मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भ में हुए मंगलाचरण को इंगित करता है। इसमें श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगुरुदेव को वन्दना की गई है। इस खण्ड में किसी विषय-वस्तु का विवेचन नहीं है।
श्रीमद्भागवत शास्त्र: द्वितीय स्कन्ध का परिचय
वक्ता ने श्रीमद्भागवत शास्त्र का परिचय देते हुए बताया कि इसमें कुल १२ स्कन्ध हैं। प्रथम स्कन्ध में अधिकार लीला और द्वितीय स्कन्ध में साधन लीला का वर्णन है। द्वितीय स्कन्ध में १० अध्याय हैं, जिनमें तीन प्रकरण—तत्वज्ञान, रतप्रसाद और विमर्श—आते हैं। आठवें अध्याय में परीक्षितजी के आशंकागर्भित प्रश्नों का निरूपण चल रहा है। इस अध्याय में श्लोक एक से चार तक भगवद्गुण श्रवण और भगवत्प्रवेश की बात कही गई है।
श्लोक ५-६: भगवत्प्रवेश से हृदय के मेल का नाश
श्लोक पाँच और छह में यह बताया गया है कि जब भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के हृदय के भाव कमल में कर्ण छिद्रों द्वारा प्रवेश करते हैं, तब जैसे शरद ऋतु जल के मेल को धो देती है, उसी तरह वे हृदय के सब मेलों को धो देते हैं। जिसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है, वह सब दुखों से छूट जाता है और श्रीकृष्ण के चरणाविंदों का आश्रय कभी नहीं छोड़ता, जैसे परदेश से लौटा हुआ राहगीर अपना घर नहीं छोड़ता। वक्ता ने कीर्तन भक्ति में श्रवण की अनुवृत्ति और कर्ण रंधेन शब्द की व्याख्या की, यह समझाते हुए कि कर्ण ही भगवान के प्रवेश का मुख्य द्वार है।
भाव सरोवर एवं साधन भक्ति का स्वरूप
वक्ता ने भाव शब्द के विभिन्न अर्थों पर चर्चा की, जैसे प्रीति और सत्ता, किन्तु महाप्रभुजी के मत का अनुसरण करते हुए इसे कारणरूप सच्चिदानन्द अक्षर ब्रह्म बताया। उन्होंने समझाया कि साधक का हृदय निरंतर श्रवण से अक्षर ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। जब यह अक्षर ब्रह्म प्रेम से सिंचित होकर विकसित होता है, तो वह सरोवर रूप धारण करता है, जिसे भाव सरोवर कहा गया है। यह भाव सरोवर ही भगवान का गुरु आसन और सिंहासन है। साधन भक्ति जब श्रवण सम्पुट में बीज बनती है और प्रेम से सींचे हुए हृदय में बढ़ती है, तब वह भाव कमल में परिणत होती है, जहाँ भगवान विराजते हैं।
धूतात्मा एवं श्री कृष्ण के चरणाविंदों का आश्रय
वक्ता ने 'धूतात्मा' पद की व्याख्या करते हुए बताया कि जब अन्तःकरण के सभी दोष दूर हो जाते हैं, तब वह शुद्ध आत्मा भगवान श्रीकृष्ण के चरणाविंदों का कभी परित्याग नहीं करती। जैसे एक भूखा व्यक्ति अन्न का त्याग नहीं करता, वैसे ही निरोगी आत्मा सदानन्द श्रीकृष्ण को नहीं छोड़ती। 'समल' शब्द से अन्त राय विघ्नों को समझाया गया, जो तामस, राजस और सात्विक तीन प्रकार के होते हैं। भगवान स्वयं ही पुण्य के साथ छिपे हुए पाप रूपी विघ्नों को दूर करते हैं, जिससे साधक को वैराग्य प्राप्त होता है। 'सलीलस्य यथा शरद' दृष्टान्त से समझाया गया कि जैसे शरद ऋतु जल को निर्मल करती है, वैसे ही भगवत्प्रवेश अन्तःकरण को शुद्ध कर देता है।
प्रश्नोत्तर: हृदय और भाव कमल का भेद
प्रतिभागी ने प्रश्न किया कि हृदय मात्र में प्रवेश और भाव कमल में प्रवेश में क्या अंतर है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'स्वानाम' पद आत्मनिवेदी भक्तों के लिए है। हृदय मात्र में भगवान का प्रवेश अक्षर ब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है, जबकि भाव कमल वह अवस्था है जहाँ प्रेम का विकास होने पर हृदय सरोवर रूप धारण करता है। यह साधन भक्ति से प्रेमलक्षणाभक्ति की ओर प्रगति को इंगित करता है, जहाँ भगवान विराजमान होते हैं। श्रवण रूपी बीज जब प्रेम से सिंचित होता है, तब वह कमल रूप बन जाता है, जो भगवान का आसन है।
श्लोक ७: जीव के देह सम्बन्ध पर प्रश्न
राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से जीव के देह सम्बन्ध के विषय में प्रश्न किया। यह जीव वास्तव में रस, रक्त आदि धातुओं से रहित है, तो फिर इसका देह के साथ आरम्भ कैसे हुआ — अकस्मात्, भगवत्-इच्छा से, या किसी अन्य कारण से? वक्ता ने विभिन्न मतों का खंडन किया, जैसे अदृष्ट या पूर्व-कर्म द्वारा सम्बन्ध, क्योंकि प्रथम सृष्टि में अदृष्ट की अनुपस्थिति। उन्होंने भगवान की इच्छा से सम्बन्ध में आने वाले दोषों को भी बताया, क्योंकि भगवान सर्वज्ञ और राग-द्वेष रहित होकर भी जीव के अहित का कारण नहीं हो सकते। यह प्रश्न छह कोटियों में बद्ध है, जिसका निर्णय शुकदेवजी से पूछा गया है। सत्र यहाँ विराम लेता है।