द्वितीय स्कन्ध, नवम अध्याय का परिचय एवं श्लोक ३ पर विवेचन
सत्र का प्रारम्भ श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कन्ध, नवम अध्याय के सन्दर्भ से हुआ, जहाँ जीव और ब्रह्म के स्वरूप विषयक संदेहात्मक प्रश्नों का निवारण किया जा रहा है। वक्ता ने श्लोक ३ के माध्यम से माया-त्याग के उपाय का निरूपण किया, बताते हुए कि कैसे जीव भगवत् इच्छा से काल और माया को नियम में रखने वाले आनंद भगवान में मोह छोड़कर रमण कर सकता है और अहम मम भाव से मुक्त हो सकता है। भगवान में निश्चल प्रीति सम्पादन से जीव माया के गुणों और कार्यों में आसक्ति नहीं करता और जीवन मुक्त हो जाता है।
श्लोक ४ — आत्मतत्त्व विशुद्धि और ब्रह्मविषयक संदेह का निवारण
श्लोक ४ में ब्रह्मविषयक संदेहों का निवारण किया गया। वक्ता ने समझाया कि कैसे ब्रह्मा को भगवत्-तत्त्व का बोध कराने हेतु भगवान ने अपना सपरिकर रूप दिखाया और उपदेश दिया। यह विशुद्धि लौकिक अन्वेषण से भिन्न है, जहाँ भगवान स्वयं वास्तविक आत्म-पदार्थ का यथार्थ स्वरूप दिखाते हैं। वक्ता ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मा जी ने जब आदर सहित भगवान की सेवा की, तब प्रसन्न होकर उन्होंने अपना स्वरूप दिखाया, जिससे उन्हें आत्मतत्त्व की विशुद्धि हुई।
श्लोक ५ — ब्रह्मा द्वारा प्रपंच-निर्माण का विचार और उसमें बाधक तत्व
इस खण्ड में श्लोक ५ पर विवेचन हुआ, जहाँ ब्रह्मा जी द्वारा प्रपंच-निर्माण के साधनों का साक्षात्कार न होने के कारणों का विश्लेषण किया गया। ब्रह्मा जी में स्व-श्रेष्ठता का अभिमान होने के कारण, उन्होंने भगवान की शरण में जाना या मंगलाचरण आदि नहीं किया, जिससे उन्हें सृष्टि के साधनों का ज्ञान नहीं हुआ। वक्ता ने इस प्रसंग को दृष्टान्त के रूप में उपयोग करते हुए समझाया कि एक सेवक को स्वामी के प्रति दैन्य और विवेक भाव रखना कितना आवश्यक है। तर्क या अनुमान से नहीं, अपरोक्ष ज्ञान या साक्षात्कार से ही कार्य की सिद्धि होती है, जो ब्रह्मा जी को अहं के कारण नहीं हो सका।
श्लोक ६-७ — 'तप' मंत्र का श्रवण एवं ब्रह्मा का निश्चय
श्लोक ६ और ७ में 'तप' मंत्र के प्रकटीकरण का वर्णन किया गया। ब्रह्मा जी के बहुत विचार करने पर भी जब प्रपंच-निर्माण का उपाय नहीं सूझा, तब भगवान की कृपा से उन्होंने जल में डूबे हुए से 'तप तप' यह दो अक्षर का वचन सुना। वक्ता ने समझाया कि यह भगवत्-वाक्य मंत्र रूप था और इसे 'स्पर्श व्यंजन' में १६वें (त) और २१वें (प) अक्षर के रूप में निरूपित किया गया। ब्रह्मा जी ने इसे किसी चेतन वक्ता की आज्ञा मानकर चारों दिशाों में देखा, पर किसी को न पाकर, अपने हित को इसी में समझकर तप करने का निश्चय किया।
प्रश्नोत्तर एवं शंका समाधान
सत्र के इस अंतिम भाग में प्रतिभागियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का समाधान किया गया। एक प्रश्न ब्रह्मा जी के यज्ञ और सृष्टि-रचना के क्रम को लेकर था, जिसका उत्तर यह दिया गया कि यज्ञ का प्रसंग सृष्टि के प्रारम्भ के बाद ही होगा, क्योंकि यज्ञ के लिए सामग्री और विधान सृष्टि होने के बाद ही उत्पन्न होते हैं। दूसरे प्रश्न में 'तप' शब्द के अर्थ और उसके 'चिंतन' अर्थ पर चर्चा हुई। वक्ता ने 'मंत्रोद्धार' की विधि समझाते हुए स्पष्ट किया कि रहस्य की बात को सीधा न कहकर सांकेतिक रूप में कहा जाता है, जिससे उसका वास्तविक आशय ग्रहण किया जा सके।