मंगलाचरण एवं श्लोक ४० का परिचय
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण और श्रीमहाप्रभुजी के वचनों के स्मरण के साथ हुआ। वक्ता ने पिछले सत्र (श्लोक ३९) का संक्षिप्त स्मरण कराया, जहाँ भगवान की अनंत शक्ति और माया की विभूतियों के कार्य पर विचार हुआ था। इसके पश्चात् श्लोक ४० के आभासार्थ का पाठ किया गया, जिसमें भगवान के प्रतिक्षण नाना रूप धारण करने के कारण एक ही धारणा का स्थिर न रह पाना और पूर्वोक्त विभूतियों की धारणा को भी भगवत्धारणा ही मानना जैसे विषय प्रस्तुत हुए। प्रतिभागी ने यह प्रश्न उठाया कि आभासार्थ में आया यह वाक्य मूल उत्थानिका में नहीं है, जिस पर वक्ता ने स्पष्टीकरण दिया।
श्लोक ४० — ब्रह्मा की सामर्थ्य एवं भगवद्ज्ञान की सीमा
श्लोक ४० का पाठ 'विष्णु वीर्य गणना कतम अरहति' से आरम्भ हुआ। वक्ता ने 'कतम' में निहित 'तमप' प्रत्यय का अर्थ 'सुपरलेटिव डिग्री' के रूप में समझाया, जो तार्किक योग्यता में ब्रह्मा की श्रेष्ठता को इंगित करता है। यह बताया गया कि ब्रह्मा, जो ब्रह्मांडों के पार्थिव परमाणुओं का ज्ञान रखते हैं, वे भी भगवान के पराक्रम की गणना करने में योग्य नहीं हैं। यहाँ इस बात पर जोर दिया गया कि मन की अस्थिरता और भगवान के प्रति क्षण बदलते रूप धारणा में बाधा डालते हैं। ब्रह्मा की शक्ति के संबंध में अदृष्ट संस्कार वाले परमाणुओं के 'रिसाइक्लिंग' का सिद्धांत भी समझाया गया, जिससे उनकी सीमित सामर्थ्य पर बल दिया गया।
प्रश्नोत्तर — ब्रह्मा की धारणा सामर्थ्य एवं सृष्टि प्रक्रिया
इस खंड में प्रतिभागी द्वारा 'सहाय सामग्री' के अर्थ पर प्रश्न किया गया, जिसका उत्तर एकाग्रता के लिए अनुकूल वातावरण जैसे एकांत, ध्वनि-प्रूफ कमरे आदि के रूप में दिया गया। महाप्रलय और अवान्तर सृष्टि के भेद पर भी चर्चा हुई, जहाँ स्पष्ट किया गया कि ब्रह्मा 'अदृष्ट संस्कार वाले परमाणु' का पुनर्चक्रण करते हैं, नई सृष्टि का पूर्णतः निर्माण नहीं। यह सामर्थ्य भगवान द्वारा प्रदत्त है, परन्तु इस सामर्थ्य के बावजूद ब्रह्मा भगवान के महात्म्य को पूर्णतः जानने में असमर्थ हैं।
श्लोक ४१ — मुनिजनों एवं ब्रह्मा की भगवन्महात्म्य ज्ञान में असमर्थता
श्लोक ४१ का पाठ 'वेदामः मुनयो अग्रजास्त मायाबलस्य पुष्टस कुतो अप्रेय गाथं गुणान् आदिविदेव देवाः पारम्' के साथ आरम्भ हुआ। ब्रह्मा ने स्वयं कहा कि वे, मुनिगण और उनके पुत्र (सनकादिक, मरीचि) भी भगवान के गुणों का अंत नहीं जानते। यहाँ माया के बल को भी भगवान से ही उत्पन्न बताया गया, जिससे भगवान का महात्म्य और भी अधिक सिद्ध होता है। यह स्पष्ट किया गया कि जीव बुद्धि और अव्यवस्थित मन से भगवान के सामर्थ्य को जानना अशक्य है। भगवान के एक गुण, 'विक्रम', का दृष्टान्त वामन अवतार की कथा के माध्यम से समझाया गया, जहाँ उन्होंने त्रिलोकी को अपने चरण से स्थिर किया।
श्लोक ४१ — काल, पुरुषोत्तम और शेषनाग की भगवत्ज्ञान सीमा
काल की भगवद्चेष्टा रूपता और उसकी सीमित सामर्थ्य पर चर्चा हुई, जबकि ब्रह्मा और मुनियों की सामर्थ्य भी भगवान के गुणों को जानने में अक्षम है। पुरुषोत्तम भगवान की अपेक्षा से हम सभी 'अपर' हैं। वेदाभिमानी देवता शेषनाग भी अपने सहस्त्र मुखों से अनादि काल से भगवान के गुणों का गान करते हुए भी उनके गुणों का अंत नहीं पा सके हैं। यह दर्शाया गया कि भगवान के अनंत गुण हैं और एक गुण का भी पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना असंभव है।
श्लोक ४२ — भगवद्दया से ही धारणा की योग्यता
श्लोक ४२ का पाठ 'भगवान् दत्तातमानं पदपद्मो यदि निर्वृणोत्यति तर देवयाम अहं स्वयम् इति गृहीत शृंगारवसे' के साथ हुआ। यहाँ यह प्रश्न उठाया गया कि भगवान का महात्म्य अनंत होने पर उनकी धारणा असंभव है, तो फिर धारणा कैसे होगी? इसका समाधान दिया गया कि निष्कपट रहकर जिन लोगों ने भगवान का चरण आश्रय लिया है, उन पर यदि स्वयं भगवान दया करें, तो वे भक्त दैवी माया को तर जाते हैं। यह दया जीव को कृतार्थ करती है और भगवान की स्वतंत्र इच्छा से प्राप्त होती है।