श्लोक २४ का परायण एवं व्याख्या
सत्र का प्रारम्भ श्लोक २४, २५ और २६ के परायण से होता है। वक्ता श्रीहरिरायजी महाप्रभुजी के एक श्लोक का स्मरण करते हैं। इसमें स्कन्धार्थ, प्रकरणार्थ, अध्यायार्थ के साथ-साथ वाक्यार्थ, पदार्थ और अक्षर का आस्वादन करने की बात कही गई है। द्वितीय स्कन्ध के अष्टम अध्याय में राजा परीक्षित के साधारण विषयों में संदेह और प्रश्नों पर चर्चा की जाती है, जिसका उद्देश्य भगवान के प्रति असंभावना और विपरीत भावना को दूर करना है ताकि शुद्ध भक्ति हो सके। श्लोक २४ में राजा परीक्षित, सुखदेवजी से अपने सभी प्रश्नों का उत्तर क्रमशः वास्तविक रूप से देने का अनुरोध करते हैं और उन्हें अपनी शरण बताते हैं। राजा यह स्पष्ट करते हैं कि वे अपने समाधान और जिज्ञासा के लिए प्रश्न कर रहे हैं, अतः उत्तरों का क्रम भी प्रश्नों के क्रम के अनुसार ही होना चाहिए ताकि हृदय को संतोष हो। राजा परीक्षित सुखदेवजी से अपने सामर्थ्य या अधिकार पर ध्यान न देते हुए वास्तविक पदार्थों का निरूपण करने की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि उनके उत्तरों से अन्य मतों का निराकरण स्वयं ही हो जाएगा। राजा यह भी कहते हैं कि यद्यपि इतने उत्कृष्ट सिद्धांतों के श्रवण का मेरा अधिकार नहीं है, तथापि सुखदेवजी का अधिकार है अतः उन्हें कहना ही चाहिए। राजा स्वयं को शरणागत बताते हुए कहते हैं कि शरणागत के आगे कुछ भी गोपनीय नहीं होता और सुखदेवजी महामुनि हैं, जो तीनों काल की बातें जानते हैं तथा राजा के ज्ञान और शरणागति को भी जानते हैं।
प्रश्नोत्तर — राजा के प्रश्नों का आशय और शरणागति का महत्त्व
इस खंड में 'मैं अपने कार्य के लिए पूछ रहा हूं' पद के आशय पर प्रश्नोत्तर होता है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इसका तात्पर्य राजा की जिज्ञासा के अनुसार प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना है, न कि मोक्ष की बात। इसके पश्चात् 'जो नहीं पूछ चुका हूं' पद के तात्पर्य पर चर्चा होती है। प्रतिभागी पूछते हैं कि इतने सारे प्रश्नों के बाद भी क्या शेष रह जाता है। वक्ता समझाते हैं कि राजा परीक्षित ने जो प्रश्न किए हैं, वे उनकी स्फुट जिज्ञासाएं हैं, परंतु जो स्फुटतः वाचा नहीं दी गई हैं, ऐसी बातें भी इन जिज्ञास्य विषयों के साथ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें परीक्षित सुनना चाहते हैं। सुखदेवजी तीनों काल की बातें जानने वाले महामुनि हैं, अतः वे राजा के सभी प्रश्नों के गर्भित आशय को समझ सकते हैं और उन्हें जो पूछना चाहिए, वह भी समझा सकते हैं। एक प्रतिभागी इस बात को लौकिक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार एक गुरु अपने विद्यार्थी के प्रश्न से कहीं अधिक उसके ज्ञान की आवश्यकता को समझकर उत्तर देते हैं, उसी प्रकार यहां भी समझना चाहिए।
श्लोक २५ का परायण, व्याख्या एवं प्रमाण स्वरूप की चर्चा
यहां एक आशंका उठाई जाती है कि सुखदेवजी के सिवा अन्य मुनि भी सर्वज्ञ और वक्ता हैं, तो उनका प्रमाण पाक्षिक होने पर सुखदेवजी का प्रामाण्य भी पाक्षिक क्यों नहीं होगा। इसके उत्तर में राजा परीक्षित श्लोक २५ में कहते हैं कि इस भक्तिमार्ग के विषय में वे सुखदेवजी को ही पूर्ण प्रमाण मानते हैं क्योंकि वे भगवान हैं और भगवत्गुण युक्त हैं। जैसे परमेष्ठी ब्रह्मा सब की दृष्टि में यथार्थ वक्ता हैं, वैसे ही सुखदेवजी राजा की दृष्टि में प्रमाण हैं। राजा यह भी कहते हैं कि मुझसे श्रेष्ठ लोग भी सुखदेवजी के कहे सिद्धांतों के अनुसार चल रहे हैं और पूर्वजों के पूर्वज भी उन्हीं सिद्धांतों का पालन करते आए हैं। व्याख्या में प्रमाण शब्द का अर्थ स्पष्ट किया जाता है कि जगत के तत्व को समझाने के लिए विरोध रहित ज्ञान ही प्रमाण है, अथवा बाद योग्य ज्ञान से भिन्न ज्ञान को प्रमाण कहते हैं। जो महापुरुष उत्पत्ति से लेकर मरण पर्यंत कभी भी बाधित, विरुद्ध या भूल वाला ज्ञान नहीं रखते, वे प्रमाण शब्द से कहे जाते हैं। वेद से विलक्षण इस भक्तिमार्ग में सुखदेवजी और वेदार्थ के विषय में आत्मभू ब्रह्मा प्रमाण हैं, जिनकी वाणी में कभी विरोध या वाद नहीं होता, क्योंकि वे परमेष्ठी हैं और सर्वदा परम श्रेष्ठ भगवान में ही तत्पर रहते हैं। सुखदेवजी भी सर्वदा भगवत्पर रहते हैं, इसलिए वे भी भगवान और परम प्रमाण हैं। इस पर यह आशंका उठाई जाती है कि भगवान का वचन होने से ही सबको प्रमाण कैसे हो सकता है, क्योंकि जो समझ में न आए, वह प्रमाण कैसे? इस पर उत्तर दिया जाता है कि राजा से बड़े जिन्होंने परम तत्व को समझ लिया है, वे महंत लोग भी सुखदेवजी के कहे पदार्थ और सिद्धांत में विश्वास करते हैं और उनके अनुसार अनुष्ठान भी करते हैं। अतः सुखदेवजी का वचन सर्वत्र प्रमाण है।
प्रश्नोत्तर — ऋषियों के वचनों का विरोध एवं प्रमाण शब्द का अर्थ
ऋषियों के वचनों में परस्पर विरोध के उदाहरण पर प्रश्नोत्तर होता है। वक्ता महाभारत की प्रसिद्ध उक्ति 'स्मृति विभिन्ना श्रुति विभिन्न नको ऋषि वच प्रमाणम धर्मस तत्वम निहितया महाजनोगतस' का उल्लेख करते हैं। वे बताते हैं कि एक ही विषय को लेकर सभी जगह विवाद चलता है, चाहे वह धर्म का विषय हो, राजनीति का हो, या भोजन की रुचि का। भागवत में भी मतांतर भाषा आई है, जिसका अर्थ है कि व्यास ने समाधि में जो अनुभूति की है, उससे भिन्न मत भी प्रस्तुत किए गए हैं, जो किसी न किसी ऋषि मुनि के ही हैं। तृतीय स्कन्ध में सांख्य प्रणाली के अंतर्गत तत्वों की संख्या (२८, २४, १६) में मतभेद का उदाहरण दिया जाता है। सदाचार, खान-पान और शादी-ब्याह के विषय में भी मतभेद पाए जाते हैं। वक्ता अर्जुन और सुभद्रा के विवाह का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि धर्मशास्त्रों में पिता और माता के संबंध से विवाह संबंधों पर भिन्न-भिन्न मत हैं, जो देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। इन मतभेदों को आलोचना का विषय नहीं समझना चाहिए, बल्कि महाप्रभुजी के बताए अनुसार मतांतर को मतांतर और समाधि भाषा को समाधि भाषा समझना चाहिए। इसके पश्चात् 'प्रमाण शब्द को बहुत अर्थ वाला कहते हैं' इस पंक्ति पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। वक्ता आचार्यचरण द्वारा प्रमाण शब्द की व्याख्या देते हुए बताते हैं कि प्रमाण का अर्थ अबाधित ज्ञान है, जिसका बाध न होता हो। प्रमाता, प्रमाकरण और प्रमा विषय को भी प्रमाण कहा जाता है। कुछ लोग प्रमाण शब्द को भिन्न-भिन्न अर्थ वाला कहते हैं, जैसे कुछ लोग कहते हैं कि जिनका ज्ञान उत्पत्ति से लेकर मरण पर्यंत कभी भी गलत न हुआ हो, वे प्रमाण हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि परीक्षितजी सुखदेवजी को सभी अर्थों में प्रमाण रूप मानते हैं, चाहे वह अबाधित ज्ञान के रूप में हो या उत्पत्ति से मरण पर्यंत अव्यभिचरित ज्ञान के रूप में हो।
श्लोक २६ का परायण एवं कथामृत के प्रभाव की व्याख्या
श्लोक २५ की चर्चा के बाद श्लोक २६ का आभास आता है, जिसमें राजा कहते हैं कि वे सुखदेवजी के वचनों से ही जी रहे हैं। श्लोक २६ में राजा परीक्षित सुखदेवजी से कहते हैं, 'हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, मैं आपके मुख से भगवत्कथा सुधा का पान कर रहा हूं, इसलिए कुछ भी भोजन न करने पर भी मेरे प्राण ठहरे हुए हैं, निकले नहीं हैं। हां, यह बात दूसरी है कि कुपित ब्राह्मण ने जो श्राप दे दिया है उसमें कुछ परिवर्तन नहीं हो सकता।' व्याख्या में बताया गया है कि राजा परीक्षित के प्राण दो दिन तक न खाने पर भी नहीं निकले, क्योंकि वे अच्युत श्रीकृष्ण से संबंध रखने वाली कथामृत का पान कर रहे हैं। इससे राजा का उत्तमाधिकार सूचित होता है। यहां प्रश्न उठता है कि यदि कृष्णकथारूपी अमृत भूख का निवारण कर सकता है, तो ब्राह्मण के कोप से होने वाली मृत्यु का भी निवारण क्यों नहीं कर सकता। इसके उत्तर में राजा कहते हैं कि यह बात अन्यत्र नहीं हो सकती और वे ऐसा चाहते भी नहीं हैं। यद्यपि भगवत्कथा से सभी प्राणघातक विघ्न दूर हो जाते हैं, किंतु ब्राह्मण के कोप से प्राप्त होने वाला प्राणोपघातक दूर नहीं हो सकता, क्योंकि यदि तक्षक रूपी मृत्यु हट जाए, तो वह कोप ब्राह्मण का ही नाश कर देगा। मृत्यु के वेग से दबा हुआ कोप किसी एक का नाश तो अवश्य करेगा, और ऐसी अवस्था में ब्राह्मण का मरण होने की अपेक्षा राजा अपना मरण होना ही श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिए राजा चाहते हैं कि यह सर्वघातकों का निवारण करने वाला कथामृत ब्राह्मण के कोप रूपी घात का निवारण न करे, और राजा को निश्चय है कि वह ऐसा नहीं ही करेगा।
प्रश्नोत्तर — ब्राह्मण कोप का निवारण और सुबोधिनी के अनुवाद संबंधी टिप्पणी
तक्षक रूपी मृत्यु के ब्राह्मण का नाश करने की बात पर प्रश्नोत्तर होता है। वक्ता अमरीष राजा और दुर्वासाजी का तथा होलिका और प्रह्लादजी का उदाहरण देते हैं, जहां श्राप देने वाले या मारने वाले का ही नाश होता है जब भगवत्कृपा से श्राप का प्रभाव टल जाता है। इस पर अगला प्रश्न यह आता है कि क्या कथामृत से ब्राह्मण कोप से प्राप्त होने वाला प्राणोपघातक दूर हो सकता है या नहीं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि भगवत्कथा से सभी अमंगल और प्राणघातक विघ्न दूर हो सकते हैं, परंतु यहां ठाकुरजी की इच्छा थी और राजा भी नहीं चाहते थे कि यह दूर हो। राजा को भगवत्कथा सुनने का अवसर प्राप्त हो रहा था, जिससे उनके हृदय में भक्ति उत्पन्न हो रही थी। कथा से भूख-प्यास मिट जाती है, तो शाप का भी निवारण हो सकता है, परंतु राजा स्वयं नहीं चाहते कि ब्राह्मण का शाप दूर हो। वे कहते हैं कि ब्राह्मण मरे, उसकी अपेक्षा मेरी मृत्यु हो जाए, वह श्रेष्ठ है। इसलिए यद्यपि कथामृत सभी कष्टों का निवारण करने वाली है, पर वह ब्राह्मण शाप का निवारण नहीं करेगी। अंत में, 'दो दिन तक न खाने पर भी' इस बात के मूल श्लोक में न होने और सुबोधिनी की व्याख्या के संक्षिप्त होने पर प्रश्न किया जाता है। वक्ता बताते हैं कि अनुवादक ने कुछ आक्षेपों और उनके विस्तार को छोड़ दिया है, क्योंकि उन्हें ऐसा लगा है कि यह बाद में जोड़ा गया है। अनुवादक ने यह टिप्पणी दी है कि उन्हें श्रीमद्वल्लभाचार्य के वचनों में पूर्ण विश्वास है कि वे संदिग्ध अर्थ का प्रतिपादन कभी नहीं करते, किंतु सुबोधिनी के मूल में भागवत के बिना ही अनेक जगह पक्षांतर पाए जाते हैं, जिन्हें वे पंडितों की चतुराई या लेखक प्रमाद मानते हैं।