मंगलाचरण
[मंगलाचरण के विषय वस्तु का वर्णन यहाँ नहीं किया जाता है।]
द्वितीय स्कंध का स्वरूप एवं प्रकरण विभाग
द्वितीय स्कंध ज्ञान साधन लीला के रूप में वर्णित है, जिसमें श्रवण के तीन अंग – तत्व ध्यान, रथ प्रसाद और मनन का निरूपण किया गया है। प्रकरण विभाग के अनुसार, तत्व ध्यान अध्याय एक व दो में, रथ प्रसाद अध्याय तीन व चार में तथा मनन/विमर्श अध्याय पाँच से दस तक आता है। मनन प्रकरण को पुनः उत्पत्ति (अध्याय पाँच से सात) और उपपत्ति (अध्याय आठ से दस) में विभाजित किया गया है। अध्याय एक से सात तक के विषयों का संक्षिप्त विवरण दिया गया, जिसमें भगवान के स्थूल व सूक्ष्म ध्यान, अवतार कथाएँ और विराट पुरुष का वर्णन शामिल है। यह भी बताया गया कि अध्याय छह के श्लोक २९ में वर्णित 'विश्वविशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक्ष सम्यक्' पद का संदर्भ आगे अध्याय आठ में आएगा।
राजा परीक्षित के प्रश्न एवं शंकाएँ (श्लोक १-२९)
अध्याय आठ का आरंभ राजा परीक्षित के आक्षेप गर्भित प्रश्नों से होता है, जो उपपत्ति प्रकरण का प्रवेश द्वार है। परीक्षित ने ब्रह्मा द्वारा प्रेरित नारद जी द्वारा भगवत्तत्त्व के निरूपण के विषय में जानना चाहा। उन्होंने भक्ति के फल, भगवान के हृदय में प्रवेश, जीव की देह उत्पत्ति, ब्रह्मा-ब्रह्मांड के स्वरूप, व्यक्त-अव्यक्त पुरुष, काल-कर्म, सृष्टि के क्रम, विभिन्न धर्मों, तत्वों के स्वरूप और योग आदि से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। इन प्रश्नों से उनकी गहन जिज्ञासा और शुकदेव जी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा परिलक्षित होती है। शुकदेव जी, राजा पर प्रसन्न होकर भागवत कथा आरंभ करने को तैयार होते हैं। इस प्रकरण में अध्याय आठ शंकाओं से, अध्याय नौ उत्तर से और अध्याय दस फल से संबंधित है, जहाँ प्रत्येक में युक्ति/तर्क का समावेश है।
उपपत्ति प्रकरण: कारिका विवरण
इस भाग में अध्याय आठ से दस तक के उपपत्ति प्रकरण की कारिकाओं का विवरण किया गया। उपपत्ति में शंका, उत्तर और फल ये तीन प्रकार के विचार होते हैं। अध्याय आठ शंका (परीक्षित के प्रश्न) को, अध्याय नौ उत्तर (शुकदेव जी के सिद्धांत) को और अध्याय दस फल (कथा श्रवण का परिणाम) को निरूपित करता है। श्रीमहाप्रभुजी समझाते हैं कि आक्षेप गर्भित प्रश्न (शंका), सिद्धांत निरूपण (उत्तर) और तात्पर्य का निर्णायक फल – इन तीनों में युक्ति या तर्क निहित है, इसलिए तीनों अध्याय उपपत्ति प्रकरण में आते हैं। पूर्व अध्यायों में विराट पुरुष (स्थूल तत्व) और प्रविष्ट पुरुष (ब्रह्म तत्व) दोनों का विमर्श और भजन निर्धार किया गया था। अक्षर ब्रह्म के आध्यात्मिक (प्रविष्ट पुरुष) और आधिभौतिक (विराट पुरुष) दो अवतार बताए गए। विराट पुरुष के अंगभूत प्रकृति से लेकर तृण पर्यंत सभी पदार्थों के भजन का निषेध किया गया है।
प्रविष्ट पुरुष एवं अवतारों का विवेचन
प्रविष्ट पुरुष, जो आध्यात्मिक अंतर्यामी पुरुष है, उसके दो भेद बताए गए: अंतर्यामी पुरुष और प्रकृति भरता जीव पुरुष। प्रकृति भरता जीव पुरुष का निरूपण अध्याय छह में 'विशुद्धं केवलम्' पद में १२ धर्मों के साथ हुआ है। ज्ञान मार्ग में देह-आत्मा विवेक करके बाह्य साधनों का परित्याग इसी पुरुष की प्राप्ति के लिए किया जाता है। देव (इंद्र आदि) और देवदेव (ब्रह्मा आदि) भी इसी के अवतार हैं, किंतु वे सीमित और लौकिक फल देने वाले हैं, अतः अध्याय तीन में उनके भजन का निषेध किया गया। आनंदमय समष्टि अंतर्यामी पुरुष के धर्म और स्वरूप के २४ अवतार तथा १० मुख्य अवतारों का सप्तम अध्याय में वर्णन है। यहाँ यह स्पष्ट किया गया कि नारायण स्वरूप से गुणावतार और लीलावतार प्रकट होते हैं, अक्षर ब्रह्म कारण रूप हैं, और पुरुष चित्त प्रधान है, जिससे व्यष्टि असंख्य जीवात्माओं का आविर्भाव होता है। इसमें गुणावतार और लीला अवतारों का प्राकट्य नारायण से होता है, न कि प्रकृति भरता जीव पुरुष से, जो केवल चित्त मात्र है।
श्लोक १ में 'अगुण' पद का स्पष्टीकरण
अष्टम अध्याय के प्रथम श्लोक 'ब्रह्मणा चोदितो ब्रह्म गुणख्याने गुणस्य च यस्मै यस यथा प्रा नारदो देव दर्शन' का विवेचन करते हुए 'अगुणस्य' पद की व्याख्या की गई। श्रीमहाप्रभुजी समझाते हैं कि भगवान वास्तव में गुण रहित नहीं हैं, बल्कि उनके गुण स्वरूपभूत और सूक्ष्म होते हैं। सृष्टि से पूर्व भगवान सूक्ष्म रूप में स्थित रहते हैं, उस समय उनके गुण भी इतने सूक्ष्म होते हैं कि वेदादि सभी दृष्टाओं को वे अगुण ही दिखते हैं। यह मायावादियों के मत का खंडन है, जो भगवान को गुण रहित मानते हैं। निर्गुण का अर्थ सगुण किंतु अप्रकट है। 'यस्मै यस यथा' से यह समझाया गया कि नारद जी ने श्रोताओं के अधिकार अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार से भगवत्तत्त्व का निरूपण किया। 'देव दर्शन' पद नारद जी की उस दिव्य सामर्थ्य को दर्शाता है जिससे वे श्रोताओं के अधिकार को देखकर भगवत्तत्त्व का यथायोग्य वर्णन कर सकते हैं।