श्लोक १६-१७ : मृत्युकालीन शारीरिक व्यथा एवं लौकिक व्यवहार
तृतीय स्कन्ध के तीसवें अध्याय के श्लोक १६ एवं १७ में आसन्नमृत्यु जीव की अवस्था का निरूपण किया गया है। कफ से श्वासमार्ग अवरुद्ध होने, नेत्र विस्फारित होने तथा कण्ठ में घरघराहट की ध्वनि होने से जीव को होने वाले दारुण कष्ट का वर्णन है। शय्या पर पड़े हुए सम्बन्धी जनों के मध्य अचेत पड़े जीव के प्रति केवल लौकिक व्यवहार रह जाता है, कोई वास्तविक आत्मिक शोक नहीं करता।
श्लोक १७-१८ : बान्धवों का व्यवहार और अठारह विद्याओं की व्यर्थता
यहाँ कुटुम्बियों के लौकिक अनुकरण का विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार मृत्यु के समय सम्बन्धी केवल औपचारिकता निभाते हैं। जीव ने जीवन भर जिस शरीर और परिवार का पोषण किया, वे अन्त समय में किसी काम नहीं आते। यदि इन्द्रियों पर विजय प्राप्त न की गई हो और भगवन्नाम का स्मरण या श्रवण न हुआ हो, तो अर्जित सभी अठारह विद्याएँ निरर्थक सिद्ध होती हैं।
श्लोक १९-२० : यमदूतों का आगमन एवं यातना-देह की प्राप्ति
श्लोक १९ और २० में मृत्यु के समय दो भयानक यमदूतों के उपस्थित होने और भयवश मल-मूत्र त्याग करते हुए प्राणोत्क्रमण का वर्णन है। स्थूल शरीर को छोड़ते ही जीव को यातना भोगने के लिए तत्काल यातना-देह प्राप्त होती है। जैसे राजा के सैनिक अपराधी को बन्धन में डालकर ले जाते हैं, वैसे ही यमदूत गले में पाश बाँधकर जीव को मार्ग में खींचते हुए ले जाते हैं।
श्लोक २१-२३ : यममार्ग के कष्ट और असह्य ताड़ना
यममार्ग पर चलते हुए जीव को होने वाली असहनीय क्षुधा, तृषा, तप्त बालू पर चलने का ताप और यमदूतों के कोड़ों की मार का निरूपण है। मार्ग में कुत्तों द्वारा नोचे जाने और जलरहित निर्जन वन में बारम्बार मूर्च्छित होकर गिरने की अवस्था समझाई गई है। पापी जीव अपने पूर्वकृत पापों का स्मरण करते हुए भय और कातरता से क्रन्दन करता है।
श्लोक २४-२८ : सात्त्विक, राजस और तामस पापों का नरक-विपाक
यहाँ जीवों द्वारा किए गए कर्मों के अनुसार सात्त्विक, राजस और तामस पापों के फलस्वरुप मिलने वाले कष्टों का विभाजन किया गया है। तामिस्र, अन्धतामिस्र और रौरव आदि नरकों में जीव को अपने द्वारा किए गए पापों के अनुरूप यातनाएँ दी जाती हैं। जिन प्राणियों को उसने सताया था, वे ही प्राणी नरक में उसे विविध रूपों में पीड़ा पहुँचाते हैं।
श्लोक २९-३० : इहलोक में नरक-दर्शन एवं केवल देह-पोषण का परिणाम
श्लोक २९ और ३० में स्पष्ट किया गया है कि नरक और स्वर्ग के फल का प्रत्यक्ष दृष्टान्त इस लोक में भी देखा जा सकता है, जैसे राजा द्वारा दुष्टों को दण्ड देना। जो व्यक्ति केवल अपने उदर-पोषण और कुटुम्ब के भरण-पोषण में लगा रहा, वह अन्त में दोनों को यहीं छोड़कर अकेला ही पापों का फल भोगने के लिए नरक में जाता है।