मङ्गलाचरण एवं पूर्व-सत्र-सूत्र
सत्र का आरम्भ मङ्गलाचरण के पाठ से होता है, जिसमें अन्तः संन्तनहन्तारो, प्रणमामि मुकुट, अज्ञानतिमिरान्धस्य तथा नमामि हृदयसे श्रीलीला आदि श्लोकों का उच्चार हुआ।
वक्ता ने पूर्व-सत्र का स्मरण कराते हुए बताया कि श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध के सप्तम अध्याय में श्लोक ४५ तक का अध्ययन पूर्ण हो चुका है।
उन्होंने समग्र द्वितीय स्कन्ध की संरचना का परिचय दिया: प्रथम स्कन्ध अधिकार-चर्चा है; द्वितीय स्कन्ध में श्रवण, मनन और विमर्श का प्रकरण है।
पञ्चम–षष्ठ–सप्तम अध्याय मिलकर तृतीय प्रकरण का प्रथम खण्ड बनाते हैं: पञ्चम में स्थूल-जड़ सृष्टि, षष्ठ में जीव-सृष्टि और सप्तम में अन्तर्यामी-अवतारों का वर्णन है।
इस पृष्ठभूमि के साथ श्लोक ४६ के अध्ययन का आरम्भ हुआ।
श्लोक ४६ — तामसिक भक्त एवं भगवन्माया-तरण
श्लोक ४६ में स्त्री, शूद्र, गुणजन (भील आदि), शबर और पापजीवी — इन तामसिक वर्गों का नामोल्लेख कर बताया गया कि ये भी भगवान की माया को तर जाते हैं।
वक्ता ने स्पष्ट किया कि इन वर्गों में भी सापेक्ष भेद है: स्त्री सात्विक, शूद्र राजस, गुणजन तामस और शबर उनसे भी अधम — तथापि सभी मुख्यतः तामस ही हैं।
प्रतिभागियों के प्रश्नों पर वक्ता ने 'पापजीवी' शब्द को विस्तार से समझाया: आधुनिक समाज में वर्णाश्रम-विरुद्ध आजीविका करने वाले ब्राह्मण, मिलावटयुक्त व्यापारी, घूस-ग्रस्त शासकीय कर्मचारी और फार्मास्युटिकल-नेक्सस में फँसे चिकित्सक — सभी इस परिभाषा में आते हैं।
वक्ता ने वाल्मीकि जी का दृष्टान्त देते हुए कहा कि जो पाप-जीविका से ही जीते हैं, वे भी भगवत्-भक्त का आश्रय और संग पाने पर माया को तर जाते हैं।
पशु-पक्षियों के उद्धार के प्रसङ्ग में शुक-सारिका के भगवन्नाम-संकीर्तन से उत्तम गति का उल्लेख किया गया, यह प्रसिद्ध है; काकभुशुण्डि और जटायु के दृष्टान्त भी प्रतिभागियों ने प्रस्तुत किये।
वक्ता ने 'अद्भुत पराक्रम परायण' का अर्थ समझाया: सामान्य भगवत्-परायणता सबके लिए सुलभ है, किन्तु निरन्तर एकचित्त रहकर क्षण-भर भी अन्यमन न होना — यह विशेष परायणता दुर्लभ है; ऐसे भक्तों के आचरण का अनुसरण करने से निम्न वर्ग भी माया को तर जाते हैं।
श्लोक ४७–४८ — भगवत्-चरणारविन्द का सच्चिदानन्द-स्वरूप
वक्ता ने बताया कि श्लोक ४७–४८ द्वितीय स्कन्ध, द्वितीय अध्याय के श्लोक १३ के उत्तरार्ध — एक-एक अंश को धारणा द्वारा जीतते हुए आगे बढ़ना — की व्याख्या है।
श्लोक ४७ में प्रभु के चरणारविन्द (अक्षर ब्रह्म) के दस लीला-रूप धर्म गिनाये गये: (१) शाश्वत — काल-अपरिच्छिन्नता, (२) प्रशान्त — सत्त्वादि तीनों गुणों के विकार का सर्वथा अभाव, (३) अभय — सर्व-काल-समष्टि द्वारा भी अपरिच्छेद्यता, (४) प्रतिबोधमात्र — अद्वैत-ज्ञान-स्वरूप अनुभव, (५) शुद्ध — आनन्द-स्वरूप, (६) सम — सत्-स्वरूप; इस प्रकार तीनों मिलकर सच्चिदानन्द-स्वरूप सिद्ध होते हैं।
आगे (७) सदसत्परह — कार्य-कारण से परे; (८) आत्मतत्त्व; (९) शब्द-कारक-क्रियातीतता; (१०) माया-विलज्जना — माया जिसके सामने अति लज्जित होकर दूर चली जाती है।
यह भगवत्-पद चार प्रकार के व्यवहार — प्रपञ्च-रूप, आत्मीय-रूप, शब्द-रूप और शब्दार्थ-रूप — से भी अतीत है, अर्थात् सर्व-व्यवहारातीत है।
श्लोक ४८ में बताया गया कि ब्रह्मवेत्ता यति इस अक्षर ब्रह्म-चरणारविन्द को ग्रहण कर अन्य सभी फल और साधनों का परित्याग कर देते हैं — जैसे मेघराज के आने पर भूमि खोदकर जल निकालने की आवश्यकता नहीं रहती।
प्रश्नोत्तर — चरणारविन्द की व्याख्या पर विचार-विमर्श
प्रतिभागी ने प्रश्न किया कि 'प्रशान्त' में 'प्र' उपसर्ग क्यों आया; वक्ता ने उत्तर दिया कि सत्त्व-गुण को शान्त कहा जा सकता है किन्तु दया (सात्विक गुण-धर्म) प्रकट होने पर शोभ (भावावेग) उत्पन्न होता है, जो विकार है; इसीलिए 'प्र' शब्द जोड़कर दर्शाया गया कि यहाँ सात्विक विकार भी नहीं है।
दूसरे प्रश्न पर — प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का त्रिभेद यदि नहीं है तो अनुभव कैसे होगा — वक्ता ने समझाया कि अक्षर ब्रह्म प्योर अवेयरनेस है; प्रगाढ़ निद्रा में ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय का भेद नहीं रहता, फिर भी अस्तित्व बना रहता है — उसी प्रकार यहाँ केवल आनन्द-रूप अनुभव है।
तीसरे प्रश्न पर 'निषेध-शेष' का अर्थ वक्ता ने स्पष्ट किया: एक-एक करके जितना 'नहीं है, नहीं है' करते जाएँ, उन सब निषेधों के बाद भी जो बचा रहे — वही अक्षर ब्रह्म है; वह इन सबसे भी अधिक और अनन्त है।
चौथे प्रश्न पर — अक्षर ब्रह्म कालातीत कैसे? — वक्ता ने सरलता से कहा: काल ब्रह्म की चेष्टा है; जब ब्रह्म की चेष्टा नहीं, तब काल नहीं; और जब काल नहीं, तब ब्रह्म स्वयं कालातीत हो जाता है; अक्षर ब्रह्म और ब्रह्म एक ही वस्तु हैं।
सत्र इस बिन्दु पर समाप्त हुआ कि 'आत्मतत्त्व' और 'शब्द-कारक-क्रियातीतता' पर विमर्श अगले सत्र में जारी रहेगा।