॥ सुबोधिनी_हिंदी_३/९/१-२ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 23 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्रीसुबोधिनी ग्रन्थ के तृतीय स्कन्ध, नवम अध्याय के श्लोक १ और २ पर आधारित है। इसमें वक्ता ने पूर्व सत्र के श्लोक १ के शेष भाग को पूर्ण करते हुए चेतन और जीवत्व के निरूपण पर विस्तृत चर्चा की। सत्र में सृष्टि के विभिन्न प्रकार, जीव के आविर्भाव-तिरोभाव की प्रक्रिया, माया के स्वरूप और उसके प्रभाव का विश्लेषण किया गया। श्लोक २ के माध्यम से माया द्वारा जीव में उत्पन्न होने वाले 'मैं और मेरा' के भाव को भी समझाया गया।

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मंगलाचरण
२
श्लोक १ — चेतन और जीवत्व का निरूपण
०१:०२ – ०४:३१ — श्लोक १ — चेतन और जीवत्व का निरूपण
श्लोक १ — चेतन और जीवत्व का निरूपण
सत्र का आरम्भ पिछले सत्र में आधे रह गए श्लोक १ के निरूपण से होता है। इसमें सुखदेव जी चेतन और जीवत्व के स्वभाव को समझा रहे हैं। अनुभव रूप परब्रह्म यानी आत्मा का देहादि पदार्थों से संबंध उसकी अपनी माया के बिना ठीक नहीं बैठता, जैसे स्वप्न देखने वाले को उसकी भूल से ही काल्पनिक पदार्थों से संबंध हो जाता है। वक्ता ने भगवान के स्वरूप को सदानंद और सच्चिदानंद दो कोटि में बताया, जबकि जीव में सात प्रकार की धातुएं और दस प्रकार के प्राण होते हैं। भगवान की क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और आनंद शक्ति – इन तीन शक्तियों के बारे में समझाया गया। काल के साक्षी का परिवर्तन होता रहता है।
३
श्लोक १ — सृष्टि के प्रकार और स्थिति-संहार
०४:३१ – १५:०० — श्लोक १ — सृष्टि के प्रकार और स्थिति-संहार
श्लोक १ — सृष्टि के प्रकार और स्थिति-संहार
सृष्टि के दो प्रकार बताए गए - अकस्मात सृष्टि (यथा अग्नि स्फुलिंग, जैसे अग्नि से चिंगारियां निकलती हैं) और क्रम सृष्टि (जैसे तृतीय स्कन्ध आदि में वर्णित नाभि कमल से ब्रह्मादि की सृष्टि)। विज्ञान भी इन दोनों प्रकार की सृष्टि का समर्थन करता है। वेद में 'बहुत श्याम' कहकर सृष्टि का निरूपण तो है, किंतु पालन और संहार का नहीं, जिस पर वक्ता ने स्पष्ट किया कि ये अनुपपत्ति से ही सिद्ध हैं। भगवद्गीता अध्याय ८ के श्लोक 'अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।' का उल्लेख करते हुए बताया कि ब्रह्मा के दिन में सारे व्यक्त पदार्थ अव्यक्त से प्रकाशित होते हैं और रात्रि आने पर उसी अव्यक्त में समा जाते हैं। यह पूर्व रूप का प्राकट्य और अन्य रूप का तिरोभाव ही सृष्टि, स्थिति और संहार है।
४
श्लोक १ — जीव का आविर्भाव, तिरोभाव और मोक्ष
१५:०० – ३०:०० — श्लोक १ — जीव का आविर्भाव, तिरोभाव और मोक्ष
श्लोक १ — जीव का आविर्भाव, तिरोभाव और मोक्ष
विषयों का सर्वथा स्वीकार कर लेना और उनका अभिमान कर लेना ही जीव का जन्म या आविर्भाव है। मृत्यु अत्यंत विस्मृति या मोक्ष है, जहाँ सब कुछ भूल जाना और 'मैं-मेरेपन' का खत्म हो जाना तिरोभाव या मरण है। प्रश्न उठाया गया कि यदि ज्ञान का तिरोभाव ही हो जाता है तो जीव मुक्त क्यों नहीं हो जाता। वक्ता ने इसके उत्तर में बताया कि जीव के आंतर और बाह्य प्रयत्न (जैसे प्रारब्ध जन्य वासनाएँ और भावी देह की खोज) स्वतंत्र होते हैं और सदैव रहते हैं, जो उसे जीवत्व ग्रहण के लिए तैयार रखते हैं। यदि भगवान कृपा करें और अपनी पूरी ज्ञान शक्ति उसे दें, तभी वह व्यामोह और माया को छोड़कर अपने स्वरूप चिद रूप में स्थित हो सकता है।
५
प्रश्नोत्तर — सदंश का अव्यक्त होना
३०:०० – ४५:०० — प्रश्नोत्तर — सदंश का अव्यक्त होना
प्रश्नोत्तर — सदंश का अव्यक्त होना
प्रतिभागी ने सदंश की क्रिया के तिरोभाव होने पर उसके अव्यक्त का अव्यक्त हो जाने की बात पर स्पष्टीकरण मांगा। वक्ता ने भगवद्गीता के श्लोक 'अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः' का उल्लेख कर समझाया कि पहले वह अक्षरात्मक था, अव्यक्त था, और जब सदनंश की क्रिया या उसके धर्म तिरोहित हो गए तो फिर से वह अव्यक्त हो गया। अभिव्यंजक क्रिया को 'एक्सप्रेशन' के रूप में समझाया गया, जहाँ वक्ता अपनी भावनाओं (खुशी, दुख, गुस्सा) को व्यक्त करता है। आंतर और बाह्य प्रयत्न जीव के प्रारब्ध जन्य वासनाएँ और भावी जन्म के लिए देह खोजने की क्रिया के रूप में स्पष्ट किए गए।
६
श्लोक १ — माया का स्वरूप और जीवत्व
४५:०० – १:००:०० — श्लोक १ — माया का स्वरूप और जीवत्व
श्लोक १ — माया का स्वरूप और जीवत्व
सुखदेव जी राजा परीक्षित को सम्बोधित करते हुए बताते हैं कि माया के मोह के सिवाय चेतन को देह का संबंध नहीं हो सकता। अनुभव स्वरूपी शुद्ध चेतन जीवात्मा वस्तुतः अनुभव रूप है, किंतु उसका अनुभव स्वरूप सामर्थ्य धर्म आनंद भगवान में चला गया है, जिससे माया का मोह होता है। वक्ता ने समझाया कि यदि आत्मा को पदार्थों के ज्ञान की तरह अपने स्वरूप का अनुभव होता तो व्यामोह नहीं होता। माया को सहज शक्ति (प्राकृतिक दिव्य शक्ति) बताया गया, जो जीव को हीन भाव में रखती है। यह भगवान की इच्छा अप्रतिहत (निर्बाध) होने के कारण जीव को बंधन में डालने का अधिकार माया को भगवान ने ही दिया है।
७
प्रश्नोत्तर — माया की सहज शक्ति और उसका निवारण
१:००:०० – १:१५:०० — प्रश्नोत्तर — माया की सहज शक्ति और उसका निवारण
प्रश्नोत्तर — माया की सहज शक्ति और उसका निवारण
प्रतिभागी ने प्रश्न किया कि यदि माया सहज शक्ति होने से दोष नहीं बल्कि गुण है, तो उसे दूर करने के लिए उपाय क्यों करना चाहिए। वक्ता ने उत्तर दिया कि भले ही अनुभव शक्ति प्राप्त कर ली जाए, माया के द्वारा जीव का हीन भाव नहीं जाएगा। माया को दूर करने का उपाय इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह भगवान से पृथक होकर बंधन का कार्य करती है और भगवान की इच्छा अप्रतिहत है। माया और निद्रा के बीच भेद समझाते हुए बताया कि निद्रा बुद्धि की वृत्ति है, जो काल से निवृत्त होती है, जबकि माया भगवत्शक्ति और व्यापक है, अतः उसका मोह काल से दूर होना अशक्य है।
८
प्रश्नोत्तर — निद्रा और भगवन्माया में भेद
१:१५:०० – १:३०:०० — प्रश्नोत्तर — निद्रा और भगवन्माया में भेद
प्रश्नोत्तर — निद्रा और भगवन्माया में भेद
प्रतिभागी ने इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा कि क्या माया के कारण ही हम सोते और जागते हैं। वक्ता ने निद्रा और माया के बीच के भेद को गहराई से समझाया, जहाँ निद्रा बुद्धि की एक देश स्थित वृत्ति है और उसकी निवृत्ति काल से हो जाती है। माया भगवत्शक्ति है जो भगवान की आज्ञा से जीवों को मोहित करती है और यह व्यापक है। निद्रा काल से निवृत्त हो जाती है, किंतु माया का मोह काल से दूर होना अशक्य है। इसलिए इसे दूर करने के लिए उपायांतर करना चाहिए। भगवान की मूल माया के द्वारा निद्रा का तिरोभाव होता है, और मनुष्य जागता है।
९
श्लोक २ — जीव में 'मैं और मेरा' का भाव
१:३०:०० – १:३९:१७ — श्लोक २ — जीव में 'मैं और मेरा' का भाव
श्लोक २ — जीव में 'मैं और मेरा' का भाव
वक्ता ने श्लोक २ का निरूपण करते हुए बताया कि जीव इस बहुरूप वाली मोहक माया के प्रभाव से स्वयं भी बहुरूप वाला दिखने लगता है। जब वह माया के गुणों (विषयों) में रमण करने लगता है, तब 'मैं और मेरा' का भाव करने लगता है। यह सिद्धांत नरसिंहतापनी उपनिषद के 'जीवे सो आभासं करोति माया च अविद्या च स्वयमेव भवति' श्रुति से समर्थित है। माया जगतवर्ती पदार्थों को बनाती नहीं, केवल आभास (कुछ का कुछ दिखाना, विपरीत ज्ञान) उत्पन्न करती है। परमात्मा ही माया, अविद्या और जीव इन तीनों रूपों को धारण करने वाला और सबका उपादान कारण है।
१०
प्रश्नोत्तर — परमात्मा ही माया, अविद्या, जीव का उपादान
१:३९:१७ – १:४०:०० — प्रश्नोत्तर — परमात्मा ही माया, अविद्या, जीव का उपादान
प्रश्नोत्तर — परमात्मा ही माया, अविद्या, जीव का उपादान
प्रतिभागी ने 'तस्मादात्मैव त्रिविधयोनिमति' श्रुति में वर्णित माया, अविद्या और जीव के त्रिविध योनि स्वरूप पर स्पष्टीकरण मांगा, विशेषतः जगतकरत्री माया और मोहक अविद्या के संबंध पर। वक्ता ने पुरुषोत्तम जी के विवेचन के अनुसार समझाया कि माया और अविद्या स्वयं ही होते हैं, और आत्मा का ही त्रिविध है। परमात्मा ही माया रूप, अविद्या रूप और जीव रूप को धारण करते हैं और सबका उपादान कारण भी वही हैं। माया जगत प्रपंच को दिखाने के लिए केवल निमित्त मात्र है, उपादान कारण तो परमात्मा ही हैं।
📖 सार
📌 सार
• वक्ता ने श्रीसुबोधिनी के तृतीय स्कन्ध, नवम अध्याय के प्रथम श्लोक की व्याख्या करते हुए चेतन और जीवत्व के निरूपण से सत्र का आरम्भ किया।
• सृष्टि के दो प्रकार — अकस्मात और क्रम सृष्टि — पर चर्चा की गई, जिसमें विज्ञान के दृष्टांत भी दिए गए।
• ब्रह्म के आविर्भाव-तिरोभाव और सृष्टि, स्थिति, संहार के चक्र को भगवद्गीता के श्लोक 'अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे' से समझाया गया।
• जीव के आविर्भाव को विषयों का स्वीकार और अभिमान बताया, तथा मृत्यु को विस्मृति और अभिमान का नाश कहा।
• माया को भगवत्शक्ति और उसकी निर्बाध इच्छा का परिणाम बताया गया, जो जीव को हीन भाव में रखती है।
• निद्रा और माया के बीच भेद स्पष्ट किया गया, जहाँ माया व्यापक और भगवान की आज्ञा से जीवों को मोहित करने वाली है।
• द्वितीय श्लोक में माया के बहुरूप स्वभाव और उसके कारण जीव में 'मैं और मेरा' का भाव आने का निरूपण किया गया।
• परमात्मा को ही माया, अविद्या और जीव तीनों रूपों को धारण करने वाला और सबका उपादान कारण बताया गया।