श्लोक ३९ की उत्थानिका — मन को स्थिर करने हेतु भगवन्माहात्म्य का आधार
सत्र का आरम्भ मंगलाचरण और श्लोक ३९ तथा ४० के पाठ से होता है। वक्ता ने ३८वें श्लोक में कल्कि अवतार और सत्ययुग के आरंभ की चर्चा का स्मरण कराया। श्लोक ३९ की उत्थानिका में श्रीरमाना शास्त्री के आभासार्थ के अनुसार `तत् सृष्ट्वा तद् अनु प्राविशत्` और `यस्य पृथ्वी शरीरम्` जैसी श्रुतियों के माध्यम से अंतर्यामी पुरुषोत्तम पदार्थ की सर्वव्यापकता का विचार प्रस्तुत किया गया। यह अध्याय विवरणाध्याय है, जिसमें अंतर्यामी का पदश विचार किया गया है। सुबोधिनी जी के अनुसार, मन को भगवान में स्थिर करने के लिए उनके महात्म्य का ज्ञान ही एकमात्र उपाय है।
श्लोक ३९ — सृष्टि व पालन में भगवत्स्वरूपों का वर्णन
इस खण्ड में श्लोक ३९ के विवरण का आरम्भ होता है। वक्ता ने बताया कि महान (भगवान) अपने गुणधर्मों और काल के भेद से नाना प्रकार का होता रहता है, इसलिए ध्यान में एक रूप से स्थिर नहीं होता। सृष्टि की रचना हेतु भगवान अनेक रूप धारण करते हैं, जैसे तपस्या में ब्रह्मा और नौ प्रजापति मरीचि आदि ऋषिगण। यह तप सात्विक, ब्रह्मा राजस प्रधान और ऋषिगण तम प्रधान माने गए हैं। महाप्रभुजी ने चतुर्मूर्ति (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) की व्यवस्था को भी समझाया कि कैसे वे जगत की सृष्टि और व्यवस्था करते हैं, जिसमें प्रद्युम्न ब्रह्मा का, संकर्षण प्रजापति का और अनिरुद्ध वेद का कार्य करते हैं।
श्लोक ३९ — पालन में मनु, देव, राजा व मन की चंचलता
इस भाग में `नारायण परा वेदाः` श्लोक का सन्दर्भ देते हुए बताया गया कि वेद स्वरूप भगवान को धर्म और मख शब्द से ग्रहण किया गया है। पालन अवस्था में भगवान धर्म, यज्ञ, मनु, देवगण और राजा के रूप में स्थित होते हैं। प्रतिभागियों के प्रश्नों के समाधान में वक्ता ने समझाया कि महान भगवान को चंचल मन कैसे धारण करे और `शुद्ध को घबराहट` का अर्थ क्या है – शुद्ध जीव जब भगवान के स्वरूप को भलीभाँति नहीं समझ पाता तो उसे अपराधबोध होता है। `निरगल` मन का अर्थ बेकाबू और असंयमित मन बताया गया। साथ ही, भगवान के नाना रूपों को उनकी आवश्यकतानुसार बदलते रहने की लीला के रूप में समझाया गया।
श्लोक ३९ — संहार में भगवद्विभूतियाँ और माया का स्वरूप
इस खण्ड में संहार अवस्था में भगवान की विभूतियों का निरूपण किया गया है। संहार में अधर्म, महादेव (दक्ष यज्ञ प्रसंग में यज्ञ के प्रतिपक्ष), मनु (मनुष्य) के प्रतिपक्षी सर्प आदि, असुर और चोर-हिंसक जंतु-व्याघ्र आदि राजाओं के प्रतिपक्षी, ये सभी भगवान की विभूतियाँ हैं। `तु` शब्द का प्रयोग संहार की बात को अनादर सूचक रूप में दर्शाता है, क्योंकि यह सृष्टि व पालन के समान मुख्य नहीं है। भगवान एक ही होते हुए भी अनेक रूपों को धारण कर लेते हैं, जिसका समाधान `माया विभूतयः` पद से किया गया। महाप्रभुजी के अनुसार `माया विभूतयः` के चार पक्ष हो सकते हैं – माया के लिए विभूति, माया में विभूति, माया की विभूति, या माया से विभूति। इन विभिन्न पक्षों को भगवान और माया के विविध संबंधों द्वारा समझाया गया है।
श्लोक ३९ — भगवत्शक्तियाँ, सर्वभवनसामर्थ्य और कार्यों का नियमन
इस भाग में भगवान की नित्य लीला में माया की भूमिका को समझाया गया, जहाँ माया भगवान की सेवा के लिए उत्तम सामग्री उपस्थित करती है। वक्ता ने इस प्रश्न का समाधान किया कि जब भगवान की विभूतियाँ प्रत्येक कार्य में मौजूद रहती हैं, तो माया का कार्य क्या शेष रहता है। `पुरुषशक्तिभाजः` पद के अनुसार भगवान के पास अनेक शक्तियाँ सर्वदा रहती हैं, और माया उनकी सर्वप्रधान शक्ति है, जो सर्वभवनसामर्थ्य से युक्त है। संहार और सृष्टि दोनों ही कार्यों में एक दूसरे की सामग्रियाँ विद्यमान रहती हैं। यह भी समझाया गया कि सृष्टि, स्थिति और संहार जैसे कार्य एक ही समय में नहीं हो सकते, बल्कि नियामक विभूतियों द्वारा नियमित रूप से चलते रहते हैं, क्योंकि भगवत्-रूपों की शक्तियाँ नियत हैं। सत्र का समापन श्लोक ३९ की विस्तृत चर्चा के साथ होता है, जिसमें माया की मोहिका शक्ति पर भी संक्षिप्त प्रश्नोत्तर हुए।