसमें अधिकांश नए लोग थे जिन्होंने लोक और पर के विवेचन प्रस्तुत किए। विचार-विमर्श के साथ यह स्पष्ट हुआ कि ग्रंथ को समझने में भाषा (ब्रजभाषा) और विषय (पुष्टिमार्ग के गूढ़ सिद्धांत) दोनों की कठिनाइयाँ आती हैं। यह भी बताया गया कि `बालबोध` में `भक्ति भाव भावना` या `लीला` संबंधी बातें नहीं हैं, जिससे कुछ लोगों को निराशा भी हुई होगी, क्योंकि वे महाप्रभुजी के ग्रंथों से ऐसी अपेक्षा रखते हैं।
आचार्यचरणों की वाणी और उसका प्रामाण्य
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध
वक्ता विवेचन
वक्ता ने समझाया कि आचार्यचरण जो बातें कहते हैं, परंपरा उन्हें शाश्वत सिद्धांत के रूप में सामने रखती है। श्रीमहाप्रभुजी ने अपने जीवनकाल में `षोडशग्रन्थ`, `भाष्य`, `सुबोधिनी`, `पत्रावलंबन` और `मधुराष्टकाद स्तोत्र` जैसे ग्रंथ लिखे। उनके निकटवर्ती शिष्यगण (जैसे श्रीगोपीनाथजी, श्रीगोसाईंजी, दामोदर दास, कृष्ण दास) ने भी आचार्यचरणों की अनेक बातें सुनी और देखी होंगी, किंतु उन्होंने सभी को प्रकट नहीं किया, क्योंकि उसमें यह संदेह रहता है कि कौन सी बात व्यक्ति विशेष के लिए थी और कौन सी सार्वभौमिक। अन्य संप्रदायों (जैसे बुद्ध, मोहम्मद) में भी शिष्यों ने गुरु के उपदेशों का संकलन बाद में किया, जिससे उनके प्रामाण्य में संदिग्धता आ सकती है। पुष्टिमार्ग में श्रीमहाप्रभुजी ने स्वयं इतना लिख दिया है कि मार्गदर्शन में कोई कमी नहीं लगती। वचनामृत के नाम पर चलने वाले कई 'गपोड़े' (अविश्वसनीय बातें) भी संदिग्ध हो जाते हैं। जो वचन आचार्यचरणों के सिद्धांतों के सुसंगत हैं, वे प्रमाण हैं; जो सुसंगत नहीं, वे विशिष्ट व्यक्ति के लिए कहे गए हो सकते हैं। वक्ता ने श्रीगोकुलनाथजी के वचनामृत साहित्य का उदाहरण दिया, जिसका प्रामाण्य उनके स्वहस्ताक्षर से न मिलने के कारण संदिग्ध हो जाता है।
बालबोध ग्रंथ और नारायण दास की जिज्ञासा
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध
वक्ता विवेचन
वक्ता ने बल दिया कि `बालबोध` ग्रंथ आचार्यचरणों ने स्पष्ट रूप से अपने स्वहस्ताक्षर से लिखा है और नारायण दास को इसका उपदेश दिया था। यह संभावना व्यक्त की गई कि नारायण दास को `पुष्टिमार्ग` क्या है, यह अच्छी तरह समझ में नहीं आया होगा, विशेषकर `मर्यादामार्गीय` और `पुष्टिमार्गीय` `पुरुषार्थ` (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के भेद के संबंध में। आचार्यचरणों ने इस ग्रंथ में `मर्यादामार्गीय` `पुरुषार्थ` के स्वरूप पर अपनी दृष्टि दी है। वक्ता ने कहा कि उन्होंने यह ग्रंथ श्रीनंदन लालजी महाराज श्री की ब्रजभाषा विवृत्ति के आधार पर पढ़ाया है और श्रोताओं से पूछा कि इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद उन्हें क्या समझ आया और उनके विचारों में क्या परिवर्तन आया।
शरणागति और वर्णाश्रम धर्म: बंसरी का प्रश्न
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १८
प्रतिभागी वाचन
सहभागी ने बताया कि `बालबोध` ग्रंथ के श्लोक १७ और १८ में `स्वधर्म` की बात हुई है, जिसमें `वर्णाश्रम` और `शरणागति` दोनों को `श्रीमहाप्रभुजी` ने समान महत्व दिया है। पहले उन्हें लगता था कि `वर्णाश्रम` गौण है और `भगवत्भक्ति` मुख्य है, लेकिन अब स्पष्ट हुआ कि दोनों का समान महत्व है। यदि इनमें से एक का भी पालन नहीं किया जाता, तो दुगुना भार लगता है। केवल `वर्णाश्रम` का पालन करने पर और `शरणागत` न रहने पर भी फल नहीं मिलता, और यदि केवल `शरणागत` रहते हैं तथा `वर्णाश्रम` का अच्छी तरह से निर्वाह नहीं करते, तो भी फल नहीं मिलता।
वक्ता विवेचन
- वक्ता का प्रश्न: वक्ता ने पूछा कि बंसरी को जो समझ में आया क्या वह सही है?
- उत्तर: दूसरे सहभागी ने बंसरी की बात को स्वीकार किया और कहा कि `वर्णाश्रम धर्म` को `सेवा` के साथ ही जोड़ना चाहिए, और दोनों धर्मों का पालन करना आवश्यक है।
वर्णाश्रम धर्म का वर्तमान स्वरूप और सामान्य धर्म
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १८
वक्ता विवेचन
- वक्ता का स्पष्टीकरण: वक्ता ने प्रश्न किया कि वर्तमान में `वर्ण` और `आश्रम` का क्या स्वरूप बचा है, क्योंकि `वर्ण` का निर्धारण `उपनयन संस्कार` से होता है, जो अब अधिकतर बंद हो चुका है या केवल औपचारिकता मात्र रह गया है। इसी प्रकार, `आश्रम` भी `वर्ण` पर निर्भर करते हैं। `ब्रह्मचर्य आश्रम` `उपनयन संस्कार` से आरंभ होता था, जिसके कर्तव्य (वेदाध्ययन, गुरुकुलवास, नित्य संध्या, ब्रह्म यज्ञ, हवन आदि) अब निभाए नहीं जाते। `गृहस्थ आश्रम` में भी प्रवेश शास्त्रीय विधि (अग्निहोत्र, वैश्वदेव आदि) से होता था, जो अब नहीं होता। इसलिए, जब `वर्ण` और `आश्रम` ही नहीं बचे हैं, तो `वर्णाश्रम धर्म` का पालन कैसे किया जा सकता है।
- निष्कर्ष: वक्ता ने कहा कि `धर्मशास्त्रों` में जो `सामान्य धर्म` कहे गए हैं (जैसे धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध), उन्हीं का पालन करना चाहिए और उसी को `स्वधर्म` समझना चाहिए। `वर्णाश्रम` के अभाव में सामान्य धर्म का पालन करते हुए `भगवत्भक्ति` और `भगवदाश्रय` पर जोर देना चाहिए, जिससे `भगवदाश्रय` दृढ़ होगा और `भगवत्भक्ति` प्राप्त होगी।
स्वधर्म के रूप में भगवत्सेवा का महत्त्व: परमानंद जी की शंका
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १८
प्रतिभागी वाचन
सहभागी ने `बालबोध` श्लोक १८ के आधार पर शंका व्यक्त की कि यदि `वर्णाश्रम धर्म` समाप्त हो गया है, तो `भक्तिमार्ग` में आचार्यचरणों द्वारा `प्रभु` की `शरणागति` करना ही जीव का `स्वधर्म` कैसे है। उन्होंने पूछा कि `ब्रह्मसम्बन्ध` लेने के बाद `सेवा` भी तो आती है, तो क्या `सेवा` को `स्वधर्म` नहीं समझ सकते? यदि `शरणागति` और `नामस्मरण` (`अष्टाक्षर मंत्र`) `स्वधर्म` है, और `सेवा` भी `स्वधर्म` है, तो क्या यही `आत्मधर्म` बचा है?
वक्ता विवेचन
- प्रतिभागी की सहमति: अन्य सहभागी ने परमानंद जी की बात से सहमति व्यक्त की कि अब `स्वधर्म` केवल `प्रभुसेवा` ही बचता है, जिसे `ब्रह्मसम्बन्ध` के द्वारा `श्रीमहाप्रभुजी` ने दिया है। इसे अच्छी तरह से निभाना चाहिए।
- परमानंद जी का स्पष्टीकरण: परमानंद जी ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि `स्वधर्म` को पहले `वर्णाश्रम धर्म` से जोड़ा जा रहा था, जो कि अब संभव नहीं। `भगवत्सेवा` ही अब `स्वधर्म` है। उन्होंने कहा कि `अष्टाक्षर मंत्र` लिया है और `सेवा माथे पधराई` है, यही हमारा `स्वधर्म` है। उन्होंने `बालबोध` के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त होने की बात कही कि `लोक` और `वेद` को `तलांजलि` नहीं दी गई थी, बल्कि हम भ्रम में जी रहे थे, और अब स्पष्ट हो गया कि `वर्णाश्रम धर्म` अब हमारे लिए `गया` है, और `सेवा धर्म` ही बचा है, जिसे `आत्मधर्म` मानकर `प्रभु` के भरोसे रहना है।
अन्याश्रय का विषय और स्वरूप नाश
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १८
प्रतिभागी वाचन
सहभागी ने कहा कि जो `स्वधर्म` का पालन कर रहे हैं, उसे `अन्य` से रहित होकर करना चाहिए। उन्होंने `अन्याश्रय` के व्यापक प्रचलन पर चिंता व्यक्त की, जैसे `लक्ष्मी पूजन` या `वाहन पूजन`, और पूछा कि ऐसे में `ठाकुरजी` की `सेवा` करने का क्या अर्थ, जब `अन्याश्रय` के कारण `ठाकुरजी` शून्य हो जाते हैं।
वक्ता विवेचन
- अन्याश्रय का खंडन: वक्ता ने राम प्रकाश जी की बात को सही बताया कि `अन्याश्रय` नहीं होना चाहिए। वक्ता ने कहा कि `याव अन्याश्रयस्तावत भगवान् तं जनम् विलोयते न कृपया यदनन्य जन वत्सलः`। जब तक `प्रभु` पर `आश्रय` नहीं रखते और `अन्याश्रय` करते हैं, तब तक `भगवान्` ऐसे जन पर कृपा से दृष्टि नहीं करते, क्योंकि `भगवान्` `अनन्य जनों` के `वत्सल` हैं।
- काकरोली घर का प्रसंग: वक्ता ने काकरोली घर के एक बालक का प्रसंग सुनाया, जिसने `सरस्वती मंत्र` का `अन्याश्रय` किया था, जिससे `द्वारकाधीशजी` ने उसके पिता से कहा कि वह बालक इस जन्म में उन्हें प्राप्त नहीं हो सकता। इससे पता चलता है कि `अन्याश्रय` एक गंभीर अपराध है, जो `आश्रय` के विश्वास को तोड़ता है और `आत्मघाती` है।
- स्वरूप नाश का दुष्परिणाम: वक्ता ने `अयोग्यता` और `स्वरूप नाश` के बीच अंतर समझाया। `अयोग्यता` का प्रायश्चित या दंड से निवारण हो सकता है, परंतु `स्वरूप नाश` का कोई उपाय नहीं है। `अन्याश्रय` `स्वरूप नाश` करने वाला है, और जो `आचार्यचरणों` द्वारा `प्रभु` को `शरणागत` होकर भी `अन्याश्रय` करता है, वह घोर निंदनीय है, जिससे `प्रभु` और `आचार्यचरणों` दोनों को खेद होता है।
- गुरुद्वारों की ज़िम्मेदारी: वक्ता ने कहा कि यह गुरुद्वारों की मुख्य जिम्मेदारी है कि वे ऐसे लोगों को `दीक्षा` न दें जो `कंठी` की लाज न रख सकें या उसकी गरिमा का पालन न कर सकें। शिष्यों को तो यह कहकर छूट मिल सकती है कि उन्हें पता नहीं था, लेकिन दीक्षा देने वालों को इसका `दोष` लगता है।
वैष्णव संबंध और लोक व्यवहार
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध श्लोक १८
प्रतिभागी वाचन
सहभागी ने प्रश्न किया कि यदि कोई वैष्णव `सकड़ी सेवा` नहीं कर रहा हो और स्वयं `असमर्पित` ले रहा हो, तो उसका `प्रसाद` कैसे लिया जाए, और `वैष्णव` का समाधान कैसे हो?
वक्ता विवेचन
- प्रसाद का महत्व: वक्ता ने स्पष्ट किया कि किसी को `प्रसाद` लेवाना या न लेवाना `पुष्टिमार्ग` का मुख्य धर्म नहीं है, बल्कि यह `लोक धर्म` या `लोक व्यवहार` है। `पुष्टिमार्ग` का `अंतरंग धर्म` `भगवदाश्रय` और `भगवत्भक्ति` है। यदि हमारे यहाँ `प्रभु` नहीं विराजते और हम `भोगादिक` समर्पित नहीं कर पाते, जिससे `महाप्रसाद` के आग्रही लोग हमारे यहाँ `प्रसाद` ग्रहण न करें, तो इससे कोई हानि नहीं है। `देखा देखी` इन चीजों को करने का कोई महत्व नहीं है।
- भगवदाश्रय का महत्व: वक्ता ने `बालबोध` ग्रंथ से ही `अतया चापि केवलं चेत् समाश्रितः` श्लोक का तात्पर्य समझाते हुए कहा कि यदि `तदीयता` नहीं भी है, पर `आश्रय` केवल इस भावना से लिया जा रहा है कि `आश्रय` और `भक्ति` दृढ़ हो, तो `प्रभु` की कृपा से आगे `पुरुषार्थ` सिद्ध होंगे।
- मुख्य धर्म और अपराध निवारण: `श्रीमहाप्रभुजी` का अभिप्राय है कि `आत्मनिवेदन पूर्वक` घर में `प्रभु` पधराकर `सर्वस्व समर्पण` करना ही `मुख्य धर्म` है। यदि ऐसा संभव न हो, तो `भगवदाश्रय` रखा जाए, `प्रभु` के `श्रवण`, `कीर्तन`, `स्मरण` किए जाएँ, और `प्रभु` के `वियोग` की भावना की जाए। यदि `अपराध` हुए हों, तो `पश्चाताप` और `ताप क्लेश` से उन्हें दूर करने की भावना करते रहना चाहिए, जिससे `प्रभु` प्रसन्न होकर प्रतिबंधों का निवारण करते हैं।
- वक्ता का स्पष्टीकरण: वक्ता ने पुनः स्पष्ट किया कि `वर्णाश्रम धर्म` जिनका है, वे करें; जिनका नहीं है, वे उसकी चिंता न करके `भगवदाश्रय` और `भगवत्भक्ति` में और अधिक जोर लगाएँ, यही तात्पर्य है।
बाल बोध ग्रंथ का निष्कर्ष और आगामी क्रम
पाठ
षोडशग्रन्थ बालबोध
प्रतिभागी वाचन
सहभागी ने वक्ता के निष्कर्ष से सहमति जताते हुए कहा कि `बालबोध` ग्रंथ से यही समझ में आया कि `पुष्टिमार्ग` में आगे बढ़ने के लिए प्रवेश द्वार के समान है, और `वर्णाश्रम धर्म` नहीं है, तो `प्रभुसेवा` ही `स्वधर्म` है।
वक्ता विवेचन
वक्ता ने पुनः दोहराया कि `वर्णाश्रम धर्म` है या नहीं, यह व्यापक रूप से नहीं कहा जा सकता। जिनका है, वे करें; जिनका नहीं है, वे उसकी चिंता न करके `भगवदाश्रय` और `भगवत्भक्ति` में और अधिक जोर लगाएँ, यही तात्पर्य है। वक्ता ने सत्र संपन्न करते हुए बताया कि कल से सुबह ९:०० बजे से रात ९:०० बजे तक क्रम चलेगा, जिसके कारण `सुबोधिनीजी` का क्रम इस सत्र के संपन्न होने के बाद ही रख पाएँगे। उन्होंने श्रोताओं से रिकॉर्डिंग सुनने और प्रतिभागियों के परिश्रम को सराहने का आग्रह किया।