श्लोक ३७ : ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर एवं षोढा विभाग विचार
श्लोक ३७ के सन्दर्भ में श्रीसुबोधिनीजी और पुरुषोत्तमजी की टिप्पणी के अनुसार ब्रह्म, परमात्मा और ईश्वर के स्वरूपगत भेदों का स्पष्टीकरण किया गया। जगत के प्रपञ्च का आधार ब्रह्म, जीवात्माओं के वैविध्य का आश्रय परमात्मा तथा ऐश्वर्य आदि गुणों के नियामक ईश्वर हैं। काल, कर्म, स्वभाव, प्रकृति और पुरुष की नियामकता के आधार पर छह तत्त्वों के समन्वय का निरूपण किया गया है।
श्लोक ३७ : अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख जीवों पर काल का प्रभाव
काल के स्वरूप का विवेचन करते हुए बताया गया कि काल भीतर और बाहर दोनों ओर विद्यमान है। जो जीव अन्तर्मुख होकर भगवद्स्वरूप का चिन्तन करते हैं, उनके लिए काल अभयप्रद एवं सच्चिदानन्द रूप का अनुभव कराने वाला है। इसके विपरीत जो बहिर्मुख होकर सांसारिक प्रपञ्च में आसक्त रहते हैं, उन्हें काल ग्रस लेता है और मृत्यु का निरन्तर भय बना रहता है।
श्लोक ३८ : काल का आधिदैविक स्वरूप एवं यज्ञपति विष्णु
श्लोक ३८ के अन्तर्गत काल के आधिदैविक स्वरूप और विष्णु रूप का विवेचन किया गया। श्रुति के अनुसार यज्ञ के अधिपति और फलदाता विष्णु ही काल रूप से सर्वत्र व्याप्त हैं। काल सभी प्राणियों के भीतर प्रवेश करके प्रेरणा देता है और उनकी आयु की गणना करता हुआ समस्त चराचर जगत का आधार बनता है।
श्लोक ३९-४० : काल की क्रियाशक्ति और समस्त भूतों में व्याप्ति
भगवान की क्रियाशक्ति काल के रूप में जगत के प्रत्येक कार्य को संचालित करती है। काल अदृश्य रहकर भी प्राणियों के कर्म और ज्ञान के अनुसार उन्हें चेष्टा प्रदान करता है। ब्रह्माजी से लेकर सूक्ष्म कीट पर्यन्त सभी भूत काल के वशीभूत होकर अपने-अपने नियत कार्यों में प्रवृत्त रहते हैं।
श्लोक ४१-४२ : ईश्वर के भय से प्रकृति और देवताओं की चेष्टा
ईश्वर के काल रूप के भय से ही सूर्य तपता है, पवन बहता है, इन्द्र वर्षा करते हैं और अग्नि प्रज्वलित होती है। समस्त लोकपाल और देवता अपने-अपने पदों पर रहकर काल के नियमन में सृजन, पालन और संहार का कार्य सम्पन्न करते हैं। यह काल वास्तव में भगवान का ही सामर्थ्य रूप है।
श्लोक ४३-४५ : काल की अव्ययता, सृष्टि-प्रलय का क्रम एवं अध्याय सार
काल स्वयं अव्यय रहकर जगत के समस्त कार्यों की उत्पत्ति और लय का सम्पादन करता है। जैसे बीज स्वयं विनष्ट होकर अंकुर उत्पन्न करता है, वैसे काल स्वयं नष्ट हुए बिना सृष्टि और प्रलय का चक्र चलाता रहता है। भगवान श्री कृष्ण ही समस्त कालदोषों के निवारक हैं, जिनका आश्रय लेने से जीव निर्भय हो जाता है।