धर्म की अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
धर्म को श्रीमहाप्रभुजी के अनुसार अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा के रूप में समझाया गया है। धर्म रक्षति रक्षतः सिद्धांत के अनुसार, यदि धर्म में निष्ठा हो तो वह हमारी रक्षा करता है। विश्वास से अंधविश्वास और अंधविश्वास से अविश्वास उत्पन्न हो सकता है, और इसी प्रकार श्रद्धा से अंधश्रद्धा और अंधश्रद्धा से अश्रद्धा हो सकती है। परंतु निष्ठा कभी नकारात्मक नहीं हो सकती, इसलिए धर्म में प्रवृत्त होने के बाद निष्ठा दृढ़ रखनी चाहिए। निष्ठा में आने वाली कठिनाई को दूर करने के लिए श्रद्धा की रचना की गई है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
पुष्टिभक्ति मार्ग में निष्ठा का महत्व एवं शरणागति, सेवा, समर्पण, भक्ति
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
यदि निष्ठा दृढ़ हो तो पुष्टि मार्ग जीव के लिए है, अन्यथा वह अजागृत के समान है। पुष्टिमार्गीय जीव के लिए श्रीमहाप्रभुजी के ग्रंथ तत्व, सिद्धांत, उपदेश और कर्तव्य ग्रंथ के रूप में महत्वपूर्ण हैं। षोडश ग्रंथ मानव के समान हैं, जिनमें शरणागति, सेवा, समर्पण और भक्ति का निरूपण किया गया है। शरणागति को प्रमाण रूप, समर्पण को प्रमेय रूप, सेवा को साधन रूप और भक्ति को फल रूप से निरूपित किया गया है। विवेक धैर्य आश्रय शरणागति के अंतर्गत आता है। शरणागति का अर्थ है अपने रक्षक की ओर जाना और ज्ञान के कारण अपने भीतर उत्पन्न होने वाली निसारता की भावना। लौकिक, परलौकिक, भक्ति से संबंधित, अशक्य अथवा सुशक्य, प्रत्येक परिस्थिति में केवल श्रीकृष्ण ही हमारे रक्षक हैं, यह भाव सदा और सर्व प्रकार से रखना ही पुष्टि पद के मार्ग में शरणागति है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
शरणागति की परिभाषा एवं प्रकार
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
शरणागति की परिभाषा है 'भगवत महात्म्य के बोध के साथ निसाधन अथवा निसाधन भाव का होना ही शरणागति है'। शरणागति के दो प्रकार हैं: सिद्ध और साध्य। सिद्ध शरणागति में प्रभु स्वयं जीव की शरणागति सिद्ध कर देते हैं और जीव इसके लिए कोई स्वतंत्र प्रयत्न नहीं करता। साधत्व शरणागति में जीव स्वयं प्रयत्न करके प्रभु की शरणागति में रुचि करता है, और इसके बाद शरणागति के अनुरूप साधन करना उसके लिए आवश्यक होता है। निसाधनता का अर्थ है साधनी होना, जिसे मार्जार न्याय से समझा जा सकता है (जैसे बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में पकड़ती है)। निसाधन की भावना का अर्थ है साधन पर विश्वास न रखकर प्रभु पर विश्वास रखना। इसके विपरीत मरकट न्याय में जीव स्वयं साधन करता है और अपने साधन पर ही निर्भर रहता है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
विवेक धैर्य आश्रय ग्रंथ का संदर्भ एवं अन्य ग्रंथों से संगति
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
विवेक धैर्य आश्रय ग्रंथ में श्रीमहाप्रभुजी ने शरणागति के प्रति दृढ़ संकल्प तथा उसे संभालने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश बताए हैं। इस ग्रंथ में केवल आश्रय का उल्लेख है क्योंकि विवेक धैर्य आश्रय अन्य आश्रित है। विवेक, धैर्य और आश्रय का संबंध अत्यंत गहरा है। बालबोध में स्वतः मोक्ष (सांख्य योग) और परतः मोक्ष (शैव वैष्णव भक्ति) प्राप्ति के उपाय बताए गए हैं, वैसे ही विवेक पुष्टिभक्ति प्राप्ति की साधना है। सिद्धांत मुक्तावली में सेवा के बाहरी अंगों का उपदेश है, जिसका निरूपण सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में मिलता है, तथा आंतरिक अंगों का निरूपण ग्रंथ में प्राप्त होता है। आंतरिक साधकों की साध्यता विवेकश्रय के सिद्ध होने से ही होती है। अंतःकरण प्रबोध द्वारा अंतरात्मा की साधारणता का उपदेश दिया गया है। इस प्रबोधन के लिए विवेकश्रय की पूर्ण आवश्यकता होती है। यह ग्रंथ उन आंतरिक विषयों का निरूपण करता है कि किन परिस्थितियों में जीव विवेक और धैर्य खो देता है, और किन उपायों से रक्षा संभव है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्ग में विवेक और धैर्य की भूमिका
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
कर्म मार्ग में विवेक यह समझने में सहायता करता है कि कौन सा कार्य उचित है और कौन सा अनुचित है, जिससे कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान होता है। कर्म का फल तुरंत प्राप्त नहीं होगा, इसलिए असफलता अथवा बाधाओं के समय धैर्य रखना आवश्यक है। ज्ञान मार्ग में विवेक मुख्य आधार है, जिससे सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य (आत्मा और अनात्मा) का विवेक किया जाता है। आत्म साक्षात्कार अथवा ग्रंथों के गहन अध्ययन और साधना के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है, इस दौरान विचलित हुए बिना धैर्य बनाए रखना अनिवार्य है। भक्ति मार्ग में बुद्धि के तर्क से अधिक भगवान के प्रति समर्पण और प्रेम का भाव है। अहंकार और समर्पण के अंतर को समझने के लिए विवेक आवश्यक है। भगवान की प्राप्ति अथवा उनकी कृपा में समय लगने पर या दुख की स्थिति में भी भक्त का भरोसा न डगमगाए, इसके लिए धैर्य आवश्यक है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
शरणागति के पोषक: विवेक और धैर्य के उपाय
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
शरणागति के दो प्रकार हैं: पोषक और साधक। पोषक में विवेक और धैर्य आते हैं, साधक में आश्रय आता है। विवेक का अर्थ है कि जो कुछ भी होता है, वह प्रभु की इच्छा से ही होता है। इसे सिद्ध करने के उपाय हैं प्रार्थना, अभिमान त्याग, हठ त्याग और अनाग्रह। धैर्य का अर्थ है आजीवन तीनों दुखों को सहन करना, और इसके सिद्धि के चार उपाय हैं अनाग्रह (जो तमित करना है), सहन (जो देह होता है), त्याग (जो जड़ होता है), और असमर्थता की भावना।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
भक्ति मार्ग में विवेक और धैर्य की आवश्यकता
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
श्रीमहाप्रभुजी के अनुसार भगवत् कृपा से आश्रय सिद्धि प्राप्त हो जाती है, और उसका विवेक धैर्य भी स्वतः सिद्ध हो जाता है। साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि विवेक धैर्य के बिना आश्रय नहीं हो सकता। जीव का अविवेक और अधैर्य श्री भगवत् आश्रय से निश्चित कर सकता है। इसलिए सचेत विवेक और सचेत धैर्य के द्वारा दृढ़ आश्रय की आवश्यकता होती है। इस प्रकार विवेक धैर्य एक कक्षा है और आश्रय दूसरी कक्षा है। विवेक और धैर्य शरणागति के पोषक हैं। विवेक और धैर्य उपाय और अपाय दोनों का चिंतन कराते हैं। यदि जीव की इच्छा भगवान पूरी करें तो यह भगवत् कृपा है, और यदि पूरी न करें तो भगवत् इच्छा है। जो भी होता है, कृपा और इच्छा दोनों भगवान की ही हैं, इसलिए वे ही हमारे रक्षक हैं।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
विवेक की परिभाषा और प्राप्ति के उपाय
पाठ
विवेक अस्तु हरि सेवक पर
प्रतिभागी वाचन
विवेक की परिभाषा है 'विवेकस्तु हरि सेवक पर' अर्थात श्री हरि सब कुछ अपनी इच्छा के अनुसार करेंगे। विवेक प्राप्ति के उपाय हैं: प्रार्थना (प्रभु वास्तव में क्या चाहते हैं, यह जानना कठिन है, इसलिए प्रार्थना ही करनी चाहिए), अभिमान त्याग (ईश्वर स्वयं किसी भी कार्य को करने में पूर्णतः समर्थ हैं, इसलिए मनुष्य को अपनी अहंता का त्याग करना चाहिए), हठ त्याग (हृदय के भीतर भगवान की कोई विशेष आज्ञा या प्रेरणा उत्पन्न हो सकती है, उसे समझना चाहिए और यदि वह हमारे दैनिक स्वार्थ से जुड़ी न हो तो मानना चाहिए), और अनाग्रह (आपतकाल में किसी भी बात को आग्रह पूर्वक पकड़ कर रखना उचित नहीं है, धर्म और अधर्म का सही विवेक रखते हुए सावधानी से रहना उचित है)।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
धैर्य की परिभाषा और प्राप्ति के उपाय
पाठ
त्रिख सहन धैर्य
प्रतिभागी वाचन
धैर्य की परिभाषा है 'त्रिख सहन धैर्य' अर्थात धैर्य का अर्थ है तीन प्रकार के दुखों को आजीवन सभी प्रकार से सहन करना और सदैव उसके लिए तैयार रहना। इसे 'सत्र की तरह देता', 'जल की तरह', और 'भार्या के समान' समझाया गया है। तीन प्रकार के दुख हैं: आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक, तथा काल, कर्म, स्वभाव। धैर्य धारण करने के उपाय हैं: अनाग्रह (यदि अपने आप किसी प्रकार दुख का प्रतिकार हो जाता हो तो दुखों को सहन करने का आग्रह नहीं रखना चाहिए), सहन (पत्नी आदि परिवार के सदस्यों अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए तिरस्कार या कटु वचनों को सहन कर देना चाहिए), त्याग (इंद्रियों के कार्यों अथवा उनकी अपेक्षाओं की संतुष्टि के लिए शरीर, वाणी या मन को अत्यधिक रूप से उनमें संलग्न नहीं करना चाहिए, मध्यम मार्ग में ही रहना चाहिए), और असमर्थता की भावना (विपत्ति न हो तो अपने आप को समर्थ मानने की भावना कर देनी चाहिए, जो कार्य स्वयं करना संभव हो उसके लिए श्री हरि तो हैं ही, इसलिए उनके आश्रय की भावना करनी चाहिए)। भगवान का आश्रय करने से अशक्य वस्तु भी बन जाती है और दुनिया भी स्थिर हो जाती है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
विविध दृष्टांतों से विवेक और धैर्य
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
राजा परीक्षित ने प्यास और भूख के कारण अपना विवेक खो दिया और उन्होंने श्रंगी ऋषि के गले में सर्प डाल दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें श्राप मिला। हिरण्यकश्यपु ने कई वर्षों तक तप करके अमर रहने का वरदान मांगा और इस वरदान के कारण उन्हें अभिमान हो गया था कि वह सर्वशक्तिमान और सर्वोत्तम है। दूसरी तरफ, उनके पुत्र प्रहलाद जी उनसे भिन्न थे। उन्होंने प्रभु से कभी कुछ नहीं मांगा और अहंकार भी नहीं किया तथा धैर्य रखा। नरसिं मेहता और मीराबाई के जीवन प्रसंगों में विवेक और धैर्य दोनों स्पष्ट दिखाई देते हैं।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
ग्रंथोक्त शास्त्र वचन: विवेक और धैर्य का महत्व
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
महाभारत के वचन के अनुसार, भगवान अपने स्मरण करने वालों के पापों का तथा यज्ञों में अर्पित हवि का हरण करते हैं, इसीलिए उनका नाम हरि है। गीता जी के चौथे अध्याय के चालीसवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि मनुष्य विवेकहीन है, जिसके मन में श्रद्धा नहीं है और जो हमेशा शंका या संशय से घिरा रहता है, उसका पतन निश्चित है। ऐसे संशय से भरे हुए मनुष्य को न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई सुख प्राप्त होता है। श्री रघुनाथ जी की टीका में भी उल्लेख मिलता है कि हमें भगवान पर कभी भी अविश्वास नहीं रखना चाहिए, और जो भी लौकिक या अलौकिक कार्य करेंगे, वे स्वयं अपनी इच्छा से ही करेंगे। इसीलिए श्रीमहाप्रभुजी भी स्वयं कहते हैं `विवेकस्तु हरि सर्वम निच्छात करिशति`। गीता जी के एक श्लोक में यह समझाते हैं कि समस्त वस्तुएं और समस्त कार्य भगवान के अधीन हैं। भगवान को किसी कार्य को करने के लिए किसी अन्य साधन अथवा काल की अपेक्षा नहीं होती। श्री रघुनाथ जी हमें इस वचन से यह समझाना चाहते हैं कि भगवान करतुम, अन्यथा करतुम सर्व सामर्थ्यवान हैं, इसीलिए हमें भगवान से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, न ही उन्हें किसी बात का स्मरण दिलाना चाहिए। गीता जी के एक श्लोक में भगवान अर्जुन जी को यह कहते हैं कि हे कुंती पुत्र, इंद्रियों और विषयों के संयोग से ही गर्मी, सर्दी और सुख दुख का अनुभव होना है। यह सब उत्पन्न और नाश होने वाले एवं अनित्य हैं, इसीलिए हे पार्थ, तू इन्हें सहन कर। श्रीमहाप्रभुजी कहते हैं कि जो भी कोई दुख हो चाहे आधिभौतिक हो या आध्यात्मिक हो या आधिदैविक हो उसे हमें निरंतर मरण पर्यंत सहन करते रहना चाहिए (`त्रिख सहन धैर्य सर्वदा`)। अंतःकरण प्रबोध में `सेवक सेवकस धर्मोयम स्वामी सर्व करिशति` अर्थात सेवक का धर्म श्री हरि की आज्ञा के अनुसार कार्य करना है। श्री हरि अपने भक्तों के सभी कार्य स्वयं करेंगे।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
वार्ता संदर्भ: विवेक और धैर्य के व्यावहारिक दृष्टांत
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
विवेकपूर्ण जीवन को संतदास चोपड़ा के दृष्टांत से समझाया जाता है। प्रार्थना नहीं करनी, यह कृष्णदास कायस्त तथा अन्य कायस्त पिता-पुत्रों के दृष्टांत से समझाया जाता है, जो बंदीगृह में पीड़ा भोगते रहे किंतु अपनी मुक्ति के लिए उन्होंने कभी भी प्रार्थना नहीं की, न ही प्रभु के प्रति उनका विश्वास कम हुआ और न उन्होंने अपना धैर्य छोड़ा। हठ की वृद्धि नहीं करनी, यह प्रसंग पद्मना दास और त्रिपुरा दास कायस्त के दृष्टांतों द्वारा समझाया जाता है। कृष्णदास कायस्त पिता-पुत्रों ने मरण तक कष्ट सहन किया, किंतु उन्होंने धैर्य, शरण भावना और स्वधर्म का त्याग नहीं किया। जीवन के अंतिम क्षण तक अविचलित रहते हुए उन्होंने सारे दुखों को सहन किया। धर्म को न खोना ही धैर्य है। अनाग्रही नारायण दास लुहाना और कृष्णदास कायस्त के दृष्टांतों द्वारा हमें यह समझाया जाता है, और त्याग भी नारायण दास लुहाना और कृष्ण और कायस्त बाप-बेटा के दृष्टांतों द्वारा समझाया जाता है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
सिद्धांत का वर्तमान स्वरूप: समस्या एवं समाधान
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
- समस्याएं: व्यावसायिक हेतु सामूहिक सेवा, सामूहिक मनोरथ, सामूहिक प्रवृत्तियां (अनुभूत छप्पन भोग इत्यादि), श्री आचार्यजी के सिद्धांतों की नासमझ, न जानने की इच्छा, अज्ञानता, असामर्थ्यता के कारण सामूहिक प्रवृत्तियों की बढ़ोतरी हो गई है। मंदिरों में बढ़ोतरी होगी। घर में विराजते देव की अपेक्षा मंदिर में विराजते देव का मोल ऊपर हो गया, मनोरथ बढ़े, लालच बढ़ी, प्रलोभन बढ़े। दिव्य स्वधर्म के कल्याण के सच्चे मार्ग से हटकर गलत दिशाहीन मार्ग पर चलने लगे। समूह में तन, मन, धन से की जाने वाली भक्ति का प्रकार प्रचलित हो गया। ज्ञान के अभाव में घरों में आध्यात्मिक और धार्मिक संस्कारों का चिंतन उपेक्षित होने लगा। स्नेह और समर्पण की भावना लुप्त हो रही है, घर के भगवान सेवाविहीन हो रहे हैं। पूज्य श्री श्याम मनोहर बाबा कहते हैं, 'ओ वल्लभ माने ठाकुर जी नहीं'।
- समाधान: जो वस्तु प्रभु को प्रिय लगती है, जिसमें किसी अन्य का भाव न हो, और जिन पदार्थों को प्रभु को समर्पित करने का चिरकाल का मनोरथ हो एवं जिन पदार्थों की प्राप्ति में आनंद होता है, ऐसे पदार्थों का समर्पण करना चाहिए। इससे इतर पदार्थों के समर्पण का निषेध करने के लिए यह कथन किया है। समर्पण किए जाने वाले पदार्थ सन्मार्ग से प्राप्त किए गए होने चाहिए, अन्याय या चोरी से अर्जित नहीं होने चाहिए। दामोदर दास संभलमाला की वार्ता के अनुसार, उन्होंने आम सोने के पात्र में सराया, और पद्मनाभ दास की वार्ता के अनुसार, उन्होंने हर एक भोग में श्री मथुराधीश जी को केवल छोला का भोग कराया। इन सभी की एक वाक्यता करें तो सार यह निकलता है कि भक्ति मार्ग की रीति और श्रीमहाप्रभुजी के सिद्धांत में बाधा न आए। इस प्रकार भगवद् उपयोगी पदार्थों का समर्पण अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। श्री गोपीनाथ जी साधन दीपिका में यह आज्ञा करते हैं कि 'स्त्रिया नाम भक्तम प्रदर्शयेत'। सर्व निर्णय में यह कहते हैं कि प्रभु सेवा में क्लेश युक्त होकर समर्पण नहीं करना चाहिए, सहज समर्पण करना चाहिए जो श्री ठाकुरजी को प्रिय हो। ऐसा हमें सहज गोपाल के भाव से समझ आता है। अर्ध गुप्त वस्तु प्रभु को समर्पण नहीं करनी चाहिए। भगवत् सेवा गुरु आज्ञा से करनी चाहिए, जो हमें 'सेवा कृति गुरुरा आज्ञा' से समझ आता है। प्रतिदिन श्रीमद्भागवत का पाठ करना चाहिए। आगे श्रवण निर्णय की २३३वीं कारिका में यह समझाते हैं कि कृष्ण भावना अर्थात शरण भावना पूर्वक तदनुसार सब कुछ सहन करते हुए भगवतीय जीवन का निर्वाह करना चाहिए। वैराग्य एवं संतोष को कभी छोड़ना नहीं चाहिए। भगवतीय जीवन है। आगे सर्व निर्णय की कारिकाओं में यह समझाते हैं कि व्यर्थ की वाणी, अनावश्यक क्रियाएं, निरर्थक कर्म और व्यर्थ चिंतन का पूरी तरह त्याग करना चाहिए। स्वधर्म का आचरण करने में असमर्थता होने पर भी वेधर्म से दूर रहना चाहिए तथा इंद्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए। प्रभु का भजन कभी भी लौकिक कामना की पूर्ति के लिए नहीं करना चाहिए। असद संग बुद्धि का नाश करता है और भगवत् भजन में बाधक होता है। श्रीमहाप्रभुजी शिक्षा श्लोकी में यह आज्ञा करते हैं कि हम बहिर्मुख हुए नहीं कि काल का प्रवाह हमारे देह, चित्त आदि को डूबा देगा और हमें संसारात बना देगा। बहिर्मुखता सर्वनाश करने वाली है, इससे सर्वथा बचना चाहिए। पुष्टि प्रभु का भजन कभी भी लौकिक कामना की पूर्ति के लिए नहीं करना चाहिए। समर्पण में अहंकार भी महान बाधक है, इसमें दीनता की आवश्यकता होती है। श्रीमहाप्रभुजी सर्व निर्णय में यह आज्ञा करते हैं कि जगत की हर जड़ चेतन वस्तु रचनात्मक है। सभी वस्तुओं में भगवत् बुद्धि रखनी चाहिए। इस प्रकार से करने पर मन में सहज ही दीन भावना आ जाती है। कोई अपमान भी करे तब भी पुष्टि भक्त अहंकार नहीं करता है, उसके मन में मान पाने की अपेक्षा नहीं रहती।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
उपसंहार: पुष्टिभक्ति मार्ग के सनातन सिद्धांत
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
वैदिक धर्म और सिद्धांत सनातन है। उसी प्रकार श्रीमहाप्रभुजी द्वारा प्रकट किया गया पुष्टिभक्ति मार्ग और उसके सिद्धांत किसी काल, स्थान अथवा व्यक्ति से अप्रभावित रहते हुए सदा सनातन हैं। श्री आचार्य चरण के हृदय का भार को न समझने के कारण ऐसी भ्रांति उत्पन्न हुई कि प्रत्येक पुष्टिभक्ति, प्रत्येक पुष्टि मार्ग के लिए ब्रह्मसंबंध देना आवश्यक है तथा जागे मंदिर में दर्शन भेंट करना और प्रसाद लेना आवश्यक है। इन मंदिरों में होने वाली दर्शन, भेंट, प्रसादात्मक त्रिविध भक्ति पुष्टि भक्ति नहीं है। जिन्हें श्रीमहाप्रभुजी की वाणी में श्रद्धा है उनके लिए दर्शन के स्थान पर विवेक, भेंट के स्थान पर धैर्य और विकृत प्रसाद लेने की भक्ति के स्थान पर आश्रय इन सिद्धांतों को शुद्ध उपदेश देना अथवा समझाना प्रत्येक पुष्टिमार्गीय जीव का पवित्र कर्तव्य है। पुष्टिमार्ग की प्रतिबद्धता केवल श्रीमहाप्रभुजी द्वारा प्रकट किए गए सिद्धांतों के साथ है और वह सर्वकाल में शाश्वत रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। श्रीमहाप्रभुजी ने ब्रह्मसंबंध मंत्र दिया है जिसमें शरणागति, समर्पण, सेवा और भक्ति सब कुछ आ जाता है। अपनी शरणागति रूपी बीज के समर्पण के अंकुर फूटेंगे, सेवा से पल्लवित होंगे और भक्ति फलित होगी। 'हे कृष्ण मैं आपका हूं' और एक दिन प्रभु हमें जरूर कहेंगे 'तुम मेरे हो और मैं तेरा'। अंत में स्तोत्र पाठ किया गया: 'जय जय श्री वल्लभ प्रभु श्री विट्ठले साथे निज जन पर करत कृपा करत हाथ माते रसिका रसिक चरण शरण सदा रहत है बढ़ भागी जन अपनो कर गोकुलपति भरत ताहि' और 'बुद्धि प्रेरक कृष्णस्य पाद पदम मम प्रतीत ध्यान समर्थ जीवा नाम अस्माकम सर्वदा', 'विट्ठले विठ्ठले मर विट्ठल म विठ्ठलेश सदा श्री कृष्ण'।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
चर्चा: सिद्धांत का वर्तमान स्वरूप - समस्या एवं समाधान का विवेक-धैर्य से संबंध
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने स्पष्ट किया कि `अनुकृति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा` के संबंध में यह विषय लिया गया है, और इसका सीधा संबंध इस विषय से नहीं है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
चर्चा: त्रिविध दुखों में 'धर्म' का स्थान (काल, कर्म, स्वभाव)
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(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
(कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
वक्ता विवेचन
- प्रश्न: प्रतिभागी ने त्रिख सहन धैर्य के तीन प्रकार के दुखों में 'काल, धर्म, स्वभाव' बताया था। वक्ता ने जिज्ञासा व्यक्त की कि 'धर्म' विवक्षित है या धर्म के स्थान पर 'कर्म' विवक्षित है, और यदि धर्म ही है तो उसका प्रकार किस प्रकार को जिज्ञासा है।
- उत्तर: प्रतिभागी ने धर्म के भेद अर्थात हमारा जो धर्म है, यदि धर्म करते समय ऐसा कुछ हो जिसके कारण हमें दुख हो तो उस प्रकार से समझाया। जैसे बीमार होने पर शरीर औषध करता है और बुखार या इंफेक्शन से फाइट करने के लिए हम बीमार होते हैं, वो बॉडी के सिम्टम शो करने का साइन है।
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने स्पष्ट किया कि धर्म करने से दुख कैसे होगा, यह बात उतनी स्पष्ट नहीं हो पाएगी। उन्होंने कहा कि 'काल, कर्म, स्वभाव' होना चाहिए, धर्म के स्थान पर कर्म लिखना चाहिए था।
चर्चा: भगवत्कृपा और भगवत् इच्छा में अंतर
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
(कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
वक्ता विवेचन
- प्रश्न: प्रतिभागी ने प्रश्न किया कि जीव की इच्छा भगवान पूरी करें या भगवान कर पाएं तो किस प्रकार से भगवत्कृपा लौकिक या अलौकिक इच्छा में होती है, जैसे किसी को भगवत् सेवा की इच्छा हो तो ऐसी प्रकार की जो इच्छा है।
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने कहा कि एक वाक्य 'इन सभी बातों की एक वाक्यता करें तो सार यह निकलता है कि भक्ति प्रभुजी सुल्तान में न होने भगवत उपयोगी पदार्थों का समर्पण अपने समर्थ के अनुसार करना चाहिए' इसमें कॉपी पेस्ट में आगे पीछे हो गया है, इसे विचाराधीन रखना चाहिए।
चर्चा: ग्रंथ संगति और साधना प्रणाली में विवेक, धैर्य, आश्रय की भूमिका
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
(कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
वक्ता विवेचन
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने कहा कि विषय को ग्रंथ की तरह नहीं, बल्कि विषय की तरह सोचना चाहिए। हमें विवेक और धैर्य की आवश्यकता अपनी साधना प्रणाली में कहां-कहां और कैसे पड़ती है, इस प्रश्न के उत्तर के रूप में इस आलेख को लिखना है। हमारी परिभाषाएं ठीक हैं, पर साधनों में और साधन में उत्पन्न होने वाले प्रतिबंध, विक्षेप या साधन का फलावस्था पर्यंत का ट्रांजिशन – इस पूरी प्रोसेस में विवेक और धैर्य की कहां-कहां हमें अपेक्षा है। किन स्वरूपों में श्रीमहाप्रभुजी ने वहां नाम सही, परंतु कंसेप्चुअली विवेक धारण करना, धैर्य धारण करना, आश्रय को बनाए रखना – ये सभी जो उपदेश दिए हैं, उन सभी को हमें यहां कंसीडर करना है। जैसे विक्षेप अथवा अशक्ति जो साधन प्रकरण में श्रीमहाप्रभुजी आज्ञा कर रहे हैं, वहां भी तो जो व्यक्ति सेवा का त्याग करेगा, इन सरकमस्टेंसेज़ या अनुकल्प के सर्जनों का चयन करेगा या भागवत परायण हो जाएगा, सर्वत्र विवेक धैर्य और आश्रय तो चाहिए ही।
- वक्ता का निष्कर्ष: इसे टॉपिक की तरह सोचकर, ग्रंथ की तरह नहीं, विषय की तरह कि विवेक और धैर्य की आवश्यकता हमें अपनी साधना प्रणाली में कहां-कहां और कैसे पड़ती है, इस प्रश्न के उत्तर के रूप में इस आलेख को हमें लिखना है।
चर्चा: धर्म का अर्थ - अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा का दृष्टांत
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
(कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
वक्ता विवेचन
- प्रश्न: वक्ता ने उपक्रम में धर्म की परिभाषा, अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा के बारे में पूछा कि यह क्या होता है और इसे श्रीमहाप्रभुजी धर्म के रूप में कैसे समझाते हैं, तथा धर्म का उपक्रम विवेक और धैर्य के साथ किस प्रकार जुड़ता है।
- उत्तर: प्रतिभागी ने बताया कि यह षोडशग्रन्थ के चार प्रकारों के बेस बनाने के लिए लिया गया विषय है, इसका कोई सीधा संबंध नहीं है। अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा का उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे सूर्य उगने की अनुभूति होती है, फिर श्रद्धा होती है कि यह एक-दो दिन होगा, उसके पश्चात धीरे-धीरे विश्वास होता है और जब यह पता चल जाता है कि रोज यह होना चाहिए, तब निष्ठा होती है।
आश्रय का उपक्रम एवं उसका महत्व
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
आश्रय पुष्टिभक्ति का आवश्यक होने पर भी, केवल पुष्टिभक्ति ही नहीं अपितु कर्म, ज्ञान, भक्ति सभी मार्गों का अनुकल्प है। भगवान ने गीता जी में अंत में 'सर्व धर्म परित्यज मामकम शरणम प्रजाज' ऐसा महान उपदेश द्वारा एक प्रथम शरण मार्ग के रूप में इसी आश्रय को समझाया है। भागवत के एकादश स्कंध में भी इसका स्पष्टीकरण मिलता है कि श्रुति स्मृति में उत्सर्ग अपवाद के रूप में कहे गए विधि विशेष और तत्प्रेरित विविध कर्मों में प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा विविध ज्ञान मार्गीय श्रोतव्य, श्रुत विषयों के श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि किसी भी प्रणाली की अपेक्षा रखे बिना केवल एकमात्र भगवान की शरण में सर्वात्म भाव के साथ जाना चाहिए। विवेकश्रय ग्रंथ में आश्रय का पृथक शरण मार्ग का विवेचन ऐसा अभिष्ट है। 'आश्रयम सर्वे सर्वदा हितम फलो भक्त मार्ग ही' इसका अर्थ है कि इसी तरह आश्रय सभी के लिए सर्वदा हितकारी सिद्ध होता है, क्योंकि कलियुग में भक्ति आदि मार्ग कठिन हो गए हैं। कर्म, ज्ञान या भक्ति के मार्ग पर चल सकने वाले जीवों के लिए विवेक धैर्य आश्रय अच्छी तरह चल पाने में संबल बन जाते हैं। जो इन मार्गों पर चल नहीं पाते, उनके लिए आश्रय ही मार्ग भी बन जाता है और चल पाने के बल भी।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
आश्रय का स्वरूप: क्रिया और आश्रयदाता
पाठ
अह्य पारलोक्य सर्वथा शरणम हरी
प्रतिभागी वाचन
आश्रय शब्द को दो अर्थ से समझ सकते हैं: पहला, आश्रय लेने की क्रिया (उदाहरण के लिए, यदि कोई डूबता हुआ आदमी बचने के लिए लकड़ी पकड़ता है तो हम कहते हैं कि उसने लकड़ी का आश्रय लिया), और दूसरा, जिसका आश्रय लिया जाता है वह व्यक्ति या वस्तु (उपरोक्त उदाहरण से ही लकड़ी को आश्रय भी कहा जा सकता है)। श्रीमहाप्रभुजी आश्रय को षोडशग्रन्थ में इस तरह से समझाते हैं कि लौकिक, परलौकिक संबंधी या भक्ति संबंधी अशक्य और शक्य हर परिस्थिति में एकमात्र श्रीकृष्ण ही मेरे रक्षक और आधार हैं, ऐसा सर्वदा सर्व प्रकार से मन में रखे जाने वाले इस भाव को पुष्टिभक्ति मार्ग में आश्रय कहा जाता है। इस आश्रय का स्वरूप बताते हुए श्रीमहाप्रभुजी निवेद आश्रय ग्रंथ का है कि 'अह्य पारलोक्य सर्वथा शरणम हरी' यानी ऐहिक, पारलौकिक सभी बातों में सर्वथा एकमात्र श्री हरि का ही सहारा स्वीकारना आश्रय कहलाता है। चाहे कोई भी परिस्थिति हमारे सामने आ पड़े— पाप की, भय की, अपूर्ण कामनाओं की, भक्तों की भक्ति अभाव की या भक्तों के तिरस्कृत होने की — सभी परिस्थितियों में भगवत् शरण भावना एक कारगर उपाय है। जब किसी अशक्य कार्य को संपन्न करने का उत्तरदायित्व हम पर आ पड़ता है तब उद्वेग, आशंका एवं कुंठा के कारण हम भगवान को भूल जाते हैं। जब कोई सुशक्य कार्य को संपन्न करने का उत्तरदायित्व हम पर आ पड़ता है तब सफलता की आशा, उत्साह और अहंता के कारण हम भगवान को भूल जाते हैं। तो कार्य चाहे अशक्य हो या सुशक्य, भगवान की शरण भावना सर्वदा मन, वाणी पर बनी रहनी चाहिए। हमारा अहंकार जब प्रबल हो रहा हो या तो हमारा जो आश्रित हो उनके रक्षण पोषण के समय अथवा हम पर आश्रित व्यक्ति या संबंधी जब हमारे अहम को ठेस पहुंचा रहे हों अथवा हमारे शिष्य भी जब हमारा तिरस्कार कर रहे हों, तब शरण भावना को बनाए रखना बहुत आवश्यक होता है। मानसिक सेवा, निरोध या सर्वात्म भाव के अनुभव योग्य अलौकिक पद की असिद्धि के लिए भी एकमात्र श्री हरि ही हमारी शरण होते हैं।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
भगवत् आश्रय की सिद्धि के उपाय (विवेक धैर्य आश्रय के अनुसार)
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
- सभी परिस्थितियों में आश्रय भाव की मानसिक और वांछित भावना: हमारे जीवन में अनेक प्रकार की परिस्थितियां सामने आती हैं, जिनमें हम विचलित हो जाते हैं। उन सारी परिस्थितियों में यदि हमारे मन और वाणी में हम शरण भावना बनाए रखें तो आश्रय ग्रहण हो जाता है। जीवन में अनेक आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक कष्ट आते हैं। ऐसे समय बहुधा हम विवेक और धैर्य निभा नहीं पाते। पर मन और वाणी में यदि शरण भावना बनाए रखने में सफल हो पाएं तो आश्रय दृढ़ हो जाता है। ऐसे मन, वाणी से निरंतर अष्टाक्षर मंत्र का अनुसंधान बनाए रखना चाहिए। यह आश्रय को दृढ़ करने का प्रथम उपाय है।
- काया, वाणी और मन से अन्याश्रय का त्याग: श्रुति में नित्य कर्म के रूप में विहित न हो तब भी किसी अन्य देवी देवती का स्वतः चलकर निष्काम या सकाम भजन करना अन्याश्रय कहा गया है। कहीं जाते समय अगर मार्ग में किसी अन्य देवी का मंदिर मिल जाए तो दूसरी बात है, अन्यथा स्वयं अपनी ओर से चलकर किसी अन्य देव के दर्शनार्थ उनके मंदिर में जाना अन्याश्रय है। भगवत् गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आज्ञा करते हैं कि जो लोग दूसरों का भजन करते हैं, वे भी अंततः मेरा ही भजन करते हैं, परंतु उनकी पद्धति सही नहीं है। यदि मार्ग में जाते हुए अन्य देवता मंदिर मिल जाए तो नमन द्वारा आदरभाव प्रकट करना अन्याश्रय नहीं है। किसी लौकिक या अलौकिक प्रयोजनवश किसी अन्य देवता की प्रार्थना करना अन्याश्रय है। यहां अन्य देव का अर्थ है कि भगवान के ऐसे देव हों कि जिनको पुष्टिमार्ग या सेवा प्रणाली में मान्य नहीं किया गया है। ऐसे अन्याश्रय के त्याग करने से भी आश्रय दृढ़ हो जाता है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
दृढ़ प्रभु में दृढ़ विश्वास रखना एवं अविश्वास का त्याग
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
भगवान पर अविश्वास कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह सर्वथा बालक है। भगवान पर दृढ़ विश्वास रखना चाहिए और अविश्वास का त्याग करना चाहिए। यह आश्रय को दृढ़ करने का तीसरा उपाय है। हमारी भक्ति में मन के विपरीत होने पर भी हमें भगवान को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि 'स्वामी सर्व करिशति'। अविश्वास से शंका उत्पन्न होती है। श्रीमहाप्रभुजी भगवद् गीता के श्लोक में समझाते हैं कि शंकालु का न यह लोक होता है और न परलोक। शंका के निवारण के लिए शास्त्र का आधार लेना, सद्गुरु का आश्रय लेना, भगवद्वार्ता का श्रवण करना और सत्संग करना आवश्यक है। ज्ञान से संशय और अहंकार समाप्त होते हैं।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
समर्पण में अहंकार का त्याग
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
प्रारंभ में अपनी अहंता का त्याग करना आवश्यक है। अपनी ओर से कोई भी प्रयत्न न करके अहंता का त्याग करना चाहिए। भगवान का स्वरूप सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ है, हमें अपने आपको अशक्त मानना चाहिए। भगवान के लिए कोई वस्तु अशक्य नहीं है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
आश्रय की प्राप्ति के अन्य उपाय
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
भगवत् आश्रय की प्राप्ति के लिए 'अनुकूलस्य संकल्प' (भगवान के अनुकूल संकल्प करना) और 'प्रातिकूलस्य वर्जन' (प्रतिकूल का त्याग) आवश्यक हैं। सर्वथा भगवदीय कार्य करना ही आश्रय है। आश्रय सभी के लिए हितकर है। यह भक्ति की तरह फल रूप नहीं है, परंतु भक्ति का कारण है। भक्ति में हमें सदा सावधान रहना चाहिए।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
आश्रय में गुरु की भूमिका
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
अभिषेक के द्वारा भगवत् प्रेम बढ़ता है। नामस्मरण से हृदय शुद्ध होता है, श्रद्धा बढ़ती है और मन स्थिर रहता है। गुरु की आज्ञा से सदा उनके स्वरूप का स्मरण करना चाहिए। गुरु के वचन पर विश्वास रखना चाहिए। गुरु भगवत् स्वरूप ही हैं।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
आश्रय में समर्पण की आवश्यकता
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
अभिमान का त्याग आवश्यक है। भगवत् कृपा से अहंता का त्याग होता है। संपूर्ण समर्पण की भावना पुष्टिभक्ति में आवश्यक है। श्री आचार्य जी ने पुष्टिभक्ति को साधन रूप नहीं, बल्कि फल रूप बताया है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
सारांश: विवेक, धैर्य और आश्रय की परस्पर संगति
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
ज्ञान और भक्ति का अहम् भी भगवत् आश्रय से सिद्ध होता है। विवेक, धैर्य और आश्रय एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, एक के बिना दूसरा संभव नहीं है। भगवान ही हमारे रक्षक हैं, ऐसा ज्ञान विवेक है। इसे धारण करने का बल धैर्य है, और इसे स्थिर रखना आश्रय है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
विवेक, धैर्य और आश्रय का महत्व
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
अज्ञान, अशक्ति, भय, द्वेष, लोभ, मोह, काम, क्रोध जैसे विकारों को विवेक, धैर्य और आश्रय से दूर कर सकते हैं। यह पुष्टिभक्ति को प्राप्त करने में सहायक है और सांसारिक सुखों से विरक्ति प्रदान करता है, जिससे संतोष और आनंद की प्राप्ति होती है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
अष्टाक्षर मंत्र और उसकी महिमा
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
मन, वाणी से निरंतर अष्टाक्षर मंत्र का अनुसंधान करना चाहिए। अष्टाक्षर मंत्र में नामस्मरण, सेवा, समर्पण सब समाहित है। यह भगवान पर विश्वास और समर्पण बढ़ाता है।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
समापन: पुष्टिभक्ति मार्ग का निष्कर्ष
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
पुष्टिभक्ति मार्ग साधन नहीं, फल है। श्रीमहाप्रभुजी ने इसका उपदेश किया है। शरणागति, सेवा, समर्पण, भक्ति सब ब्रह्मसंबंध मंत्र में आ जाता है। 'हे कृष्ण मैं आपका हूं' यही पुष्टि जीव का मुख्य भाव है। एक दिन प्रभु हमें जरूर कहेंगे 'तुम मेरे हो और मैं तेरा'।
वक्ता विवेचन
(कोई अतिरिक्त विवेचन नहीं)
चर्चा: श्रीनाथजी की सेवा और स्व-पर भेद
पाठ
(कोई विशिष्ट श्लोक संख्या नहीं)
प्रतिभागी वाचन
प्रतिभागी ने स्पष्ट किया कि श्रीमहाप्रभुजी ने नवधा भक्ति में सेवा को फल रूप बताया है, और सेवा करने का अधिकारी बनने के लिए भगवत्कृपा चाहिए। घर में भगवान की सेवा को 'स्वका' कहते हैं।
वक्ता विवेचन
- प्रश्न: वक्ता ने पूछा कि सिद्धांत मुक्तावली में सेवा के बाहरी अंग का उपदेश और सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में आंतरिक अंगों का निरूपण, ये दोनों 'स्वका' हैं या नहीं, और यदि 'स्वका' हैं तो श्रीनाथजी की सेवा 'परका' कैसे हो सकती है? उन्होंने स्पष्ट किया कि जो अपने घर में करते हैं वह 'स्वका' है, जो मंदिर में करते हैं वह 'परका' है — पुष्टिमार्ग में ऐसे स्व-पर का भेद है या नहीं?
- उत्तर: प्रतिभागी ने कहा कि श्रीनाथजी की सेवा 'स्वका' नहीं है, परंतु प्रभु की इच्छा से होती है।
- वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने समझाया कि 'सेवोपयोगी देह' होना चाहिए। प्रभु अपने लिए सेवा स्वीकार करते हैं। पुष्टिमार्ग में 'स्व-पर' का भेद है, और मंदिर की सेवा 'परका' होती है। 'स्वका' सेवा प्रभु स्वयं मांगते हैं। उन्होंने 'विप्रयोग अवस्था में गुणगान' पर भी चर्चा की, जैसे अष्टछापकार करते थे। वक्ता ने कहा कि जो प्रभु का प्रकट सुख का अनुभव कर रहा है, वह अलौकिक सामर्थ्य का अनुभव है, फल का आस्वादन कर रहा है, और भक्ति का ही अधिकारी है। उन्होंने 'चेत् प्रव सेवा' का उल्लेख किया। वक्ता ने धनराज जी और श्रीनाथ जी के प्रकट होने का उदाहरण दिया, जहां 'स्व-पर' का भेद नहीं था, क्योंकि वे सर्वार्थ में प्रकट हुए थे। वक्ता ने स्पष्ट किया कि प्रथम कल्प में 'उपलब्धि स्वयं' होनी चाहिए। यदि घर नहीं है या स्थान भगवत् सेवा के अनुरूप नहीं है, ऐसी स्थिति में अप्रकट सेवा, कथा, कीर्तन आदि पर 'अनुकल्प' के रूप में विचार किया जा सकता है। गुणगान को सेवा का अंग माना जा सकता है। गुणगान 'विप्रयोग रूप की भावना' है, जहां सेवा या परिचर्या का कोई अवसर नहीं है। उन्होंने साधन दीपिका और भक्ति वर्ग के पंच अधिकारियों का उल्लेख करते हुए 'व्यावृत्त' जीव को भगवत्सेवा परायण होने की बात कही, और अष्टछापकार को गुरु के अंत्यावसी के रूप में समझने का सुझाव दिया।